मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् | कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ||१०-३४||
mṛtyuḥ sarvaharaścāhamudbhavaśca bhaviṣyatām . kīrtiḥ śrīrvākca nārīṇāṃ smṛtirmedhā dhṛtiḥ kṣamā ||10-34||
Translations
English Translations
9
I am all-devouring death, and I am the generating principle of all that is yet to be. Among women I am fame, fortune, fine speech, memory, intelligence, steadfastness and patience.
10.34. I am the Death that carries away all and also the Birth of all that are to be born; of the wives of men, I am the Fame, Fortune, Speech, Memory, Wisdom, Constancy and Patience.
10.34 I am all-devouring Death; I am the Origin of all that shall happen; I am Fame, Fortune, Speech, Memory, Intellect, Constancy and Forgiveness.
10.34 See Comment under 10.42
10.34 I am also death which snatches away the life of all. Of those that shall be born I am that called birth. Of women (i.e., of goddesses who are the powers of the Lord) I am prosperity (Sri); I am fame (Kirti); I am speech (Vak); I am memory (Smrti); I am intelligence (Medha); I am endurance (Dhrti); and I am forgiveness (Ksama).
10.34 Death which is of two kinds-one destroying wealth, and the other destroying life-, [Here Ast. adds: tatra yah prana-harah sah (sarva-harah ucyate)-Among them, that which destroys life (is called sarva-harah).-Tr.] is called sarva-harah, the destroyer of all. I am that. This is the meaning. Or, the supreme God is the all-destroyer because He destroys everything during dissolution. I am He. And I am udbhavah, prosperity, eminence, and the means to it. Of whom? Bhavisyatam, of those destined to be prosperous, i.e. of those who are fit for attaining eminence. Narinam, of the feminine alities; I am kirtih, fame; srih, beauty; vak, speech; smrtih, memory; medha, intelligence dhrtih, fortitude; and ksama, forbearance. I am these excellent feminine ialities, by coming to possess even a trace of which one considers himself successful.
10.34 I am also death which snatches all away. I am the origin of all that shall be born. Among women, I am fame, prosperity, speech, memory, intelligence, endurance and forgiveness.
10.34 And I am Death, the destroyer of all; and the prosperity of those destined to be prosperous. Of the feminine [Narinam may mean 'of the feminine alities'. According to Sridhara Swami and S., the words fame etc. signify the goddesses of the respective alities. According to M.S. these seven goddesses are the wives of the god Dharma.-Tr.] (I am) fame, beauty, speech, memory, intelligence, fortitude and forbearance.
10.34 And I am the all-devouring Death, and the prosperity of those who are to be prosperous; among the feminine alities (I am) fame, prosperity, speech, memory, intelligence, firmness and forgiveness.
