दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् | सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ||११-११||
divyamālyāmbaradharaṃ divyagandhānulepanam . sarvāścaryamayaṃ devamanantaṃ viśvatomukham ||11-11||
Translations
English Translations
9
He wore celestial garlands and garments, and many divine scents were smeared over His body. All was wondrous, brilliant, unlimited, and all-expanding.
11.11. That wears heavenly garlands and garments; has the unguent of heavenly sandal paste; it is all wonderful, shining (or godly), infinite; and it has faces in all directions.
11.11 Crowned with heavenly garlands, clothed in shining garments, anointed with divine unctions, He showed Himself as the Resplendent One, Marvellous, Boundless, Omnipresent.
11.11 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
11.10 - 11.11 'Divyam' means resplendent. 'Anantam' (boundless) means that form is not limited by time and space because of its being the foundation of the entire universe in the past, present and future. 'Visvatomukham' means facing in all directions. This form is adorned with divine raiments, perfumes, garlands, ornaments and weapons appropriate to it. He explains the same resplendence expressed by the term 'Divyam':
11.11 Divya-malya-ambara-dharam, wearing heavenly garlands and apparel-the God wearing celestial flowers and clothings; divya-gandha-anulepanam, anointed with heavenly scents; sarva-ascaryamayam, abounding in all kinds of wonder; devam, resplendent; anantam, infinite, boundless; and visvato-mukham, with faces everywhere-He being the Self of all beings. 'He showed (to Arjuna)', or 'Arjuna saw', is to be supplied. An illustration is once more being given of the effulgence of the Cosmic form of the Lord:
11.11 Wearing celestial garlands and raiments, anointed with divine perfumes, full of all wonders, resplendent, boundless and facing all directions.
11.11 Wearing heavenly garlands and apparel, anointed with heavenly scents, abounding in all kinds of wonder, resplendent, infinite, and with faces everywhere.
11.11 Wearing divine garlands (necklaces) and apparel, anointed with divine unguents, the all-wonderful, resplendent (Being) endless with faces on all sides.
Hindi Translations
3
।।11.11।।तथा --, जिस ईश्वरने दिव्य पुष्पमालाओं और वस्त्रोंको धारण कर रक्खा है? जिसने दिव्य गन्धका अनुलेपन कर रक्खा है? जो समस्त आश्चर्यमय दृश्योंसे युक्त है? जो सब भूतोंका आत्मा होनेके कारण सब ओर मुखवाला है तथा जिसका अन्त नहीं है ऐसा अनन्त और दिव्य विराट्रूप भगवान्ने अर्जुनको दिखलाया? इस प्रकार पूर्वश्लोकसे अन्वय कर लेना चाहिये अथवा अर्जुनने ऐसा रूप देखा इस प्रकार अध्याहार कर लेना चाहिये।,
।।11.10 -- 11.11।। जिसके अनेक मुख और नेत्र हैं, अनेक तहरके अद्भुत दर्शन हैं, अनेक दिव्य आभूषण हैं, हाथोंमें उठाये हुए अनेक दिव्य आयुध हैं तथा जिनके गलेमें दिव्य मालाएँ हैं, जो दिव्य वस्त्र पहने हुए हैं, जिनके ललाट तथा शरीरपर दिव्य चन्दन, कुंकुम आदि लगा हुआ है, ऐसे सम्पूर्ण आश्चर्यमय, अनन्त रूपोंवाले तथा चारों तरफ मुखवाले देव-(अपने दिव्य स्वरूप-) को भगवान् ने दिखाया।
।।11.11।। दिव्य माला और वस्त्रों को धारण किये हुये और दिव्य गन्ध का लेपन किये हुये एवं समस्त प्रकार के आश्चर्यों से युक्त अनन्त, विश्वतोमुख (विराट् स्वरूप) परम देव (को अर्जुन ने देखा)।।
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English Commentaries
2
In these two verses the repeated use of the word many indicates that there was no limit to the number of hands, mouths, legs and other manifestations Arjuna was seeing. These manifestations were distributed throughout the universe, but by the grace of the Lord, Arjuna could see them while sitting in one place. That was due to the inconceivable potency of Kṛṣṇa.
