Adhyay 10 • Shlok 41

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा | तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ||१०-४१||

Roman Transliteration (IAST)

yadyadvibhūtimatsattvaṃ śrīmadūrjitameva vā . tattadevāvagaccha tvaṃ mama tejoṃśasambhavam ||10-41||

Translations

English Translations 9
A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada English

Know that all opulent, beautiful and glorious creations spring from but a spark of My splendor.

Dr.S.Sankaranarayan English

10.41. Whatsoever being exists with the manifesting power, and with beauty and vigour, be sure that it is born only of a bit of My illuminant.

Shri Purohit Swami English

10.41 Whatever is glorious, excellent, beautiful and mighty, be assured that it comes from a fragment of My splendour.

Sri Abhinav Gupta English

10.41 See Comment under 10.42

Sri Ramanuja English

10.41 Whatever host of beings has 'power', namely the capacity and means to rule over; has 'splendour', has beauty or prosperity in wealth, grains etc., has 'energy,' namely, is engaged in auspicious undertakings - know such manifestations as coming fro a fragment of My 'power'. Power (Tejas) is the capacity to overcome opposition. The meaning is, know them as arising from a fraction of My inconceivable power of subduing.

Sri Shankaracharya English

10.41 Yat yat, whatever; sattvam, object in the world; is eva, verily; vibhutimat, endowed with majesty; srimad, possessed of prosperity; va, or; is urjitam, energetic, possessed of vigour; tvam, you; avagaccha, know; eva, for certain; tat tat, each of them; as mama tejomsa-sambhavam, having a part (amsa) of My (mama), of God's, power (teja) as its source (sambhavam).

Swami Adidevananda English

10.41 Whatever being is possessed of power, or of splendour, or of energy, know that as coming from a fragment of My power.

Swami Gambirananda English

10.41 Whatever object [All living beings] is verily endowed with majesty, possessed of prosperity, or is energetic, you know for certain each of them as having a part of My power as its source.

Swami Sivananda English

10.41 Whatever being there is glorious, prosperous or powerful, that know thou to be a manifestation of a part of My splendour.

Hindi Translations 3
Sri Shankaracharya Hindi

।।10.41।।संसारमें जोजो भी पदार्थ विभूतिमान् -- विभूतियुक्त हैं तथा श्रीमान् और ऊर्जित ( शक्तिमान् ) अर्थात् श्री -- लक्ष्मी? उससे युक्त और उत्साहयुक्त हैं उनउनको तू मुझ ईश्वरके तेजोमय अंशसे उत्पन्न हुए ही जान। अर्थात् मेरे तेजका एक अंश -- भाग ही जिनकी उत्पत्तिका कारण है? इन सब वस्तुओंको ऐसी जान।

Swami Ramsukhdas Hindi

।।10.41।। जो-जो ऐश्वर्ययुक्त, शोभायुक्त और बलयुक्त प्राणी तथा वस्तु है, उस-उसको तुम मेरे ही तेज-(योग-) के अंशसे उत्पन्न हुई समझो।

Swami Tejomayananda Hindi

।।10.41।। जो कोई भी विभूतियुक्त, कान्तियुक्त अथवा शक्तियुक्त वस्तु (या प्राणी) है, उसको तुम मेरे तेज के अंश से ही उत्पन्न हुई जानो।।

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Commentaries & Exposition

English Commentaries 2
A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada Bhashya

Any glorious or beautiful existence should be understood to be but a fragmental manifestation of Kṛṣṇa’s opulence, whether it be in the spiritual or material world. Anything extraordinarily opulent should be considered to represent Kṛṣṇa’s opulence.

Swami Sivananda Bhashya

10.41 यत् यत् whatever? विभूतिमत् glorious? सत्त्वम् being? श्रीमत् prosperous? ऊर्जितम् powerful? एव also? वा or? तत् तत् that? एव only? अवगच्छ know? त्वम् thou? मम My? तेजोंऽशसंभवम् a manifestation of a part of My splendour.No Commentary.

