Adhyay 18 • Shlok 4

निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम | त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ||१८-४||

Roman Transliteration (IAST)

niścayaṃ śṛṇu me tatra tyāge bharatasattama . tyāgo hi puruṣavyāghra trividhaḥ samprakīrtitaḥ ||18-4||

Translations

English Translations 9
A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada English

O best of the Bhāratas, now hear My judgment about renunciation. O tiger among men, renunciation is declared in the scriptures to be of three kinds.

Dr.S.Sankaranarayan English

18.4. O best of Bharata's descendants ! Listen to My considered view about relinishing : Indeed the act of relinishing is rightly spoken to be three-fold, O best among men !

Shri Purohit Swami English

18.4 O best of Indians! Listen to my judgment as regards this problem. It has a threefold aspect.

Sri Abhinav Gupta English

18.4 See Comment under 18.11

Sri Ramanuja English

18.4 Regarding contradictory versions on Tyaga among disputants, listen from Me My decision. Tyaga has been described by Me in respect of actions prescribed by the scriptures from three points of view: (1) as referring to fruits, (2) as referring to acts themselves and, (3) as referring to agency. It is contained in the statement, 'Surrendering all your actions to Me with a mind focussed on the self,' and 'Free from desire and selfishness and cured of fever - fight' (3.30). The renunciation of fruits consists in the following manner. 'Heaven and such other results arising from acts do not belong to Me.' Renunciation of acts is complete abandonment of the sense of possession in regard to one's acts. This sense of possession is of the following nature: 'Those acts are mine on account of their being the means for fruits which are to be mine.' Renunciation referring to agency is the renunciation of agency of oneself by ascribing the agency to the Lord of all.

Sri Shankaracharya English

18.4 Bharata-sattama, O the most excellent among the descendants of Bharata; srnu, hear, understand; me, from Me, from My statement; niscayam, the firm conclusion; tatra tyage, regarding that tyaga, regarding these alternative veiws on tyaga and sannyasa as they have been shown. Hi, for; purusavyaghra, O greatest among men; tyagah, tyaga; samprakirtitah, has been clearly declared, has been distinctly spoken of in the scriptures; to be trividhah, of three kinds, threefold, under the classes of tamasa (those based on tamas [Tamas: darkness, mental darkness, ignorance; one of the three alities of everything in Nature. Also see 14.8, and note under 2.45.-Tr.], etc. The Lord has used the word tyaga with the idea that the (primary) meanings of tyaga and sannyasa are verily the same. Since it is difficult to comprehend this idea, that the primary meanings of the words tyaga and sannyasa can be threefold under the classification based on tamas etc. in the case of one who is unenlightened and who is alified for rites and duties-but not in the case of one who has realized the supreme Goal-,therefore no one else is capable of speaking the truth in this connection. Hence, listen to the firm conclusion of the Lord with regard to the supreme Truth as revealved by the scriptures. Which, again, is this firm conclusion? In reply the Lord says:

Swami Adidevananda English

18.4 Listen to My decision, O Arjuna, about abandonment; for abandonment (Tyaga) is declared to be of three kinds.

Swami Gambirananda English

18.4 O the most excellent among the descendants of Bharata, hear from Me the firm conclusion regarding that tyaga. For, O greatest among men, tyaga has been clearly declared to be of three kinds.

Swami Sivananda English

18.4 Hear from Me the conclusion or the final truth about this abandonment, O best of the Bharatas; abandonment, verily, O best of men, has been declared to be of three kinds.

Hindi Translations 3
Sri Shankaracharya Hindi

।।18.4।।इन विकल्पभेदोंमें --, हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठतम अर्जुन उस पूर्वदर्शित त्यागके विषयमें? अर्थात् त्यागसंन्यास सम्बन्धी विकल्पोंके विषयमें? तू मेरा निश्चय सुन? अर्थात् मेरे वचनोंसे कहा हुआ तत्त्व भली प्रकार समझ। त्याग और संन्यासशब्दका जो वाच्यार्थ है वह एक ही है? इस अभिप्रायसे केवल त्यागके नामसे ही,( प्रश्नका ) उत्तर देते हैं। हे पुरुषसिंह ( उस ) त्यागका शास्त्रोंमें तामस आदि तीन प्रकारके भेदोंसे भली प्रकार निरूपण किया गया है। जिससे कि आत्मज्ञानरहित कर्माधिकारी -- कर्मी पुरुषका ही त्यागसंन्यासशब्दका वाच्यार्थ ( संन्यास ) तामस आदि भेदोंसे तीन प्रकारका होना सम्भव है? परमार्थज्ञानी नहीं यह अभिप्राय समझमें आना बड़ा कठिन है? इसलिये इस विषयमें यथार्थ तत्त्व बतलानेको दूसरा कोई समर्थ नहीं है? अतः तू मुझ ईश्वरका शास्त्रोंके यथार्थ अभिप्रायसे युक्त निश्चय सुन।