Hindi Translations
3
।।10.34।।धनादिका नाश करनेवाला और प्राणोंका नाश करनेवाला ऐसे दो प्रकारका मृत्यु सर्वहर कहलाता है? वह सर्वहर मृत्यु मैं हूँ। अथवा परम ईश्वर प्रलयकालमें सबका नाश करनेवाला होनेसे सर्वहर है? वह मैं हूँ। भविष्यत्में जिनका कल्याण होनेवाला है अर्थात् जो उत्कर्षताप्राप्तिके योग्य हैं उनका उद्भव अर्थात् उत्कर्ष -- उन्नतिकी प्राप्तिका कारण मैं हूँ। स्त्रियोंमें जो कीर्ति? श्री? वाणी? स्मृति? बुद्धि? घृति और क्षमा ये उत्तम स्त्रियाँ हैं? जिनके आभासमात्र सम्बन्धसे भी लोग अपनेको कृतार्थ मानते हैं वे मैं हूँ।
।।10.34।। सबका हरण करनेवाली मृत्यु और उत्पन्न होनेवालोंका उभ्दव मैं हूँ तथा स्त्री-जातिमें कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा मैं हूँ।
।।10.34।। मैं सर्वभक्षक मृत्यु और भविष्य में होने वालों की उत्पत्ति का कारण हूँ; स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक (वाणी), स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।।
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English Commentaries
2
As soon as a man is born, he dies at every moment. Thus death is devouring every living entity at every moment, but the last stroke is called death itself. That death is Kṛṣṇa. As for future development, all living entities undergo six basic changes. They are born, they grow, they remain for some time, they reproduce, they dwindle, and finally they vanish. Of these changes, the first is deliverance from the womb, and that is Kṛṣṇa. The first generation is the beginning of all future activities. The seven opulences listed – fame, fortune, fine speech, memory, intelligence, steadfastness and patience – are considered feminine. If a person possesses all of them or some of them he becomes glorious. If a man is famous as a righteous man, that makes him glorious. Sanskrit is a perfect language and is therefore very glorious. If after studying one can remember a subject matter, he is gifted with a good memory, or smṛti. And the ability not only to read many books on different subject matters but to understand them and apply them when necessary is intelligence ( medhā ), another opulence. The ability to overcome unsteadiness is called firmness or steadfastness ( dhṛti ). And when one is fully qualified yet is humble and gentle, and when one is able to keep his balance both in sorrow and in the ecstasy of joy, he has the opulence called patience ( kṣamā ).
