विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन | भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ||१०-१८||
vistareṇātmano yogaṃ vibhūtiṃ ca janārdana . bhūyaḥ kathaya tṛptirhi śṛṇvato nāsti me.amṛtam ||10-18||
Translations
English Translations
9
O Janārdana, again please describe in detail the mystic power of Your opulences. I am never satiated in hearing about You, for the more I hear the more I want to taste the nectar of Your words.
10.18. In detail, please expound, once again Your own Yogic power and the manifesting power. O Janardana ! I don't feel contended in hearing Your nectar-[like exposition].
10.18 Tell me again, I pray, about the fullness of Thy power and Thy glory; for I feel that I am never satisfied when I listen to Thy immortal words.
10.18 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
10.18 Speak to me again in full, your association with the alities of being the creator etc., and Your sovereignty, Your rulership, which have been briefly described in 'I am the origin of all; from Me proceed everything' (10.8). For I am not satiated by hearing Your ambrosial words. The meaning is, 'My enthusiasm to know more and more of your ambrosial teachings is known to You.'
10.18 O Janardana: ardana is derived from ard, in the sense of the act of going; by virtue of making the janas, the demons who are opposed to the gods, go to hell etc. He is called Jana-ardana. Or, He is called so because He is prayed to [The verbal root ard has got a second meaning, 'to pray'.] by all beings for the sake of human goals, viz prosperity and Liberation. Kathaya, narrate to me; bhuyah, again, though spoken of earlier; atmanah, Your own; yogam, yoga-the special ability in the form of mystic powers; and vibhutaim, the (divine) manifestations-the variety of the objects of meditation; vistarena, elaborately. Hi, for; srnvatah, while hearing; (Your) amrtam, nectar-like speech issuing out of Your mouth; na asti, there is no; trptih, satiety; me, in me.
10.18 Speak to me again in full, O Krsna, about Your attributes and glories. For I am not satiated by hearing Your ambrosial words.
10.18 O Janardana, narrate to me again [In addition to what has been said in the seventh and ninth chapters.] Your onw yoga and (divine) manifestations elaborately. For, while hearing (Your) nectar-like (words), there is no satiety in me.
10.18 Tell me again in detail, O Krishna, of Thy Yogic power and glory; for I am not satiated with what I have heard of Thy life-giving and nectar-like speech.
Hindi Translations
3
।।10.18।।हे जनार्दन अपने योगको -- अपनी योगैश्वर्यरूप विशेष शक्तिको और विभूतिको यानी चिन्तन करनेयोग्य पदार्थोंके विस्तारको? विस्तारपूर्वक कहिये। गमन जिसका कर्म है ऐसी अर्द धातुका रूप जनार्दन है। असुरोंको यानी देवोंके प्रतिपक्षी मनुष्योंको नरकादिमें भेजनेवाले होनेसे भगवान्का नाम जनार्दन है। अथवा उन्नति और कल्याण -- ये दोनों पुरुषार्थरूप प्रयोजन सब लोगोंके द्वारा भगवान्से माँगे जाते हैं? इसलिये भगवान्का नाम जनार्दन है -- यद्यपि आप पहले कह चुके हैं तो भी फिर कहिये क्योंकि आपके मुखसे निकले हुए वाक्यरूप अमृतको सुनतेसुनते मुझे तृप्ति नहीं होती है -- संतोष नहीं होता है।
।।10.18।। हे जनार्दन ! आप अपने योग (सामर्थ्य) को और विभूतियोंको विस्तारसे फिर कहिये; क्योंकि आपके अमृतमय वचन सुनते-सुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही है।
।।10.18।। हे जनार्दन ! अपनी योग शक्ति और विभूति को पुन: विस्तारपूर्वक कहिए, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं होती।।
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English Commentaries
2
A similar statement was made to Sūta Gosvāmī by the ṛṣis of Naimiṣāraṇya, headed by Śaunaka. That statement is: vayaṁ tu na vitṛpyāma uttama-śloka-vikrame yac chṛṇvatāṁ rasa-jñānāṁ svādu svādu pade pade “One can never be satiated even though one continuously hears the transcendental pastimes of Kṛṣṇa, who is glorified by excellent prayers. Those who have entered into a transcendental relationship with Kṛṣṇa relish at every step the descriptions of the pastimes of the Lord.” ( Śrīmad-Bhāgavatam 1.1.19 ) Thus Arjuna is interested in hearing about Kṛṣṇa, and specifically how He remains as the all-pervading Supreme Lord. Now as far as amṛtam, nectar, is concerned, any narration or statement concerning Kṛṣṇa is just like nectar. And this nectar can be perceived by practical experience. Modern stories, fiction and histories are different from the transcendental pastimes of the Lord in that one will tire of hearing mundane stories but one never tires of hearing about Kṛṣṇa. It is for this reason only that the history of the whole universe is replete with references to the pastimes of the incarnations of Godhead. The Purāṇas are histories of bygone ages that relate the pastimes of the various incarnations of the Lord. In this way the reading matter remains forever fresh, despite repeated readings.