Hindi Commentaries 2
Swami Chinmayananda Bhashya

।।10.41।। इस अध्याय में कथित उदाहरणों के द्वारा भगवान् की विभूतियों को दर्शाने का अल्पसा प्रयत्न किया गया है? परन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने सत्य को पूर्णतया परिभाषित किया है। हमें यह बताया गया है कि हम विवेक के द्वारा इसी अनित्य जगत् में नित्य और दिव्य तत्त्व को पहचान सकते हैं। उपर्युक्त दृष्टान्तों से यह स्पष्ट होता है कि जगत् की चराचर वस्तुओं में स्वयं भगवान् अपने को ऐश्वर्ययुक्त? कान्तियुक्त अथवा शक्तियुक्त रूप में अभिव्यक्त करते हैं। वे समस्त नाम और रूपों में विद्यमान हैं।यहाँ श्रीकृष्ण अत्यन्त स्पष्ट रूप से यह बताते हैं कि बहुविध जगत् में दिव्य उपस्थिति क्या है? तथा उसे पहचानने की परीक्षा क्या है। जहाँ कहीं भी महानता? कान्ति या शक्ति की अभिव्यक्ति है? वह परमात्मा के असीम तेज की एक रश्मि ही है। इस में कोई सन्देह नहीं कि उपर्युक्त विस्तृत विवेचन का यह सारांश अपूर्व है। इन समस्त उदाहरणों में भगवान् का या तो ऐश्वर्य झलकता है? या कान्ति या फिर शक्ति।सर्वत्र परमात्मदर्शन करने के लिए अर्जुन को दिये गये इस संकेतक का उपयोग गीता के सभी विद्यार्थियों के लिए समान रूप से लाभप्रद होगा।अब अन्त में भगवान् कहते हैं

