एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर | द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ||११-३||
evametadyathāttha tvamātmānaṃ parameśvara . draṣṭumicchāmi te rūpamaiśvaraṃ puruṣottama ||11-3||
Translations
English Translations
9
O greatest of all personalities, O supreme form, though I see You here before me in Your actual position, as You have described Yourself, I wish to see how You have entered into this cosmic manifestation. I want to see that form of Yours.
11.3. As You describe Yourself as the Supreme Lord [of all], it must be so. [Hence], O Supreme Self, I desire to perceive Your Lordly form.
11.3 I believe all as Thou hast declared it. I long now to have a vision of thy Divine Form, O Thou Most High!
11.3 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
11.3 O Supreme Lord, it is certain that it is even as you have described Yourself. O Supreme Person, O ocean of compassion for your dependants! I, however, wish to see or wish to realise directly, Your Lordly form peculiar to you - the form as the sovereign, protector, creator, destroyer, supporter of all, the mine of auspicious attributes, supreme and distinct from all other entities.
11.3 Parama-isvara, O supreme Lord; evam, so; etat, it is-not otherwise; yatha, as; tvam, You; attha, speak; atmanam, about Yourself. Still, purusottama, O supreme Person; iccahmi, I wish; drastum, to see; the aisvaram, divine; rupam, form; te, of Yours, of Visnu, endowed with Knowledge, Sovereignty, Power, Strength, Valour and Formidability.
11.3 O Supreme Lord, how You described Yourself, even so are You. I wish to see Your Lordly form, O Supreme Person.
11.3 O supreme Lord, so it is, as You speak about Yourself. O supreme Person, I wish to see the divine form of Yours.
11.3 (Now) O Supreme Lord, as Thou hast thus described Thyself, O Supreme Person, I wish to see Thy divine form.
Hindi Translations
3
।।11.3।।हे परमेश्वर आप अपनेको जिस प्रकारसे बतलाते हैं? आप ठीक वैसे ही हैं अन्यथा नहीं। तथापि हे पुरुषोत्तम ज्ञान? ऐश्वर्य? शक्ति? बल? वीर्य और तेजसे युक्त आपके ऐश्वर्यमय वैष्णवरूपको मैं देखना चाहता हूँ।
।।11.3।। हे पुरुषोत्तम ! आप अपने-आपको जैसा कहते हैं, यह वास्तवमें ऐसा ही है। हे परमेश्वर ! आपके ईश्वर-सम्बन्धी रूपको मैं देखना चाहता हूँ।
।।11.3।। हे परमेश्वर ! आप अपने को जैसा कहते हो, यह ठीक ऐसा ही है। (परन्तु) हे पुरुषोत्तम ! मैं आपके ईश्वरीय रूप को प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।।
▼ Understand This Shlok Better
Personalized AI explanation tailored to your profile & reading level
▼ Understand This Shlok Better
Personalized AI explanation tailored to your profile & reading levelCommentaries & Exposition
English Commentaries
2
The Lord said that because He entered into the material universe by His personal representation, the cosmic manifestation has been made possible and is going on. Now as far as Arjuna is concerned, he is inspired by the statements of Kṛṣṇa, but in order to convince others in the future who may think that Kṛṣṇa is an ordinary person, Arjuna desires to see Him actually in His universal form, to see how He is acting from within the universe, although He is apart from it. Arjuna’s addressing the Lord as puruṣottama is also significant. Since the Lord is the Supreme Personality of Godhead, He is present within Arjuna himself; therefore He knows the desire of Arjuna, and He can understand that Arjuna has no special desire to see Him in His universal form, for Arjuna is completely satisfied to see Him in His personal form of Kṛṣṇa. But the Lord can understand also that Arjuna wants to see the universal form to convince others. Arjuna did not have any personal desire for confirmation. Kṛṣṇa also understands that Arjuna wants to see the universal form to set a criterion, for in the future there would be so many imposters who would pose themselves as incarnations of God. The people, therefore, should be careful; one who claims to be Kṛṣṇa should be prepared to show his universal form to confirm his claim to the people.