11.11 दिव्यमाल्याम्बरधरम् wearing divine garlands (necklaces) and apparel? दिव्यगन्धानुलेपनम् anointed with divine unguents? सर्वाश्चर्यमयम् the allwonderful? देवम् resplendent? अनन्तम् endless? विश्वतोमुखम् with faces on all sides.Commentary Visvatomukham With faces on all sides? as He is the Self of all beings.Devam God. Also means resplendent.Anantam Endless. He Who is free from the three kinds of limitations? viz.? DesaKalaVastuPariccheda (limitations of space? time? and thing respectively) is Anantam. He is Brahman. This philosophical concept is explained below.The pot is here. This is spacelimitatio. The pot is now here. This is timelimitation. The pot is not a cloth. This is thing(material) limitation. There is saffron in Kashmir only. This is limitation of space and thing. You can have apples only in September. This is limitation of time and thing. But Brahman is everywhere? as It is allpervading. It exists in the past? the present and the future. It dwells in all parts. Hence It is beyond these three limitations. It is therefore endless.
Hindi Commentaries
2
।।11.11।। जब कोई चित्रकार अपने कलात्मक विचार को रंगों के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयत्न करता है? तो वह प्रारम्भ में एक पट्ट पर अपने विषयवस्तु की अस्पष्ट रूपरेखा खींचता है। तत्पश्चात्? एकएक इंच में वह रंगों को भर कर चित्र को और अधिक स्पष्ट करता जाता है। अन्त में वह चित्र उस चित्रकार के सन्देश का गीत गाते हुये प्रतीत होता है। इसी प्रकार? साहित्य के कुशल चित्रकार व्यासजी के द्वारा चित्रित इस शब्दचित्र का यह श्लोक संजय के शब्दों में भगवान् के विश्वरूप की रूपरेखा खींचता है।संजय के समक्ष जो दृश्य प्रस्तुत हुआ है? वह सामान्य बुद्धि के पुरुष के द्वारा सरलता से ग्रहण करने योग्य कदापि नहीं कहा जा सकता। इस वैभवपूर्ण एवं शक्तिशाली दृश्य को देखकर सामान्य पुरुष तो भय और विस्मय से भौचक्का ही रह जायेगा। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड कोई मन के द्वारा कल्पना किया जाने योग्य विषय नहीं है और न ही बुद्धि उसको ग्रहण कर सकती है। इसलिए? जब गीतोपदेश के मध्य यह दृश्य उपस्थित हो जाता है? तब संजय भी वर्णन करते हुए कुछ हकलाने लगता है।दिव्य माला और वस्त्रों को धारण किये हुए? दिव्य गन्ध का लेपन किये हुए? सर्वाश्चर्यमय? विश्वतोमुख भगवान् इत्यादि शब्द चित्रकार के उन वक्र चिह्नों के प्रतीक हैं जिनके लगाने पर विराट् रूप का चित्र उसकी रूपरेखा में पूर्ण होता है।संजय आगे वर्णन करता है