Swami Ramsukhdas Bhashya

।।10.41।। व्याख्या--'यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा'--संसारमात्रमें जिस-किसी सजी-वनिर्जीव वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, गुण, भाव, क्रिया आदिमें जो कुछ ऐश्वर्य दीखे, शोभा या सौन्दर्य दीखे, बलवत्ता दीखे, तथा जो कुछ भी विशेषता, विलक्षणता, योग्यता दीखे, उन सबको मेरे तेजके किसी एक अंशसे उत्पन्न हुई जानो। तात्पर्य है कि उनमें वह विलक्षणता मेरे योगसे, सामर्थ्यसे, प्रभावसे ही आयी है -- ऐसा तुम समझो -- 'तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्'। मेरे बिना कहीं भी और कुछ भी विलक्षणता नहीं है।    मनुष्यको जिस-जिसमें विशेषता मालूम दे, उस-उसमें भगवान्की ही विशेषता मानते हुए भगवान्का ही चिन्तन होना चाहिये। अगर भगवान्को छोड़कर दूसरे वस्तु, व्यक्ति आदिकी विशेषता दीखती है, तो यह,पतनका कारण है। जैसे पतिव्रता स्त्री अपने मनमें यदि पतिके सिवाय दूसरे किसी पुरुषकी विशेषता रखती है, तो उसका पातिव्रत्य भंग हो जाता है, ऐसे ही भगवान्के सिवाय दूसरी किसी वस्तुकी विशेषताको लेकर मन खिंचता है, तो व्यभिचार-दोष आ जाता है अर्थात् भगवान्के अनन्यभावका व्रत भंग हो जाता है।     संसारमें छोटी-से-छोटी और बड़ीसेबड़ी वस्तु, व्यक्ति, क्रिया आदिमें जो भी महत्ता, सुन्दरता, सुखरूपता दीखती है और जो कुछ लाभरूप, हितरूप दीखता है, वह वास्तवमें सांसारिक वस्तुका है ही नहीं। अगर उस वस्तुका होता तो वह सब समय रहता और सबको दीखता, पर वह न तो सब समय रहता है और न सबको दीखता है। इससे सिद्ध होता है कि वह उस वस्तुका नहीं है। तो फिर किसका है? उस वस्तुका जो आधार है, उस परमात्माका है। उस परमात्माकी झलक ही उस वस्तुमें सुन्दरता, सुखरूपता आदि रूपोंसे दीखती है। परन्तु जब मनुष्यकी वृत्ति परमात्माकी महिमाकी तरफ न जाकर उस वस्तुकी तरफ ही जाती है, तब वह संसारमें फँस जाता है। संसारमें फँसनेपर उसको न तो कुछ मिलता है और न उसकी तृप्ति ही होती है। इसमें सुख नहीं है, इससे तृप्ति नहीं होती -- इतना अनुभव होनेपर भी मनुष्यका वस्तु आदिमें सुखरूपताका वहम मिटता नहीं। मनुष्यको सावधानीके साथ विचारपूर्वक देखना चाहिये कि प्रतिक्षण मिटनेवाली वस्तुमें जो सुख दीखता है, वह उसका कैसे हो सकता है! वह वस्तु प्रतिक्षण नष्ट हो रही है तो उसमें दीखनेवाली महत्ता, सुन्दरता उस वस्तुकी कैसे हो सकती है!     जैसे बिजलीके सम्बन्धसे रेडियो बोलता है तो मनुष्य राजी होता है कि देखो, इस यन्त्रसे कैसी आवाज आ रही है पर वास्तवमें उस रेडियोमें जो कुछ शक्ति है, वह सब बिजलीकी ही है। बिजलीसे सम्बन्ध न होनेपर केवल यन्त्रसे आवाज नहीं निकाली जा सकती। अनजान व्यक्ति तो उस शक्तिको यन्त्रकी ही मान लेता है, पर जानकार व्यक्ति उस शक्तिको बिजलीकी ही मानता है। ऐसे ही किसी वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, क्रिया आदिमें जो कुछ विशेषता दीखती है, उसको अनजान मनुष्य तो उस वस्तु, व्यक्ति आदिकी ही मान लेता है, पर जानकार मनुष्य उस विशेषताको भगवान्की ही मानता है।   इसी अध्यायमें आठवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि सब मेरेसे ही पैदा होते हैं और सबमें मेरी ही शक्ति है। इसमें भगवान्का तात्पर्य यही है कि तुम्हें जहाँ-कहीं और जिस-किसीमें विशेषता, महत्ता, सुन्दरता, बलवत्ता आदि दीखे, वह सब मेरी ही है, उनकी नहीं। एक वेश्या बड़े सुन्दर स्वरोंमें गाना गा रही थी, तो उसको सुनकर एक सन्त मस्त हो गये कि देखो! ठाकुरजीने कैसा कण्ठ दिया है! कितनी सुन्दर आवाज दी है! तो सन्तकी दृष्टि वेश्यापर नहीं गयी, प्रत्युत भगवान्पर गयी कि इसके कण्ठमें जो आकर्षण है, मिठास