11.3 एवम् thus? एतत् this? यथा as? आत्थ hast declared? त्वम् Thou? आत्मानम् Thyself? परमेश्वर O Supreme Lord? द्रष्टुम् to see? इच्छामि (I) desire? ते Thy? रूपम् form? ऐश्वरम् sovereign? पुरुषोत्तम O Supreme Purusha.Commentary Some commentators take the two halves of this verse as two independent sentences and interpret it thusSo it is? O Supreme Lord? as Thou hast declared Thyself to be. (But still) I desire to see Thy form as Isvara? O Supreme Person.Rupamaisvaram Thy form as Isvara? that of Vishnu as possessed of infinite knowledge? sovereignty? power? strength? prowess and splendour.
Hindi Commentaries
2
।।11.3।। संस्कृत से वाक्प्रचार एवमेतत् (यह ठीक ऐसा ही है) के द्वारा अर्जुन तत्त्वज्ञान के सैद्धान्तिक पक्ष को स्वीकार करता है। समस्त नाम और रूपों में ईश्वर की व्यापकता की सिद्धि बौद्धिक दृष्टि से संतोषजनक थी। फिर भी बुद्धि को अभी भी प्रत्यक्षीकरण की प्रतीक्षा थी। इसलिए अर्जुन कहता है कि? मैं आपके ईश्वरीय रूप को देखना चाहता हूँ। हमारे शास्त्रों में ईश्वर का वर्णन इस प्रकार किया गया है कि वह ज्ञान? ऐश्वर्य? शक्ति? बल? वीर्य और तेज इन छ गुणों से सम्पन्न है।इस अवसर पर भगवान् ने अर्जुन को यह दर्शाने का निश्चय किया कि वे न केवल समस्त व्यष्टि रूपों में व्याप्त हैं वरन् वे वह समष्टिरूपी पात्र हैं? जिसमें ही समस्त नाम और रूपों का अस्तित्व है। भगवान् सर्वव्यापक होने के साथहीसाथ सर्वातीत भी हैं।यद्यपि कट्टर बुद्धिवाद के अत्युत्साह में आकर अर्जुन ने विश्वरूप दर्शन की अपनी मांग भगवान् के समक्ष रखी? किन्तु उसे तत्काल यह भान हुआ कि उसकी यह धृष्टता है और उसने सद्व्यवहार की मर्यादा का उल्लंघन किया है।अगले श्लोक में वह अधिक नम्रता से कहता है
।।11.3।। व्याख्या --'पुरुषोत्तम'--यह सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि हे भगवन् !मेरी दृष्टिमें इस संसारमें आपके समान कोई उत्तम, श्रेष्ठ नहीं है अर्थात् आप ही सबसे उत्तम, श्रेष्ठ हैं। इस बातको आगे पन्द्रहवें अध्यायमें भगवान्ने भी कहा है कि मैं क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम हूँ; अतः मैं शास्त्र और वेदमें पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध हूँ (15। 18)।'एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानम्'--हे पुरुषोत्तम !आपने (सातवें अध्यायसे दसवें अध्यायतक) मेरे प्रति अपने अलौकिक प्रभावका, सामर्थ्यका जो कुछ वर्णन किया, वह वास्तवमें ऐसा ही है। यह संसार मेरेसे ही उत्पन्न होता है और मेरेमें ही लीन हो जाता है (7। 6), मेरे सिवाय इसका और कोई कारण नहीं है (7। 7), सब कुछ वासुदेव ही है (7। 19), ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञरूपमें मैं ही हूँ (7। 29 30)? अनन्य भक्तिसे प्रापणीय परम तत्त्व मैं ही हूँ (8। 22), मेरेसे ही यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, पर मैं संसारमें और संसार मेरेमें नहीं है (9। 4 5), सत् और असत्रूपसे सब कुछ मैं ही हूँ (9 19), मैं ही संसारका मूल कारण हूँ और मेरेसे ही सारा संसार सत्ता-स्फूर्ति पाता है (10। 8), यह सारा संसार मेरे ही किसी एक अंशमें स्थित है (10। 