10.18 विस्तरेण in detial? आत्मनः Thy? योगम् Yoga? विभूतिम् glory? च and? जनार्दन O Janardana? भूयः again? कथय tell? तृप्तिः contentment? हि for? श्रृण्वतः (of) hearing? न not? अस्ति is? मे of me? अमृतम् nectar.Commentary The Lord is called Janardana because all pray to Him for worldly success? prosperity and also salvation. Arjuna also prays to the Lord to explain His Yogic power and glory? for his salvation.Arjuna says to Lord Krishna Tell me in detail of Thy mysterious power (Yoga) and sovereignty (Aisvarya) and the various things to be meditated upon. Tell me again though You have described earlier in the seventh and the ninth chapters succinctly for there is no satiety in hearing Thy ambrosial speech or nectarlike conversation. However much of it I hear? I am not satisfied surely it is nectar of immortality for me.
Hindi Commentaries
2
।।10.18।। दर्शनशास्त्र के तथा अन्य किसी विषय के विद्यार्थी में भी? सर्वप्रथम प्रखर जिज्ञासा का होना अत्यावश्यक है। विषय को जानने और समझने की इस जिज्ञासा के बिना कोई भी ज्ञान दृढ़ नहीं होता है और न विद्यार्थी के लिए वह लाभदायक ही हो सकता है। आत्मविकास के आध्यात्मिक ज्ञान में यह बात विशेष रूप से लागू होती है क्योंकि अन्य ज्ञानों के समान? न केवल इसे ग्रहण और धारण ही ऋ़रना है? वरन् यह आत्मज्ञान होने पर उसे अपने जीवन में दृढ़ता से जीना भी होता है। इसलिए श्रवण की इच्छा को एक श्रेष्ठ और आदर्श गुण माना गया है? जो वेदान्त के उत्तम अधिकारी के लिए अनिवार्य है। इस गुण के होने से ज्ञानमार्ग में प्रगति तीव्र गति से होती है।पाण्डुपुत्र अर्जुन इस श्रेष्ठ गुण से सम्पन्न था जो कि उसके इस कथन से स्पष्ट होता है कि आपके अमृतमय वचनों को सुनकर मेरी तृप्ति नहीं होती है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि वेदान्त का शुद्धिकारी प्रभाव रुचिपूर्वक श्रवण करने वाले सभी बुद्धिमान विद्यार्थियों पर पड़ता है। एक सच्चे ज्ञानी गुरु के मुख से आत्मतत्त्व का उपदेश सुनकर प्रारम्भ में शिष्य को होने वाला आनन्द क्षणिक उल्लास ही देता है? जो स्थिर नहीं रह पाता। जब वह शिष्य प्रवचन के बाद अकेला रह जाता है? तब उसका मन पुन अनेक कारणों से अशान्त हो सकता है। और फिर भी? कितना ही क्षणिक आनन्द क्यों न हो? उसमें अर्जुन के समान नवदीक्षित विद्यार्थियों को आकर्षित करने की सार्मथ्य होती है? जिसके कारण उनकी उस विषय के प्रति रुचि एक व्यसन के समान बढ़ती ही जाती है। वेदान्त प्रवचनों के श्रवणार्थ इस अधिकाधिक अभिरुचि को यहाँ स्पष्ट दर्शाया गया है। यद्यपि यह साधना है? साध्य नहीं? तथापि? निसन्देह यह एक शुभ प्रारम्भ है। जिन लोगों को तत्त्वज्ञान के बौद्धिक अध्ययन से ही सन्तोष का अनुभव होता हो? वे भी निश्चय ही उन सहस्रों लोगों से श्रेष्ठतर हैं? जो दिव्य आत्मस्वरूप को दर्शाने वाले एक भी आध्यात्मिक प्रवचन को नहीं सुन सकते? या सह नहीं सकतेएक अथक धर्म प्रचारक के रूप में भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त धैर्य के साथ? अर्जुन से कहते हैं