है, वह भगवान्की है। ऐसे ही कोई फूल दीखे तो राजी हो जाय कि वाह-वाह, भगवान्ने इसमें कैसी सुन्दरता भरी है कोई किसीको बढ़िया पढ़ा रहा है तो बढ़िया पढ़ानेकी शक्ति भगवान्की है, पढ़ानेवालेकी नहीं। देवताओंको बृहस्पति प्रिय लगते हैं, रघुवंशियोंको वसिष्ठजी प्रिय लगते हैं, किसीको सिंहमें विशेषता दीखती है, किसीको रुपये बहुत प्यारे लगते हैं, तो उनमें जिस शक्ति, महत्ता, विशेषता आदिको लेकर आकर्षण, प्रियता, खिंचाव हो रहा है, वह शक्ति, महत्ता आदि भगवान्की ही है, उनकी अपनी नहीं। इस तरह जिस-किसीमें जहाँ-कहीं विशेषता दीखे, वह भगवान्की ही दीखनी चाहिये। इसलिये भगवान्ने अनेक तरहकी विभूतियाँ बतायी हैं। इसका तात्पर्य है कि उन विभूतियोंमें श्रद्धा, रुचिके भेदसे आकर्षण हरेकका अलग-अलग होगा, एक समान सबको विभूतियाँ अच्छी नहीं लगेंगी, पर उन सबमें शक्ति भगवान्की है।यद्यपि जिस-किसीमें जो भी विशेषता है, वह परमात्माकी है, तथापि जिनसे हमें लाभ हुआ है अथवा हो रहा है, उनके हम जरूर कृतज्ञ बनें, उनकी सेवा करें। परन्तु उनकी व्यक्तिगत विशेषता मानकर वहाँ फँस न जायँ -- यह सावधानी रखें। विशेष बात भगवान्ने बीसवें श्लोकसे लेकर उनतालीसवें श्लोकतक जितनी विभूतियाँ कही हैं, उनमें प्रायः 'अस्मि' (मैं हूँ) पदका प्रयोग किया है। केवल तीन जगह -- चौबीसवें और सत्ताईसवें श्लोकमें 'विद्धि' तथा यहाँ इकतालीसवें श्लोकमें 'अवगच्छ' पदका प्रयोग करके जानने की बात कही है।    'अस्मि' (मैं हूँ) पदका प्रयोग करनेका तात्पर्य विभूतियोंके मूल तत्त्वका लक्ष्य करानेमें है कि इन सब विभूतियोंके मूलमें मैं ही हूँ। कारण कि सत्रहवें श्लोकमें अर्जुनने पूछा था कि मैं आपको कैसे जानूँ, तो भगवान्ने 'अस्मि' का प्रयोग करके सब विभूतियोंमें अपनेको जाननेकी बात कही। दो जगह 'विद्धि' पदका प्रयोग करनेका तात्पर्य मनुष्यको सावधान, सावचेत करानेमें है। मनुष्य दोके द्वारा सावचेत होता है -- ज्ञानके द्वारा और शासनके द्वारा। ज्ञान गुरुके द्वारा प्राप्त होता है और शासन स्वयं राजा करता है। अतः चौबीसवें श्लोकमें जहाँ गुरु बृहस्पतिका वर्णन आया है, वहाँ 'विद्धि' कहनेका तात्पर्य है कि तुमलोग गुरुके द्वारा मेरी विभूतियोंके तत्त्वको ठीक तरहसे समझो। विभूतियोंके तत्त्वको समझनेका फल है --मेरेमें दृढ़ भक्ति होना (गीता 10। 7)। सत्ताईसवें श्लोकमें जहाँ राजाका वर्णन आया है, वहाँ 'विद्धि' कहनेका तात्पर्य है कि तुमलोग राजाके शासनद्वारा उन्मार्गसे बचकर सन्मार्गमें लगना अर्थात् अपना जीवन शुद्ध बनाना समझो। गुरु प्रेमसे समझाता है और राजा बलसे, भयसे समझाता है। गुरुके समझानेमें उद्धारकी बात मुख्य रहती है और राजाके समझानेमें लौकिक मर्यादाका पालन करनेकी बात मुख्य रहती है।   सत्ताईसवें श्लोकमें जो 'उच्चैःश्रवा' और 'ऐरावत' का वर्णन आया है, वे दोनों राजाके वैभवके उपलक्षण हैं। कारण कि घोड़े, हाथी आदि राजाके ऐश्वर्य हैं और ऐश्वर्यवान् राजा ही शासन करता है। इसलिये उस श्लोकमें 'विद्धि' पदका प्रयोग खास करके राजाके लिये ही किया हुआ मालूम देता है।   यहाँ इकतालीसवें श्लोकमें जो 'अवगच्छ' पद आया है, उसका अर्थ है -- वास्तविकतासे समझना कि जो कुछ भी विशेषता दीखती है, वह वस्तुतः भगवान्की ही है।     इस प्रकार दो बार 'विद्धि' और एक बार 'अवगच्छ' पद देनेका तात्पर्य यह है कि गुरु और राजाके द्वारा समझानेपर भी जबतक मनुष्य स्वयं उनकी बातको वास्तविकतासे नहीं समझेगा, उनकी बातको नहीं मानेगा, तबतक गुरुका ज्ञान और राजाका शासन उसके काम नहीं आयेगा। अन्तमें तो स्वयंको ही मानना पड़ेगा और वही उसके काम आयेगा।  सम्बन्ध--यहाँतक अर्जुनके प्रश्नोंका उत्तर देकर अब भगवान् अपनी तरफसे खास बात बताते हैं।