42) आदि-आदि। अपने-आपको आपने जो कुछ कहा है, वह सब-का-सब यथार्थ ही है। 'परमेश्वर'--भगवान्के मुखसे अर्जुनने पहले सुना है कि 'मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंका और सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर हूँ-- 'भूतानामीश्वरोऽपि' (4। 6) ;'सर्वलोकमहेश्वरम्' (5। 29)। इसलिये अर्जुन यहाँ भगवान्के विलक्षण प्रभावसे प्रभावित होकर उनके लिये 'परमेश्वर' सम्बोधन देते हैं, जिसका तात्पर्य है कि हे भगवन् वास्तवमें आप ही परम ईश्वर हैं, आप ही सम्पूर्ण ऐश्वर्यके मालिक हैं।'द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरम्' -- अर्जुन कहते हैं कि मैंने आपसे आपका माहात्म्यसहित प्रभाव सुन लिया है और इस विषयमें मेरे हृदयमें दृढ़ विश्वास भी हो गया है। 'सम्पूर्ण संसार मेरे शरीरके एक अंशमें है' -- इसे सुनकर मेरे मनमें आपके उस रूपको देखनेकी उत्कट लालसा हो रही है।दूसरा भाव यह है कि आप इतने विलक्षण और महान् होते हुए भी मेरे साथ कितना स्नेह रखते हैं, कितनी आत्मीयता रखते हैं कि मैं जैसा कहता हूँ, वैसा ही आप करते हैं और जो कुछ पूछता हूँ, उसका आप उत्तर देते हैं। इस कारण आपसे कहनेका, पूछनेका किञ्चिन्मात्र भी संकोच न होनेसे मेरे मनमें आपका वह रूप देखनेकी बहुत इच्छा हो रही है, जिसके एक अंशमें सम्पूर्ण संसार व्याप्त है। दसवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें अर्जुने कहा था कि आप अपनी पूरी-की-पूरी विभूतियाँ कह दीजिये, बाकी मत रखिये --'वक्तुमर्हस्यशेषेण' तो भगवान्ने विभूतियोंका वर्णन करते हुए उपक्रममें और उपसंहारमें कहा कि मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है (10। 19, 40)। इसलिये भगवान्ने विभूतियोंका वर्णन संक्षेपसे ही किया। परन्तु यहाँ जब अर्जुन कहते हैं कि मैं आपके एक रूपको देखना चाहता हूँ -- 'द्रष्टुमिच्छामि ते रूपम्', तब भगवान् आगे कहेंगे कि तू मेरे सैकड़ों-हजारों रूपोंको देख (11। 5)। जैसे संसारमें कोई किसीसे लालचपूर्वक अधिक माँगता है, तो देनेवालेमें देनेका भाव कम हो जाता है और वह कम देता है। इसके विपरीत यदि कोई संकोचपूर्वक कम माँगता है, तो देनेवाला उदारतापूर्वक अधिक देता है। ऐसे ही वहाँ अर्जुनने स्पष्टरूपसे कह दिया कि आप सब-की-सब विभूतियाँ कह दीजिये तो भगवान्ने कहा कि मैं अपनी विभूतियोंको संक्षेपसे कहूँगा। इस बातको लेकर अर्जुन सावधान हो जाते हैं कि अब मेरे कहनेमें ऐसी कोई अनुचित बात न आ जाय। इसलिये अर्जुन यहाँ संकोचपूर्वक कहते हैं कि अगर मेरे द्वारा आपका विराट्रूप देखा जा सकता है तो दिखा दीजिये। अर्जुनके इस संकोचको देखकर भगवान् बड़ी उदारतापूर्वक कहते हैं कि तू मेरे सैकड़ों-हजारों रूपोंको देख ले।दूसरा भाव यह है कि अर्जुनके रथमें एक जगह बैठे हुए भगवान्ने यह कहा कि 'तू जो मेरे इस शरीरको देख रहा है, इसके किसी एक अंशमें सम्पूर्ण जगत् (जिसके अन्तर्गत अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड हैं) व्याप्त है।' तात्पर्य है कि भगवान्का छोटा-साशरीर है और उस छोटे-से शरीरके किसी एक अंशमें सम्पूर्ण जगत् है। अतः उस एक अंशमें स्थित रूपको मैं देखना चाहता हूँ -- यही अर्जुनके 'रूपम्' (एक रूप) कहनेका आशय मालूम देता है।
Sanskrit Commentaries
13
।।11.3।।No commentary.