।।10.18।। व्याख्या--'विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन'--भगवान्ने सातवें और नवें अध्यायमें ज्ञानविज्ञानका विषय खूब कह दिया। इतना कहनेपर भी उनकी तृप्ति नहीं हुई, इसलिये दसवाँ अध्याय अपनी ओरसे ही कहना शुरू कर दिया। भगवान्ने दसवाँ अध्याय आरम्भ करते हुए कहा कि 'तू फिर मेरे परम वचनको सुन।'ऐसा सुनकर भगवान्की कृपा और महत्त्वकी तरफ अर्जुनकी दृष्टि विशेषतासे जाती है और वे भगवान्से फिर सुनानेके लिये प्रार्थना करते हैं। अर्जुन कहते हैं कि 'आप अपने योग और विभूतियोंको विस्तारपूर्वक फिरसे कहिये; क्योंकि आपके अमृतमय वचन सुनते हुए तृप्ति नहीं हो रही है। मन करता है कि सुनता ही चला जाऊँ'। भगवान्की विभूतियोंको सुननेसे भगवान्में प्रत्यक्ष आकर्षण बढ़ता देखकर अर्जुनको लगा कि इन विभूतियोंका ज्ञान होनेसे भगवान्के प्रति मेरा विशेष आकर्षण हो जायगा और भगवान्में सहज ही मेरी दृढ़ भक्ति हो जायगी। इसलिये अर्जुन विस्तारपूर्वक फिरसे कहनेके लिये प्रार्थना करते हैं। 'भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्' -- अर्जुन श्रेयका साधन चाहते हैं (गीता 2। 7; 3। 2; 5। 1), और भगवान्ने विभूति एवं योगको तत्त्वसे जाननेका फल अपनेमें दृढ़ भक्ति होना बताया (गीता 10। 7)। इसलिये अर्जुनको विभूतियोंको जाननेवाली बात बहुत सरल लगी कि मेरेको कोई नया काम नहीं करना है, नया चिन्तन नहीं करना है, प्रत्युत जहाँ-कहीं विशेषता आदिको लेकर मनका स्वाभाविक खिंचाव होता है, वहीँ उस विशेषताको भगवान्की मानना है। इससे मनकी वृत्तियोंका प्रवाह संसारमें न होकर भगवान्में हो जायगा, जिससे मेरी भगवान्में दृढ़ भक्ति हो जायगी और मेरा सुगमतासे कल्याण हो जायगा। कितनी सीधी, सरल और सुगम बात है! इसलिये अर्जुन विभूतियोंको फिर कहनेके लिये प्रार्थना करते हैं।जैसे, कोई भोजन करने बैठे और भोजनमें कोई वस्तु प्रिय (बढ़िया) मालूम दे, तो उसमें उसकी रुचि बढ़ती है और वह बार-बार उस प्रिय वस्तुको माँगता है। पर उस रुचिमें दो बाधाएँ लगती हैं -- एक तो वह वस्तु अगर कम मात्रामें होती है तो पूरी तृप्तिपूर्वक नहीं मिलती; और दूसरी, वह वस्तु अधिक मात्रामें होनेपर भी पेट भर जानेसे अधिक नहीं खायी जा सकती ! परन्तु भगवान्की विभूतियोंका और अर्जुनकी विभूतियाँ सुननेकी रुचिका अन्त ही नहीं आता। कानोंके द्वारा अमृतमय वचनोंको सुनते हुए न तो उन वचनोंका अन्त आता है, और न उनको सुनते हुए तृप्ति ही होती है। अतः अर्जुन भगवान्से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि आप ऐसे अमृतमय वचन सुनाते ही जाइये। सम्बन्ध--अर्जुनकी प्रार्थना स्वीकार करके भगवान् अब आगेके श्लोकसे अपनी विभूतियों और योगको कहना आरम्भ करते हैं।
Sanskrit Commentaries
13
।।10.18।।No commentary.