।।11.11।। व्याख्या--'अनेकवक्त्रनयनम्'--विराट्रूपसे प्रकट हुए भगवान्के जितने मुख और नेत्र दीख रहे हैं, वे सब-के-सब दिव्य हैं। विराट्रूपमें जितने प्राणी दीख रहे हैं, उनके मुख, नेत्र, हाथ, पैर आदि सब-के-सब अङ्ग विराट्रूप भगवान्के हैं। कारण कि भगवान् स्वयं ही विराट्रूपसे प्रकट हुए हैं। 'अनेकाद्भुतदर्शनम्'--भगवान्के विराट्रूपमें जितने रूप दीखते हैं, जितनी आकृतियाँ दीखती हैं, जितने रंग दीखते हैं, जितनी उनकी विचित्र रूपसे बनावट दीखती है, वह सबकीसब अद्भुत दीख रही है। 'अनेकदिव्याभरणम्'--विराट्रूपमें दीखनेवाले अनेक रूपोंके हाथोंमें, पैरोंमें, कानोंमें, नाकोंमें, और गलोंमें जितने गहने हैं, आभूषण हैं वे सब-के-सब दिव्य हैं। कारण कि भगवान् स्वयं ही गहनोंके रूपमें प्रकट हुए हैं 'दिव्यानेकोद्यतायुधम्'--विराट्रूप भगवान्ने अपने हाथोंमें चक्र, गदा, धनुष, बाण, परिघ आदि अनेक प्रकारके जो आयुध (अस्त्र-शस्त्र) उठा रखे हैं, वे सब-के-सब दिव्य हैं। 'दिव्यमाल्याम्बरधरम्'--विराट्रूप भगवान्ने गलेमें फूलोंकी, सोनेकी, चाँदीकी, मोतियोंकी, रत्नोंकी, गुञ्जाओं,आदिकी अनेक प्रकारकी मालाएँ धारण कर रखी हैं। वे सभी दिव्य हैं। उन्होंने अपने शरीरोंपर लाल, पीले, हरे, सफेद, कपिश आदि अनेक रंगोंके वस्त्र पहन रखे हैं, जो सभी दिव्य हैं। 'दिव्यगन्धानुलेपनम्'--विराट्रूप भगवान्ने ललाटपर कस्तूरी, चन्दन, कुंकुम आदि गन्धके जितने तिलक किये हैं तथा शरीरपर जितने लेप किये हैं, वे सब-के-सब दिव्य हैं। 'सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्'--इस प्रकार देखते ही चकित कर देनेवाले, अनन्तरूपवाले तथा चारों तरफ मुख-ही-मुखवाले अपने परम ऐश्वर्यमय रूपको भगवान्ने अर्जुनको दिखाया।जैसे, कोई व्यक्ति दूर बैठे ही अपने मनसे चिन्तन करता है कि मैं हरिद्वारमें हूँ तथा गङ्गाजीमें स्नान कर रहा हूँ, तो उस समय उसको गङ्गाजी, पुल, घाटपर खड़े स्त्री-पुरुष आदि दीखने लगते हैं तथा मैं गङ्गाजीमें स्नान कर रहा हूँ -- ऐसा भी दीखने लगता है। वास्तवमें वहाँ न हरिद्वार है और न गङ्गाजी हैं; परन्तु उसका मन ही उन सब रूपोंमें बना हुआ उसको दीखता है। ऐसे ही एक भगवान् ही अनेक रूपोंमें? उन रूपोंमें पहने हुए गहनोंके रूपमें, अनेक प्रकारके आयुधोंके रूपमें, अनेक प्रकारकी मालाओंके रूपमें, अनेक प्रकारके वस्त्रोंके रूपमें प्रकट हुए हैं। इसलिये भगवान्के विराट्रूपमें सब कुछ दिव्य है।श्रीमद्भागवतमें आता है कि जब ब्रह्माजी बछड़ों और ग्वालबालोंको चुराकर ले गये, तब भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही बछड़े और ग्वालबाल बन गये। बछड़े और ग्वालबाल ही नहीं, प्रत्युत उनके बेंत, सींग, बाँसुरी, वस्त्र, आभूषण आदि भी भगवान् स्वयं ही बन गये (श्रीमद्भा0 10। 13। 19)। सम्बन्ध--अब सञ्जय विश्वरूपके प्रकाशका वर्णन करते हैं।,
Sanskrit Commentaries
13
।।11.11।।No commentary.
।।11.11।।उक्तरूपवन्तं भगवन्तं प्रकारान्तरेण विशिनष्टि -- किञ्चेति।अर्जुन इति अध्याहारेऽपि पदसंघटनासंभवात्।