।।11.3।।त्वदुक्तेऽर्थे विश्वासाभावान्न तस्य दिदृक्षा किंतु कृतार्थीबुभूषयेत्याह -- एवमेतदिति। येन प्रकारेण सोपाधिकेन निरुपाधिकेन चेत्यर्थः। यदि ममाप्तत्वं निश्चित्य मद्वाक्यं ते मानं तर्हि किमिति मदुक्तं दिदृक्षते कृतार्थीबुभूषयेत्युक्तं मत्वाह -- तथापीति। चतुर्भुजादिरूपनिवृत्त्यर्थमाह -- ऐश्वरमिति। तद्व्याचष्टे -- ज्ञानेत्यादिना।
।।11.3।।त्वदुक्तं सर्वं यथार्थमित्यभिनन्दन् अभीष्टमाविष्करोति -- एवमिति। यथा येन प्रकारेणं त्वं कथयसि एतदेवमेव न ममासंभावनाविपरीतभावना वा परमेश्वरे त्वयि वक्तरि असंभावनादेरसंभवादिति सूचयन्संबोधयति -- हे परमेश्वररेति। यद्यप्येवं तथापि कृतार्थीबुभूषया ते रुपं द्रस्टुमिच्छामि। निरुपाधिकदर्शनासंभवमभिप्रेत्य रुपं विशिनष्टि। ऐश्वरं ऐश्वर्यशक्त्यादिसंपन्नम्। पुरुषोत्तमेतिसंबोधयन् वस्तुतः क्षराक्षरातीतस्य तव क्षराक्षरात्मकमैश्वरं रुपमत्यद्भुत्मिति तद्दर्शने ममोत्कण्ठा महती वर्तत इति ध्वनयति।
।।11.3।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
।।11.3।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
।।11.3।।एवमेतदिति। हे परमेश्वर? यथा येन प्रकारेण सोपाधिकेन निरुपाधिकेन च निरतिशयैश्वर्येणात्मानं त्वमात्थ कथयसि त्वं एवमेतन्नान्यथा। त्वद्वचसि कुत्रापि ममाविश्वासशङ्का नास्त्येवेत्यर्थः। यद्यप्येवं तथापि कृतार्थीबुभूषया द्रष्टुमिच्छामि ते तव रूपमैश्वरं ज्ञानैश्वर्यशक्तिबलवीर्यतेजोभिः संपन्नमद्भुतम्। हे पुरुषोत्तमेति संबोधनेन त्वद्वचस्यविश्वासो मम नास्ति दिदृक्षा च महती वर्तत इति सर्वज्ञत्वात्त्वं जानासि सर्वान्तर्यामित्वाच्चेति सूचयति।
।।11.3।।एवमिति। यच्च त्वंविष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् इति आत्मानं जगदाधारमात्थ तदपि इत्थमेव न ममात्रासंभावनास्ति। हे परमेश्वर? ते तव रूपं ऐश्वरमीश्वरस्येदं विश्वात्मकं मायामयमित्यर्थः। हे पुरुषोत्तम क्षराक्षरातीत? विश्वरूपं मायामयं? वास्तवं तु रूपं मायातीतमित्यैश्वरमिति पुरुषोत्तमेति च पदाभ्यां लभ्यते। तथाच वक्ष्यतिमाया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद। सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैवं मां ज्ञातुमर्हसि इति। उक्तं च शुद्धं रूपमभिप्रेत्यअव्यक्तोऽयमिन्त्योऽयम् इति।