।।10.18।।प्रकृतं प्रश्नमुपसंहरति -- विस्तरेणेति। अर्दतेर्गतिकर्मणो जनार्दनेति रूपम्? तद्व्युत्पादयति -- असुराणामिति। प्रकारान्तरेण शब्दार्थं व्युत्पादयति -- अभ्युदयेति। ननु पूर्वमेव सप्तमे नवमे च विभूतिरैश्वर्यं चेश्वरस्य दर्शितं तत्किमिति श्रोतुमिष्यते तत्राह -- भूय इति। अमृतममृतप्रख्यमित्यर्थः।
।।10.18।।ननु सप्तमे नवमे च विभूतिरैश्यवर्य च दर्शितं तत्किमिति पुनः पृच्छसि तत्राह -- विस्तरेणेति। स्वस्य योगैश्वर्यशक्तिविशेषं विभूतिं च पूर्वोक्तमपि योगादि भूयो विस्तरेण कथय। हे जनार्दन देवशत्रुजनानां असुराणां प्राणवियोगनरकादिगमयितृत्वातं। तथा चास्मच्छत्रुजनानां रोगद्वेषादीनां नाशनाय ध्येयोगविभूति कथनं तव नामानुरुपत्वाद्योग्यमित्याशयः। यद्वाभ्युदयनिःश्रेयसपुरुषार्थप्रयोजनं सर्वैजनैर्याच्यते इति तथा संबोधयन् ममापि याञ्चा त्वयि युक्तेवेति सूचयति। हि यस्मात्तव वाक्याभृतं श्रृण्वतो मम तृप्तिर्नास्ति। नीरसत्वप्रयुक्ततृप्तिव्यावृत्तयेऽमृतमित्युक्तम्। रसाज्ञानप्रयुक्ततृप्तिव्यावर्तनाय मे लसज्ञस्येत्युक्तम्। उदरे पूर्णेऽभृतेऽप्यलंबुद्धिर्भवतीति तद्य्ववच्छेदाय श्रृण्वत इत्युक्तम्। आकाशात्मकस्य श्रोत्रस्य शब्देन गुणे पूर्णताया असंभवात्तृप्तिर्नास्तीति।
।।10.18।।अर्द गतौ याचने च [धा.पा.1।55] इति वचनात् आसुरजनानां नरकादिगमयितृत्वाज्जनैर्याच्यत्वाद्वा जनार्दन इति शङ्करः? तदप्रामाणिकं व्याख्यानम्। इदं तु श्रौतत्वादुपादेयमिति भावेनाह -- न जायत इति। नञः परनिपातः। अत एव नलोपाभावः उत्तरपदे तस्य स्मरणात् अर्दयति गमयति। स ह्यासीदिति। भूतः। अनादितः सत्तावानित्यर्थः। स नासीन्न स जन्मवान्सोऽर्दयतीति जनार्दनः।
।।10.18।।न जायतेऽर्दयति च संसारमिति जनार्दनः। तथा च बाभ्रव्यशाखायाम् -- स भूतः स जनार्दनः इति। स ह्यासीत्स नासीत्सोऽर्दयत् इति।
।।10.18।।अतः आत्मनस्तव योगं सर्वज्ञत्वसर्वशक्तित्वादिलक्षणमैश्वर्यातिशयं विभूतिं च ध्यानालम्बनं विस्तरेण,संक्षेपेण सप्तमे नवमे चोक्तमपि भूयः पुनः कथय। सर्वैर्जनैरभ्युदयनिःश्रेयसप्रयोजनं याच्यस इति हे जनार्दन? अतो ममापि याञ्चा त्वय्युचितैव। उक्तस्य पुनः कथनं कुतो याचसे तत्राह -- तृप्तिरलंप्रत्ययेनेच्छाविच्छित्तिर्नास्ति। हि यस्माच्छृण्वतः श्रवणेन पिबतस्त्वद्वाक्यामृतममृतवत्पदे पदे स्वादु स्वादु। अत्र त्वद्वाक्यमित्यनुक्तेरपह्नुत्यतिशयोक्तिरूपकसंकरोऽयं माधुर्यातिशयानुभवेनोत्कण्ठातिशयं व्यनक्ति।