10.34 मृत्युः death? सर्वहरः alldevouring? च and? अहम् I? उद्भवः the prosperity? च and? भविष्यताम् of those who are to be prosperous? कीर्तिः frame? श्रीः prosperity? वाक् speech? च and? नारीणाम् of the feminine? स्मृतिः the memory? मेधा intelligence? धृतिः firmness? क्षमा forgiveness.Commentary I am also the allsnatching death that destroys everything. Death is of two kinds? viz.? he who seizes wealth and he who seizes life. Of them he who seizes life is the allseizer and,hence he is called Sarvaharah. I am he.Or? there is another interpretation. I am the Supreme Lord Who is the allseizer? because I destroy everything at the time of the cosmic dissolution.I am the origin of all the beings to be born in the future. I am the prosperity and the means of achieving it of those who are fit to attain it.Beauty is Sri. Lustre is Sri. I am fame? the best of the feminine alities. People who have attained slight fame think that they have achieved great success in life and that they have become very big or great men. I am speech which adorns the throne of justice. I am memory which recalls objects and pleasures of the past.The power of the mind which enables one to hold the teachings of the scriptures is Medha. Firmness or Dhriti is the power to keep the body and the senses steady even amidst various kinds of sufferings. The power to keep oneself unattached even while doing actions is Dhriti. It also means courage. Kshama also means endurance.Fame? prosperity? memory? intelligence and firmness are the daughters of Daksha. They had been given in marriage to Dhrama and so they are all called Dharmapatnis.
Hindi Commentaries
2
।।10.34।। मैं सर्वभक्षक मृत्यु हूँ समानता की समर्थक मृत्यु? शासक के राजदण्ड और मुकुट को भी भिक्षु के भिक्षापात्र और दण्ड के स्तर तक ले आती है। प्रत्येक प्राणी केवल अपने जीवन काल में अनेक वस्तुओं और व्यक्तियों के संबंधों के द्वारा अपना एक भिन्न अस्तित्व बनाये रखता है। मृत्यु के पश्चात् विद्वान और मूढ़? पुण्यात्मा और पापात्मा? बलवान और दुर्बल? शासक और शासित ये सब धूलि में मिल जाते हैं? एक समानरूप बन जाते हैं जिनमें किसी प्रकार का भेद नहीं किया जा सकता।भविष्य में होने वालों का मैं उत्पत्ति कारण हूँ परमात्मा केवल सर्वभक्षक ही नहीं? सृष्टिकर्ता भी है। हम देख चुके हैं कि वस्तुत एक अवस्था के नाश के बिना अन्य अवस्था का जन्म नहीं हो सकता है। किसी पक्ष को ही देखना माने जीवन का एकांगी दर्शन करना ही हैं। वस्तु के नाश से शून्यता नहीं शेष रहती? वरन् अन्य वस्तु की उत्पत्ति होती है। समुद्र में उठती लहरों को अलगअलग देंखे ंतो सदा नाश ही होता दिखाई देगा? परन्तु एक के लय के साथ ही समुद्र में कितनी ही लहरें उत्पन्न होती रहती हैं? जिसका हमे ध्यान भी नहीं रहता है।इस सम्पूर्ण विवेचन का बल इसी पर है कि अनन्त परमात्मा अपने में ही रचना और संहार की क्रीड़ा निरन्तर कर रहा है जिस क्रीड़ा को हम विश्व कहते हैं।मैं स्त्रियों में कीर्ति? श्री? वाक्? स्मृति? मेधा? धृति और क्षमा हूँ ये सात देवताओं की स्त्रियां और स्त्रीवाचक नाम गुण के रूप में भी प्रसिद्ध हंै? इसलिए दोनों प्रकार से ही ये भगवान् की विभूतियां है? दार्शनिक दृष्टिकोण से इस कथन का अर्थ सब आलोचनाओं के परे है। यहाँ यह नहीं कहा गया है कि इन गुणों से सम्पन्न पुरुष दिव्य है। तात्पर्य यह है कि जिस किसी पुरुष में जिसका भूतकाल का जीवन कैसा भी हो जब कभी इनमें से किसी गुण के दर्शन होते हैं? तब हम उसके माध्यम से ईश्वर की विभूति के स्पष्ट दर्शन कर सकते हैं। गुण के प्रत्यारोपण की भाषा में भगवान् कहते हैं? स्त्रियों में मैं कीर्ति? श्री आदि गुण हूँ।अपने परिचय को और अधिक स्पष्ट करने के लिए अगले श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण चार और दृष्टान्त देते हैं