।।11.3।।कथं ज्ञातव्यं मोहो नष्ट इति इत्याशङ्कृय नष्टमोहानां भगवद्वाक्ये विश्वासो नियत इति तदाह -- एवमिति। हे परमेश्वर सर्वाधीश यथा त्वमात्मानं स्वस्वरूपमात्थ वदसिन मे विदुः [10।2] इत्यनेन सर्वाज्ञातत्वं?विष्टभ्याहम् [10।42] इत्यनेन सर्वात्मत्वंददामि बुद्धियोगं तं [10।10] इत्यादिना स्वकृपयैव ज्ञातत्वम्? एवमेतत् यथार्थमेवेत्यर्थः। यथार्थत्वोक्त्या पूर्वमज्ञातस्वरूपोऽहम्? अधुना विभूतिनिरूपणेनविष्टभ्याहं इति कृपोक्त्या च तच्चिन्तनेन सर्वात्मत्वज्ञानयुक्तो जात इति स्वानुभवो व्यञ्जितः। अथातो ज्ञातस्वरूपस्तद्रूपं दर्शयेत्याह -- द्रष्टुमिति। हे पुरुषोत्तम ते तवैव तत्सम्बन्धिनामैश्वरं नानाविलासकं रूपं द्रष्टुमिच्छामि।
।।11.3।।हे परमेश्वर एवम् एतद् इति अवधृतं यथा आत्थ त्वम् आत्मानं ब्रवीषि। पुरुषोत्तम आश्रितवात्सल्यजलधे तव ऐश्वरं त्वदसाधारणं सर्वस्य प्रशासितृत्वे पालयितृत्वे स्रष्ट्टत्वे संहर्तृत्वे भर्तृत्वे कल्याणगुणाकरत्वे परतरत्वे सकलेतरविसजातीयत्वे च अवस्थितं रूपं द्रष्टुम् साक्षात्कर्तुम् इच्छामि।
।।11.3।। --,एवमेतत् नान्यथा यथा येन प्रकारेण आत्थ कथयसि त्वम् आत्मानं परमेश्वर। तथापि द्रष्टुमिच्छामि ते तव ज्ञानैश्वर्यशक्तिबलवीर्यतेजोभिः संपन्नम् ऐश्वरं वैष्णवं रूपं पुरुषोत्तम।।
।।11.3।। किंच -- एवमिति।भवाप्ययौ हि भूतानाम् इत्यादि मया श्रुतं यथा चेदानीमात्मानं त्वमात्थविष्टभ्याहमिदं कृत्स्नम् इत्येवं कथयसि हे परमेश्वर? एवमेतत्। अत्राप्यविश्वासो मम नास्तीत्यर्थः। तथापि हे पुरुषोत्तम्? तवैश्वरं ज्ञानैश्वर्यशक्तिबलवीर्यतेजोभिः संपन्नं त्वद्रूपं कौतूहलादहं द्रष्टुमिच्छामि।
।।11.3।।एवमेतदिति। सत्यमेवैतत्? अत्राविश्वासो मम नास्तीति। परं तादृश्यैश्वर्यं योगाख्यं यत्र तत्तवैश्वरं रूपं द्रष्टुमिच्छामि। हे पुरुषोत्तम नहि मादृशस्त्वयि सति न सिद्धमनोरथो भवितुमर्हतीति भावः।