Sanskrit Commentaries 13
Sri Abhinav Gupta Bhashya

।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।

Sri Anandgiri Bhashya

।।10.41।।अनुक्ता अपि परस्य विभूतीः संग्रहीतुं लक्षणमाह -- यद्यदिति। वस्तु प्राणिजातं? श्रीमत्समृद्धिमद्वा कान्तिमद्वा। सप्राणं बलवदूर्जितं तदाह -- उत्साहेति। संभवत्यस्मादिति संभवः। तेजसश्चैतन्यस्येश्वरशक्तेर्वांशस्तेजोंशः संभवोऽस्येति तेजोंशसंभवम्। तदाह -- तेजस इति।

Sri Dhanpati Bhashya

।।10.41।।इदं त्ववधेयमित्याह। यद्यत्सत्त्वं वस्तु विभूतिश्वर्यं तद्युक्तं? श्रीर्लक्ष्मीस्तया युक्तं? ऊर्जितमेव वा उत्साहयुक्तमेव वा तत्तन्मत्तेजसोंश एकदेशः संभवो यस्य तदवगच्छ त्वं विजानीहि।

Sri Jayatritha Bhashya

।।10.41।।एष तूद्देशतः [10।40] इत्येतच्छब्दोऽनुक्रान्तपरामर्शीति प्रतीतिनिरासार्थमाह -- यद्यदिति। वक्ष्यमाणं बुद्धिस्थमेतच्छब्देन परामृश्यते। शृङ्गग्राहिकयोक्तेरपि लक्षणोक्तेर्विस्तरत्वादिति भावः। विभूतिमदादिकं मम तेजोरूपेणांशेन सह भवतीत्युक्त्या विष्ण्वादीनामपि भगवदंशयुक्तत्वं प्रतीयते। तेषामप्येतल्लक्षणोपेतत्वात्तन्निवृत्त्यर्थमाह -- विष्ण्वादीनीति। तर्हि किंविषयमेतद्वाक्यं इत्यत आह -- अन्यानि त्विति। कुत एतत् इत्यत आह -- तथा चेति। विशेषकाः गरुडानन्तविरिञ्चाः। वैन्यः पृथुः। राजन्यग्रहणेन गृहीतस्यापि पुनरुक्तिः साक्षादवतारत्वविशेषोक्तिबोधनार्थम्। कृष्णो धर्मसूनुरपि। रामो भार्गवोऽपि। अंशयुक्तत्वेनोक्त्वाकला इत्यनेन कला इव कलाः? न स्वरूपत्वेन।एते स्वांशकलाः इत्यनेन स्वरूपांशरूपा एव कलाः? न तु पूर्ववदुपचारेणेति। नन्वत्रैते वराहाद्याः परमपुरुषस्यांशा एव? कृष्णस्त्वंशी भगवान् स्वयमिति प्रतीयते? तत्कथमुक्तव्याख्यानमन्यथा तुशब्दानुपपत्तेरित्यत आह -- तुशब्द इति। ततश्चायमर्थः -- एतेवराहाद्याः पुंसः स्वांशकलाः। कोऽर्थः कृष्णः परमपुरुषो भगवान् स्वयमेवैते इति। कुत एतत् इति चेत् उदाहृतश्रुतिसंवादात्। अर्थान्तरस्य संवादाभावाच्चेत्याह -- अन्यस्त्विति। वराहादयोऽप्यंशाः कृष्णोंऽशीत्येवंरूपः। इतोऽप्ययं विशेषो न युक्त इत्याह -- अंशत्वमिति। तत्रापि कृष्णेऽपि किञ्चास्मिन् व्याख्याने कृष्णस्यैकस्यैव प्रकृतत्वात्।इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे [भाग.1।3।28] इत्युत्तरवाक्ये बहुवचनं नोपपन्नमित्याह -- मृडयन्तीति। ननु बहुवचनं पूर्वोक्तैर्वराहादिभिः सम्बध्यते? न कृष्णेनेति चेत्? नकृष्णस्तु भगवान् स्वयं इति वाक्यार्थेन व्यवहितत्वात्? व्यवहितस्यापि पुनः सन्निधानाय परामर्शाभावात्। सति गत्यन्तरेऽध्याहारायोगात्। असन्निहितेनान्वयबोधस्य क्वाप्यदर्शनादिति भावेनाह -- न हीति। क्रियेति प्रकृतापेक्षयोक्तम्। ननु सन्निधेरपि योग्यता बलवतीति चेत्? सत्यम् सन्निधिमनतिक्रम्य योग्यान्वयस्तूक्तः।