।।10.34।। व्याख्या--'मृत्युः सर्वहरश्चाहम्'--मृत्युमें हरण करनेकी ऐसी विलक्षण सामर्थ्य है कि मृत्युके बाद यहाँकी स्मृतितक नहीं रहती, सब कुछ अपहृत हो जाता है। वास्तवमें यह सामर्थ्य मृत्युकी नहीं है, प्रत्युत परमात्माकी है।अगर सम्पूर्णका हरण करनेकी, विस्मृत करनेकी भगवत्प्रदत्त सामर्थ्य मृत्युमें न होती तो अपनेपनके सम्बन्धको लेकर जैसी चिन्ता इस जन्ममें मनुष्यको होती है, वैसी ही चिन्ता पिछले जन्मके सम्बन्धको लेकर भी होती। मनुष्य न जाने कितने जन्म ले चुका है। अगर उन जन्मोंकी याद रहती तो मनुष्यकी चिन्ताओंका, उसके मोहका कभी अन्त आता ही नहीं। परन्तु मृत्युके द्वारा विस्मृति होनेसे पूर्वजन्मोंके कुटुम्ब, सम्पत्ति आदिकी चिन्ता नहीं होती। इस तरह मृत्युमें जो चिन्ता, मोह मिटानेकी सामर्थ्य है, वह सब भगवान्की है। 'उद्भवश्च भविष्यताम्'--जैसे पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि सबका धारण-पोषण करनेवाला मैं ही हूँ, वैसे ही यहाँ बताते हैं कि सब उत्पन्न होनेवालोंकी उत्पत्तिका हेतु भी मैं ही हूँ। तात्पर्य है कि संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करनेवाला मैं ही हूँ। 'कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा'--कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा -- ये सातों संसारभरकी स्त्रियोंमें श्रेष्ठ मानी गयी हैं। इनमेंसे कीर्ति, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा -- ये पाँच प्रजापति दक्षकी कन्याएँ हैं, 'श्री' महर्षि भृगुकी कन्या है और 'वाक्' ब्रह्माजीकी कन्या है। कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा,धृति और क्षमा -- ये सातों स्त्रीवाचक नामवाले गुण भी संसारमें प्रसिद्ध हैं। सद्गुणोंको लेकर संसारमें जो प्रसिद्धि है, प्रतिष्ठा है, उसे कीर्ति कहते हैं।स्थावर और जङ्गम -- यह दो प्रकारका ऐश्वर्य होता है। जमीन, मकान, धन, सम्पत्ति आदि स्थावर ऐश्वर्य है और गाय, भैंस, घोड़ा, ऊँट, हाथी आदि जङ्गम ऐश्वर्य हैं। इन दोनों ऐश्वर्योंको 'श्री' कहते हैं। जिस वाणीको धारण करनेसे संसारमें यश-प्रतिष्ठा होती है और जिससे मनुष्य पण्डित, विद्वान् कहलाता है, उसे 'वाक्' कहते हैं। पुरानी सुनी-समझी बातकी फिर याद आनेका नाम 'स्मृति' है। बुद्धिकी जो स्थायीरूपसे धारण करनेकी शक्ति है अर्थात् जिस शक्तिसे विद्या ठीक तरहसे याद रहती है, उस शक्तिका नाम 'मेधा' है। मनुष्यको अपने सिद्धान्त, मान्यता आदिपर डटे रखने तथा उनसे विचलित न होने देनेकी शक्तिका नाम 'धृति' है। दूसरा कोई बिना कारण अपराध कर दे, तो अपनेमें दण्ड देनेकी शक्ति होनेपर भी उसे दण्ड न देना और उसे लोक-परलोकमें कहीं भी उस अपराधका दण्ड न मिले -- इस तरहका भाव रखते हुए उसे माफ कर देनेका नाम 'क्षमा' है। कीर्ति, श्री और