।।11.3।।परमेश्वर इत्यनेन वाक्यार्थविश्वासहेतुभूतं परमाप्तत्वादिकं विवक्षितमित्यभिप्रायेणाह -- हे परमेश्वरेति। तद्व्यञ्जनाय स्वसंवादमात्रार्थत्वव्युदासेन श्रुतप्रतिष्ठापनाय चाहएवमेतदित्यवधृतमिति। आश्रितजने दोषदर्शिनः कापुरुषा इति ह्याहुः। अतोऽत्र दिदृक्षमाणे स्वस्मिन् दोषानादररूपनिरतिशयपौरुषं पुरुषोत्तमशब्देन विवक्षितमित्यभिप्रायेणआश्रितवात्सल्यैकजलध इत्युक्तम्। पुरु सनोतीति वा व्युत्पत्तिरिहाभिप्रेताआविश्य बिभति [15।17] इति वक्ष्यमाणं वा ज्ञापितम्। एवं परत्वसौलभ्ये समाख्याभ्यामुक्ते।ते इति निर्देशे सत्यपिऐश्वरम् इति वचनमीश्वरत्वस्वभावाभिव्यञ्जकत्वपरमित्यभिप्रायेणत्वदसाधारणमित्युक्तम्। तस्यैव प्राक्प्रपञ्चितप्रक्रियया विवरणंसर्वस्येत्यादि। एवं स्वभावविशिष्टो हीश्वरशब्दार्थ इति भावः। प्रशासितृत्वादौ रूपस्यावस्थानं नाम तदनुरूपैर्गुणसन्नहनचेष्टितैस्तत्तदभिव्यञ्जकत्वम्। यद्वा प्रशासितृत्वेऽवस्थानंयथार्हं केशवे वृत्तिमवशाः प्रतिपेदिरे [म.भा.2।68।11] इति न्यायेन स्वदर्शनमात्रेण विपरीताध्यवसायं विनिवर्त्य सम्यक्प्रवृत्तिहेतुत्वात्। कल्याणगुणाकरत्वेऽवस्थानं नाम अवतारविग्रहवदज्ञत्वाद्यभिनयानर्हत्वम्। पालयितृत्वेऽवस्थानं तु सत्त्वप्रर्वतनादिमुखेन। स्रष्ट्टत्वेऽवस्थानं स्वावयवेभ्यो ब्रह्मरुद्रादीनां चातुर्वर्ण्यादीनां च प्रसूतेः। संहर्तृत्वेऽवस्थानं तु वक्ष्यमाणग्रसनादिना। भर्तृत्वेऽवस्थितिस्तुतत्रैकस्थम् [11।13] इत्यादिभिः स्फुटीभविष्यति। परत्वेन शङ्कितानां ब्रह्मरुद्रादीनां स्वैकदेशेऽवस्थानस्यब्रह्माणमीशम् [11।15] इत्यादिना वक्ष्यमाणतया परतरत्वेऽवस्थानं युक्तम्।सकलेतरविसजातीयत्व इति तूक्तसमस्तनिगमनम् तत्फलितं वा परमेश्वरपुरुषोत्तमसम्बुध्यभिप्रेतकथनं वा।पश्य मे योगमैश्वरम् इति गुह्यतमारम्भे स्वयमुक्तस्यापातप्रतीतार्थस्य दर्शनप्रार्थनानुसारेणरूपमैश्वरम् इति। स्वरूपपरतया योजनायाम्ऐश्वरम् इत्येकमौपचारिकम् इतरत्सर्वं मुख्यम्। स्वरूपानुबन्धेन तु विग्रहदिदृक्षा गर्भिता। रूपशब्दः स्वरूपरूपादिसमस्तासाधारणाकारपरो वा। रूपं प्रकारमित्यर्थः।द्रष्टुम् इत्युक्ते दर्शनसमानाकारेऽपि ज्ञाने दर्शनशब्दप्रयोगात्तद्व्यवच्छेदार्थं चाक्षुषज्ञानमात्रपरत्वं च व्यवच्छेत्तुंसाक्षात्कर्तुमित्युक्तम्।