Sri Madhavacharya Bhashya

।।10.41।।यद्यद्विभूतमदिति विस्तरः। विष्ण्वादीनि ततस्वरूपाण्येव। अन्यानि तु तेजोयुक्तानि। तथा च पैङ्गिखिलेषु -- विशेषका रुद्रवैन्येन्द्रदेवा राजन्याद्या अंशयुतान्यजीवाः। कृष्णव्यासौ रामकृष्णौ च रामकपिलयज्ञप्रमुखः स्वयं सः इति।स एवैको भार्गवदाशरथिकृष्णाद्यास्त्वंशयुतान्यजीवाः इति गौतमखिलेषु।ऋषयो मनवो देवा मनुपुत्रा महौजसः। कलाः सर्वे हरेरेव सप्रजापतयः स्मृताः। एते स्वांशकलाः (चांशकलाः) पुंसः कृष्णस्तु भगवान्स्वयम् इति भागवते [1।3।2728] ऋष्यादीनंशयुतत्वेनोक्त्वा वराहादीन्स्वरूपत्वेनाह। तुशब्द एवार्थे। अन्यस्तु विशेषो न कुत्राप्यवगतः। अंशत्वं तत्राप्यवगतम्उद्बबर्हात्मनः केशौ इति। मृडयन्तीति च बहुवचनं चायुक्तम्। न ह्यन्तराऽन्यदुक्त्वा पूर्वमपरामृश्य तत्क्रियोच्यमाना दृष्टा कुत्रचित्।

Sri Madhusudan Saraswati Bhashya

।।10.41।।अनुक्ता अपि भगवतो विभूतीः संग्रहीतुमुपलक्षणमिदमुच्यते। यद्यत्सत्त्वं प्राणि विभूतिमदैश्वर्ययुक्तं तथा श्रीमत् श्रीर्लक्ष्मीः संपत् शोभा कान्तिर्वा तया युक्तं तथा ऊर्जितं बलाद्यतिशयेन युक्तं तत्तदेव मम तेजसः शक्तेरंशेन संभूतं त्वमवगच्छ जानीहि।

Sri Neelkanth Bhashya

।।10.41।।सर्वभूतानां बीजमहमित्युक्त्या स्वस्य सार्वात्म्योक्तेः सर्वं स्वविभूतिरित्युक्तमेव तथापि तद्ग्रहणाशक्तं प्रति प्राह -- यद्यदिति। यद्यत्सत्त्वं प्राणि विभूतिमदैश्वर्ययुक्तम्। श्रीर्लक्ष्मीः शोभा वा तद्युक्तम्। ऊर्जितं बलाद्यतिशययुक्तम्। तत्तत्सर्वं मम तेजसश्चिच्छक्तेरंशसंभवमंशात्संभूतं त्वमवगच्छ जानीहि। लोके यदतिरमणीयं तद्भगवतो रूपमिति ध्यायेदित्यर्थः।

Sri Purushottamji Bhashya

।।10.41।।ननु मया सर्वस्वरूपज्ञानेन सर्वत्र त्वच्चिन्तनार्थं विभूतिविस्तारः पृष्टः? तस्यान्ताभावोक्त्या मया कुत्र कथं चिन्तनीयः इत्याकाङ्कायामाह -- यद्यदिति। यत् यत् सत्त्वं वस्तुमात्रं विभूतिमत् ऐश्वर्ययुक्तं श्रीमत् सम्पत्तियुक्तं ऊर्जितमेव केनापि प्रकारेणोत्कृष्टतां प्राप्तं रमणीयतरं वा तत्तदेवं मम तेजोंशसम्भवं ममानुभावसम्भूतं अवगच्छ जानीहि।

Sri Ramanuja Bhashya

।।10.41।।यद् यद् विभूतिमद् ईशितव्यसंपन्नं भूतजातं श्रीमत् कान्तिमद् धनधान्यसमृद्धं वा ऊर्जितं कल्याणारम्भेषु उद्युक्तं तत् तद् मम तेजोंऽशसंभवम् इति अवगच्छ।तेजः पराभिभवनसामर्थ्यम्? मम अचिन्त्यशक्तेः नियमनशक्त्या एकदेशसंभवम् इत्यर्थः।