।।11.11।।उक्तरुपवन्तं भगवन्तं विशिनष्टि। दिव्यानि पुष्पाणि वस्त्राणि ध्रियन्ते येन तं दिव्यगन्धस्यानुलेपनं यस्य तं सर्वाश्चर्यप्रायं देवमनन्तं सर्वभूतात्मकत्वात्सर्वतोमुखं दर्शयामासार्जुनो ददर्शेत्यध्याहाहो वा। अत्र यद्यप्येतानि रुपविशेषणानि प्रतिभान्ति तथापि देवशब्दस्येश्वरवाचकस्य विशेष्यत्वभिप्रेत्याचार्यैरित्थं व्याख्यातम्।
।।11.11।।सर्वाश्चर्यमयमिति केनचित्प्राचुर्यार्थो मयड्व्याख्यातः। तदसत्? सर्वशब्देन गतार्थत्वादिति भावेनाह -- सर्वेति। मयटस्तादात्म्यार्थत्वे प्रमाणमुक्तमेव।
।।11.11।।सर्वाश्चर्यमयं सर्वाश्चर्यात्मकम्।
।।11.11।।दिव्येति। दिव्यानि माल्यानि पुष्पमयानि रत्नमयानि च तथा दिव्यान्यम्बराणि वस्त्राणि च ध्रियन्ते येन तद्दिव्यमाल्याम्बरधरं। दिव्यो गन्धोऽस्येति दिव्यगन्धस्तदनुलेपनं यस्य तत्। सर्वाश्चर्यमयमनेकाद्भुतप्रचुरं देवं द्योतनात्मकं अनन्तमपरिच्छिन्नं विश्वतः सर्वतो मुखानि यस्मिन् तद्रूपं दर्शयामासेति पूर्वेण संबन्धः। अर्जुनो ददर्शेत्यध्याहारो वा।
।।11.11।।विश्वतोमुखमिति पूर्वोक्तस्यएकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् इत्यस्यायं परामर्शः। अनन्तं सर्वतः परिच्छेदरहितम्।
।।11.11।।दिव्यानि क्रीडोपयुक्तानि माल्यानि अम्बराणि बिभर्तीति तथा। दिव्यः क्रीडोद्भूतो गन्धो यस्य तादृशमनुलेपनं यस्य तत्। सर्वाश्चर्यमयं दुर्वितर्क्यं देवं सर्वपूज्यम्? अनन्तमपरिच्छन्नम् व्यापकम्। विश्वतोमुखं सर्वं पश्यन्तं सर्वसन्मुखम्।
।।11.11।।देवं द्योतमानम् अनन्तं कालत्रयवर्तिनिखिलजगदाश्रयतया देशकालपरिच्छेदानर्हं विश्वतोमुखं विश्वदिग्वर्तिमुखं स्वोचितदिव्याम्बरगन्धमाल्याभरणायुधान्वितम्।ताम् एव देवशब्दनिर्दिष्टां द्योतमानतां विशिनष्टि --
।।11.11।। --,दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यानि माल्यानि पुष्पाणि अम्बराणि वस्त्राणि च ध्रियन्ते येन ईश्वरेण तं दिव्यमाल्याम्बरधरम्? दिव्यगन्धानुलेपनं दिव्यं गन्धानुलेपनं यस्य तं दिव्यगन्धानुलेपनम्? सर्वाश्चर्यमयं सर्वाश्चर्यप्रायं देवम् अनन्तं न अस्य अन्तः अस्ति इति अनन्तः तम्? विश्वतोमुखं सर्वतोमुखं सर्वभूतात्मभूतत्वात्? तं दर्शयामास। अर्जुनः ददर्श इति वा अध्याह्रियते।।या पुनर्भगवतः विश्वरूपस्य भाः? तस्या उपमा उच्यते --,
।।11.11।।किंच -- दिव्येति। दिव्यानि माल्याम्बराणि च धारयन्तीति तथा? दिव्यो गन्धो यस्य तादृशमनुलेपनं यस्य तत्? सर्वाश्चर्यमयमनेकाश्चर्यप्रायम्? देवं द्योतनात्मकम्? अनन्तमपरिच्छिन्नम्? विश्वतः सर्वतो मुखानि यस्मिंस्तत्।
।।11.10 -- 11.11।।तच्च कीदृशमिति तच्छृणु -- अनेकवक्त्रनयनं इत्यारभ्यविश्वतोमुखं इत्यन्तं रूपविशेषणानि। इदं च महाकालपुरुषरूपवद्दर्शितं मर्यादामार्गपरैरुपास्यं सर्वतः पाणिपादं चालौकिकमेतत्समष्टिभूतपुरुषस्वरूपभूतं कूटस्थं सर्वकारणकारणं निर्गुणभूतमित्यवसेयम्। दिव्यमिति स्पष्टार्थः। अम्बरं छन्दोमायारूपं किरीटाद्याभरणानि च पारमेष्ठ्यादिरूपाणि? आयुधानि पञ्चभूततत्त्वस्वरूपाणि? इत्येवंविधं विश्वरूपं विश्वतोमुखं निरुपमतेजस्कं स्वं दर्शितम्।