वाक् -- ये तीन प्राणियोंके बाहर प्रकट होनेवाली विशेषताएँ हैं तथा स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा -- ये चार प्राणियोंके भीतर प्रकट होनेवाली विशेषताएँ हैं। इन सातों विशेषताओँको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है। यहाँ जो विशेष गुणोंको विभूतिरूपसे कहा है, उसका तात्पर्य केवल भगवान्की तरफ लक्ष्य करानेमें है। किसी व्यक्तिमें ये गुण दिखायी दें तो उस व्यक्तिकी विशेषता न मानकर भगवान्की ही विशेषता माननी चाहिये और भगवान्की ही याद आनी चाहिये। यदि ये गुण अपनेमें दिखायी दें तो इनको भगवान्के ही मानने चाहिये, अपने नहीं। कारण कि यह दैवी-(भगवान्की-) सम्पत्ति है, जो भगवान्से ही प्रकट हुई है। इन गुणोंको अपना मान लेनेसे अभिमान पैदा होता है, जिससे पतन हो जाता है क्योंकि अभिमान सम्पूर्ण आसुरी-सम्पत्तिका जनक है।साधकोंको जिस-किसीमें जो कुछ विशेषता, सामर्थ्य दीखे, उसे उस वस्तु-व्यक्तिका न मानकर भगवान्की ही मानना चाहिये। जैसे, लोमश ऋषिके शापसे काकभुशुण्डि ब्राह्मणसे चाण्डाल पक्षी बन गये, पर उनको न भय हुआ, न किसी प्रकारकी दीनता आयी और न कोई विचार ही हुआ, प्रत्युत उनको प्रसन्नता ही हुई। कारण कि उन्होंने इसमें ऋषिका दोष न मानकर भगवान्की प्रेरणा ही मानी -- 'सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन।।' (मानस 7। 113। 1)। ऐसे ही मनुष्य सब वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिके मूलमें भगवान्को देखने लगे तो हर समय आनन्द-ही-आनन्द रहेगा।
Sanskrit Commentaries
13
।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
।।10.34।।सर्वहरशब्दस्य मुख्यमर्थान्तरमाह -- अथवेति। भाविकल्याणानामित्युक्तमेव स्पष्टयति -- उत्कर्षेति। कीर्तिर्धार्मिकत्वनिमित्ता ख्यातिः। श्रीर्लक्ष्मीः? कान्तिः शोभा? वाग्वाणी सर्वस्य प्रकाशिका? स्मृतिश्चिरानुभूतस्मरणशक्तिः? मेधा ग्रन्थधारणशक्तिः? धृतिर्धैर्यम्? क्षमा मानापमानयोरविकृतचित्तता। स्त्रीषु कीर्त्यादीनामुत्तमत्वमुपपादयति -- यासामिति।
।।10.34।।मृत्युः सर्वहरः प्राणहरस्तस्य सर्वहरत्वात्। धनादिहरस्तु न सर्वहरः। यद्वा प्रलयकाले सर्वहरः। यद्वा प्रलयकाले,सर्वहरः परमेश्वरुपो मृत्युहरम्। भविष्यतां भाविकल्याणानामुत्कर्षप्राप्तियोग्यानां मध्ये उत्कर्षाभ्युदयप्राप्तिहेतुरहम्। नारीणां कीर्त्यादयो नार्योऽहं यामामाभासमात्रेणापि लोकः कृतार्थमात्मानं मन्यते।
।।10.34।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
।।10.34।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
।।10.34।।संहारकारिणां मध्ये सर्वहरः सर्वसंहारकारी मृत्युरहम्। भविष्यतां भाविकल्याणानां य उद्भव उत्कर्षः स चाहमेव। नारीणां मध्ये कीर्तिः श्रीर्वाक् स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमेति च सप्त धर्मपत्न्योऽहमेव। तत्र कीर्तिर्धार्मिकत्वनिमित्ता प्रशस्तत्वेन नानादिग्देशीयलोकज्ञानविषयतारूपा ख्यातिः। श्रीर्धर्मार्थकामसंपत् शरीरशोभा वा कान्तिर्वा। वाक् सरस्वती सर्वस्यार्थस्य प्रकाशिका संस्कृता वाणी। चकारान्मूर्त्यादयोऽपि धर्मपत्न्यो गृह्यन्ते। स्मृतिश्चिरानुभूतार्थस्मरणशक्तिः। अनेकग्रन्थार्थधारणाशक्तिर्मेधा। धृतिरवसादेऽपि शरीरेन्द्रियसंघातोत्तम्भनशक्तिः। उच्छृङ्खलप्रवृत्तिकारणेन चापलप्राप्तौ तन्निवर्तनशक्तिर्वा। क्षमा हर्षविषादयोरविकृतचित्तता। यासामाभासमात्रसंबन्धेनापि जनः सर्वलोकादरणीयो भवति तासां,सर्वस्त्रीषूत्तमत्वमिति प्रसिद्धमेव।