Sri Shankaracharya Bhashya

।।10.41।। --,यद्यत् लोके विभूतिमत् विभूतियुक्तं सत्त्वं वस्तु श्रीमत् ऊर्जितमेव वा श्रीर्लक्ष्मीः तया सहितम् उत्साहोपेतं वा? तत्तदेव अवगच्छ त्वं जानीहि मम ईश्वरस्य तेजोंऽशसंभवं तेजसः अंशः एकदेशः संभवः यस्य तत् तेजोंऽशसंभवमिति अवगच्छ त्वम्।।अथवा बहुना एतेन एवमादिना किं ज्ञातेन तव अर्जुन स्यात् सावशेषेण। अशेषतः त्वम् उच्यमानम् अर्थं श्रृणु -- विष्टभ्य विशेषतः स्तम्भनं दृढं कृत्वा इदं कृत्स्नं जगत् एकांशेन एकावयवेन एकपादेन? सर्वभूतस्वरूपेण इत्येतत् तथा च मन्त्रवर्णः -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि (तै0 आर0 3।12) इति स्थितः अहम् इति।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य,श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्रीमद्भगवद्गीताभाष्येदशमोऽध्यायः।।,प

Sri Sridhara Swami Bhashya

।।10.41।। पुनश्चा साकाङ्क्षं प्रति कथंचित्साकल्येन कथयति -- यद्यदिति। विभूतिमदैश्वर्ययुक्तम् श्रीमत्संपत्तियुक्तम् ऊर्जितं केनचित्प्रभावबलादिना गुणेनातिशयितं यद्यत्सत्त्वं वस्तुमात्रं तत्तदेव मम तेजसः प्रभावस्यांशेन संभूतं जानीहि।

Sri Vallabhacharya Bhashya

।।10.41।।पुनश्च साकाङंक्षप्रति कथञ्चित्साकल्येन कथयन्सर्वसङ्ग्रहार्थमाह -- यद्यदिति। सत्त्वं चेतनाचेतनवस्तुमात्रं श्रीमत् शोभादिमच्च ऊर्जितं अन्नसमृद्धिमत् अतिशयितं वा तन्मम तेजोंशसम्भवं जडजीवान्तर्यामिष्वेकैकांशप्राकट्यात् ममाचिन्त्ययोगशक्तेः सच्चिदानन्दैकदेशसम्भवं जानीहीत्यर्थः।

Vedantadeshikacharya Venkatanatha Bhashya

।।10.41।।प्राधान्यतः [10।19] इत्युपक्रम्य प्रपञ्चितमर्थमनुक्तानामवश्यकर्तव्यप्रधानविभूतीनां सङ्ग्रहाभिप्रायेणोपसंहरतियद्यत् इतिश्लोकेन। विभूतिशब्दस्य प्राकरणिकमर्थमनुसन्धायोक्तंईशितव्यसम्पन्नमिति। सत्त्वशब्दोऽत्र जन्तुपरः। वीप्साभिप्रायव्यञ्जनाय जातशब्दः। विभूतिमच्छ्रीमच्छब्दयोः पौनरुक्त्यं परिहरतिकान्तिमदिति। नियन्तव्यविशेषविवक्षया वा गोबलीवर्दन्यायात्पौनरुक्तिपरिहार इत्यभिप्रायेणाहधनधान्यसमृद्धं वेति। ऊर्जितमित्युत्कृष्टत्वादिसामान्यविवक्षायामितरपाठवैयर्थ्यात् विशिष्टमर्थमाहकल्याणेति। ऊर्जशब्दो ह्यदीनत्वेन सन्नाहशीलत्वपरः।विभूतिमदित्यादि बलादिमतां प्रदर्शनम्।मम तेजोंशसम्भवम् इत्युक्ते विग्रहगततेजोद्रव्यैकदेशोपादानत्वं प्रतीयेतेति तन्निरासाय प्रकृतौपयिकं तेजश्शब्दार्थमाहतेजः पराभिभवनसामर्थ्यमिति। कोऽयमत्राभिभवो नाम? तत्र च कथमंशसद्भावः इत्यत्राहममेति।अचिन्त्यशक्तेरित्यनेन चिन्तायोग्यांशनिष्कर्षाय ममेत्यस्याभिप्रायो विवृतः। तेन सर्वगोचरत्वाभङ्गुरत्वाघटितघटनत्वादिसिद्धिः। यथा शैलान्दोलिनश्चण्डमारुतस्य तृणप्रेरणादिकं वेगलेशमात्रभवम्? तद्वदिहेति भावः। तेजसोंशः सम्भवो यस्य तत्तेजोंऽशसम्भवम्।

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