।। 11.11 वस्त्राभरणायुधेष्वनेकत्वं जातिवैचित्र्यादपि द्रष्टव्यम्। नानाजातीयबहुवक्त्रयोगो हि श्रीविश्वरूपध्याने भगवच्छास्त्रेषु पठ्यते अन्यथाऽनेकनयनत्वनिर्देशो निरर्थकः स्यात्? वक्त्रानेकत्वेनैव तत्सिद्धेः। अनेकमद्भुतं दर्शनं यस्य तदनेकाद्भुतदर्शनम्? अनवधिकातिशयाश्चर्यतया दृश्यमानमित्यर्थः। दिव्यत्वमप्राकृतत्वम्।सर्वाश्चर्यमयम् आश्चर्यभूतसर्वतत्त्वाश्रयभूतमित्यर्थः। अत एवअनेकाद्भुतदर्शनम् इत्यनेनापुनरुक्तिः।जगदेतन्महाश्चर्यं रूपं यस्य महात्मनः [वि.पु.5।19।7] इत्यादि भाव्यम्। देवशब्दस्यात्रानुपयुक्तजातिविशेषादिमात्रनिष्ठताव्युदासार्थं विग्रहविशिष्टविषयत्वप्रदर्शनार्थं चद्योतमानमित्युक्तम्। आनन्त्यप्रकारं तद्धेतुं चाह?निखिलेत्यादिना। कृत्स्नजगदाश्रयत्वस्य कण्ठोक्तत्वात्फलितं कालत्रयवर्त्याश्रयत्वमपि। तदुभयफलितं देशकालपरिच्छेदानर्हत्वमत्र यथासम्भवं विग्रहद्वारमद्वारकं च। आनन्त्यं तु स्वरूपगतम्। विग्रहविशेषणवर्गमध्यवर्तित्वादनन्तशब्दोऽपि विग्रहविषयः।दृष्ट्वाद्भुतम् [11।20] इत्यत्रअनन्तायामविस्तारमित्यद्भुतमत्युग्रम् इति रूपविषयमेव वक्ष्यति। ततश्चात्यन्तपृथुत्वादिमात्रप्रदर्शने तात्पर्यमित्यन्ये। एवंअनन्तायामविस्तारे इति वक्ष्यमाण एतदनुवादोऽपि निर्वाह्यः। विश्वव्यापिनोऽप्यस्य विग्रहस्य शक्तिविशेषात्सर्वत्राप्रतिघातो युक्तः। अष्टैश्वर्यशालिनां योगिनामपि भूमावुन्मज्जति निमज्जतीति सिद्धिविशेषोऽभिधीयते। अतोऽस्य प्रकृत्यादिकृत्स्नजगदाश्रयत्वं वक्ष्यमाणं नानुपपन्नम्। अत एवास्त्रभूषणरूपेण सर्वाश्रयत्वमिहोच्यत इत्येतदपि नाशङ्कनीयम्? तत्रदेवदेवस्य शरीरं इत्यत्र शरीरविशेषणतयाऽनन्तायामविस्तारत्वाद्युक्तेः। न च वटपत्रशायिविग्रहवदधटितघटनाशक्त्या सूक्ष्मरूपेण वाऽल्पीयस्यपि सर्वान्तर्भावप्रकाशनमित्यपि वाच्यम्? तथाऽनुक्तेस्तद्विपरीतोक्तेश्च। अतो यथाश्रुत एवार्थः। एतच्चारम्भभाष्य एव अचिन्त्यशब्देन स्थापितमिति।अनेकवक्त्र -- इत्युक्तमेवात्र विश्वतोमुखशब्देन विशेष्यत इत्यभिप्रायेणाह -- विश्वदिग्वर्तिमुखमिति। साक्षाद्विग्रहविषयत्वात् विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखः [ऋक्सं.4।7।27।1श्वे.उ.3।3यजुस्सं.17।19] इत्यादिष्विव नात्र सर्वत्र मुखशक्तियोगोऽपि विवक्षितः। सर्वत्र मुखयुक्तमिति च परोक्तं (शं.) अयुक्तम्? पाणिपादादिषु मुखाभावादिति भावः। अविशदविशदोपलम्भक्रमेण पाठक्रममनादृत्यदेवम् इत्यादिकं पूर्वं व्याख्यातम्। स्वगताकारप्रतीतेः परस्ताद्धि पृथक्सिद्धद्रव्यविशिष्टताप्रतीतिः तथैव च प्रदर्शनमुचितमित्यभिप्रायेणाम्बरादिकं पूर्वमुक्तमपि परस्ताद्दर्शितं -- स्वोचितेत्यादिना। अत्रापि पाठक्रमोल्लङ्घनेनाम्बरादिक्रमेण निर्देशोऽन्तरङ्गत्वबहिरङ्गत्वतारतम्यप्रदर्शनाय। अत्रदर्शयामास इति पूर्वेणान्वयः।