।।10.18।।योगं वैश्वरूप्यम्। विभूतिं ध्यानालम्बनम्। अमृतं अमृतस्य मोक्षस्य साधनम्।
।।10.18।।यच्चिन्तनात् त्वां प्राप्नोमि याथातथ्येन जानामि तादृशमात्मनो योगं पदार्थेषु क्रीडात्मकं योगम्। च पुनः। तादृशीमेव विभूतिं हे जनार्दन सर्वाविद्यानाशक पूर्वं सङ्क्षेपकथितामपि भूयो विस्तारेण कथय। हि यस्मात् अमृतं मोक्षात्मकं मरणनिवर्तकमानन्दरूपं त्वद्वाक्यं शृण्वतो मे तृप्तिः अलम्भावो न भवतीत्यर्थः।
।।10.18।।अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते (गीता 10।8) इति संक्षेपेण उक्तं तव स्रष्टृत्वादियोगं विभूतिं नियमनं च भूयः विस्तरेण कथय। त्वया उच्यमानं त्वन्माहात्म्यामृतं श्रृण्वतो मे तृप्तिः न अस्ति हि -- मम अतृप्तिः त्वया एव विदिता इति अभिप्रायः।
।।10.18।। --,विस्तरेण आत्मनः योगं योगैश्वर्यशक्तिविशेषं विभूतिं च विस्तरं ध्येयपदार्थानां हे जनार्दन? अर्दतेः गतिकर्मणः रूपम्? असुराणां देवप्रतिपक्षभूतानां जनानां नरकादिगमयितृत्वात् जनार्दनः अभ्युदयनिःश्रेयसपुरुषार्थप्रयोजनं सर्वैः जनैः याच्यते इति वा। भूयः पूर्वम् उक्तमपि कथय तृप्तिः परितोषः हि यस्मात् नास्ति मे मम शृण्वतः त्वन्मुखनिःसृतवाक्यामृतम्।।श्रीभगवानुवाच --,
।।10.18।।तदेवं बहिर्मुखेऽपि चित्ते तत्र तत्र विभूतिभेदेन त्वच्चिन्तैव यथा भवेत्तथा विस्तरेण कथयेत्याह -- विस्तरेणेति। आत्मनस्तव योगं सर्वज्ञत्वसर्वशक्तित्वादिलक्षणं योगैश्वर्यं विभूतिं च विस्तरेण पुनः कथय। हि यस्मात्त्वद्वाक्यममृतरूपं शृण्वतो मम तृप्तिरलंबुद्धिर्नास्ति।
।।10.17 -- 10.18।।किमर्थं तत्प्रकाशनं इत्यपेक्षायामाह -- कथं विद्यामिति। अहं त्वया योगी विधीये तस्य च चिन्तनं युक्तमेवेति। केषुकेषूभयविधेषु भावेषु मया चिन्त्योऽसि।योगिन् इति पाठे तद्वत्त्वात्तव योगमपि कथमहं विद्यामिति प्रश्न उपलभ्यते। ततो विस्तरेणेति समस्तप्रश्नस्फोरणं विभूतिं योगं चेति। यद्यपि पूर्वं त्वयोक्ता विभूतिस्तथ पि सङ्क्षेपेणेत्यधुना विस्तरेण वदेति पृच्छति।
।।10.18।।प्रतिकूलजनानां नरकादिगमयितृत्वात् अनुकूलजनैः स्वाभिलषितं याच्यमानत्वाद्वा जनार्दनः। विस्तरबुभुत्साहेतुज्ञापनार्थं योगशब्दविवक्षितव्यक्त्यर्थं च भूयश्शब्दफलितमाह -- अहं सर्वस्येति। अमृतशब्दोऽत्रातृप्तिसमभिव्याहारान्माहात्म्ये भोग्यत्वपरः। भोग्यतमत्वायोक्तंत्वयोच्यमानमिति। त्वन्मुखचन्द्रनिस्सृतमिति भावः। हिशब्दाभिप्रेतं विवृणोति -- ममेति।