।।10.34।।सर्वहरः प्रलयकालिको मृत्युरस्मि। भविष्यतां भाविकल्याणानामुद्भव ऐश्वर्योत्कर्षोऽहम्। कीर्त्यादिसप्तकमप्यहं यासां संश्रयमात्रेण मनुष्येषु कृतार्थताबुद्धिर्भवति।
।।10.34।।मृत्युरिति। संहारिणां मध्ये सर्वसंहारकोऽहम्। च पुनः मृत्युरपि। भविष्यतां निखिलानां प्राणिनां पदार्थानां उद्भवोऽभ्युदयः भाग्यरूपोऽहम्।कीर्तिरिति। कीर्तिः धर्मस्य स्त्री? श्रीः लक्ष्मीः? वाक् सरस्वती श्रीभागवतादिरूपा? स्मृतिर्भगवत्स्मरणात्मिका? मेधा बुद्धिः भगवद्गुणैकनिष्ठा? धृतिः आपत्सु धर्मैकनिष्ठता? क्षमा सर्वातिक्रमसहनरूपा? नारीणां मध्ये एता मद्विभूतिरूपाः।
।।10.34।।सर्वप्राणहरः मृत्युः च अहम् उत्पत्स्यमानानाम् उद्भवाख्यं कर्म च अहम्? नारीणां श्रीः अहं कीर्तिः च अहं वाक् च अहं स्मृतिः च अहं मेधा च अहं धृतिः च अहं क्षमा च अहम्।
।।10.34।। --,मृत्युः द्विविधः धनादिहरः प्राणहरश्च तत्र यः प्राणहरः? स सर्वहरः उच्यते सः अहम् इत्यर्थः। अथवा? परः ईश्वरः प्रलये सर्वहरणात् सर्वहरः? सः अहम्। उद्भवः उत्कर्षः अभ्युदयः तत्प्राप्तिहेतुश्च अहम्। केषाम् भविष्यतां भाविकल्याणानाम्? उत्कर्षप्राप्तियोग्यानाम् इत्यर्थः। कीर्तिः श्रीः वाक् च नारीणां स्मृतिः मेधा धृतिः क्षमा इत्येताः उत्तमाः स्त्रीणाम् अहम् अस्मि? यासाम् आभासमात्रसंबन्धेनापि लोकः कृतार्थमात्मानं मन्यते।।
।।10.34।। मृत्युरिति। संहारकारिणां मध्ये सर्वहरो मृत्युरहम्। भविष्यतां भाविकल्याणानां प्राणिनामुद्भवोऽभ्युदयोऽहम्। नारीणां स्त्रीणां मध्ये कीर्त्याद्याः सप्त देवतारूपाः स्त्रियोऽहम्। यासामाभासमात्रयोगेन प्राणिनः श्लाघ्या भवन्ति ताः कीर्त्याद्याः स्त्रियो मद्विभूतयः।
।।10.34।।मृत्युरिति स्पष्टम्। भगवदीयविरोधिजनान् सर्वान् संहरति तथाभूतो मृत्युर्मद्विभूतिः। एवमुद्भवोऽपि। नारीणां मध्ये कीर्त्यादयः सप्ताहम्। अथवा कीर्त्तिर्वृषभानुपत्नी मद्विभूतिः। तत्र श्रीश्चाहम्। वाक्सरस्वतीयमवताररूपा चाहं श्रीपरिचारिका वा निर्दिष्टा।
।।10.34।।कर्मानुरूपदण्डकालावच्छेदाधिकृतयोर्यमकालाख्यपुरुषयोरुक्तत्वाद्यमादेशकारिप्राणहरणाधिकृतपुरुषविशेष इहमृत्युः सर्वहरः इत्युच्यत इति ज्ञापनायसर्वप्राणहर इत्युक्तम्।प्रलये सर्वसंहर्तेश्वर इह मृत्युः इति कैश्चिदुक्तं मन्दम्?भूतानामन्त एव च [10।20] इत्युक्तत्वात्। उद्भवसहपाठादत्र मृत्युशब्दो मरणपर इति केचित्। उद्भवशब्दः स्वरसत उत्पत्तिक्रियापरः। उद्भवस्थानादि निमित्तोपादानादिकं चात्र पृथगेव निर्दिष्टमिति क्रियापरत्वमेवोचितमित्यभिप्रायेणउद्भवाख्यं कर्मेत्युक्तम्। कीर्त्यादयो नेह गुणविशेषा विवक्षिताः तेषां पुरुषेष्वपि च उद्भूतत्वेननारीणाम् इति विशेषणायोगात्। न च नारीशब्दोऽत्र स्त्रीलिङ्गपदार्थमात्रपरः? मुख्यबाधाभावात्। अतो नारीविशेषनिर्धारणमेव क्रियते। तत्र च श्रिय एव सर्वनारीभ्योऽतिशयितत्वात्सैव प्रथमं वक्तव्याकीर्तिः श्रीः इति तु पाठक्रमोऽर्थक्रमेण बाध्यत इत्यभिप्रायेणश्रीरहं कीर्तिश्चाहमित्युक्तम्। एताश्च भगवदसाधारणशक्तयः। अन्यत्र तु तत्तदभिमानविशेषात्तत्तच्छब्दः।