Swami Ramsukhdas Hindi

।।18.4।। हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! तू संन्यास और त्याग -- इन दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें मेरा निश्चय सुन; क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ ! त्याग तीन प्रकारका कहा गया है।

Swami Tejomayananda Hindi

।।18.4।। हे भरतसत्तम ! उस त्याग के विषय में तुम मेरे निर्णय को सुनो। हे पुरुष श्रेष्ठ ! वह त्याग तीन प्रकार का कहा गया है।।

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Commentaries & Exposition

English Commentaries 2
A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada Bhashya

Although there are differences of opinion about renunciation, here the Supreme Personality of Godhead, Śrī Kṛṣṇa, gives His judgment, which should be taken as final. After all, the Vedas are different laws given by the Lord. Here the Lord is personally present, and His word should be taken as final. The Lord says that the process of renunciation should be considered in terms of the modes of material nature in which it is performed.

Swami Sivananda Bhashya

18.4 निश्चयम् conclusion or the final truth? श्रृणु hear? मे My? तत्र there? त्यागे about abandonment? भरतसत्तम O best of the Bharatas? त्यागः abandonment? हि verily? पुरुषव्याघ्र O best of men? त्रिविधः of three kinds? संप्रकीर्तितः has been declared (to be).Commentary Now the Lord gives His own decisive opinion. It is declared in the scriptures that renunciation is of three kinds? viz.? Sattvic? Rajasic and Tamasic. The Lord alone can teach the truth about the subject. Whoever wants to be liberated from the miseries of this world must understand the real nature of renunciation.

Hindi Commentaries 2
Swami Chinmayananda Bhashya

।।18.4।। इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को वचन देते हैं कि वे त्याग के स्वरूप का सम्पूर्ण विवेचन करेंगे।सामान्य मनुष्य के लिए किसी प्रकार का भी त्याग करना सरल कार्य़ नहीं होता संचय और समृद्धि मानो मन के प्राण ही हैं। इसलिए? स्वाभाविक है कि अर्जुन के श्रेष्ठ गुणों को जागृत करने के लिए भगवान् उसे भरतसत्तम और पुरुषव्याघ्र कहकर सम्बोधित करते हैं।अध्ययन की दृष्टि से त्याग का तीन भागों में वर्गीकरण किया गया है। सम्पूर्ण गीता में यह त्रिविध वर्गीकरण पाया जाता है? और वे तीन वर्ग हैं सात्त्विक? राजसिक और तामसिक।भगवान् कहते हैं

Swami Ramsukhdas Bhashya

।।18.4।। व्याख्या --   निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम -- हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन अब मैं संन्यास और त्याग -- दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें अपना मत कहता हूँ? उसको तुम सुनो।त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः -- हे पुरुषव्याघ्र त्याग तीन तरहका कहा गया है -- सात्त्विक? राजस और तामस। वास्तवमें भगवान्के मतमें सात्त्विक त्याग ही त्याग है परन्तु उसके साथ राजस और तामस त्यागका भी वर्णन करनेका तात्पर्य यह है कि उसके बिना भगवान्के अभीष्ट सात्त्विक त्यागकी श्रेष्ठता स्पष्ट नहीं होती क्योंकि परीक्षा या तुलना करके किसी भी वस्तुकी श्रेष्ठता सिद्ध करनेके लिये दूसरी वस्तुएँ सामने रखनी ही पड़ती हैं।तीन प्रकारका त्याग बतानेका तात्पर्य यह भी है कि साधक सात्त्विक त्यागको ग्रहण करे और राजस तथा तामस त्यागका त्याग करे।

Sanskrit Commentaries 13
Sri Abhinav Gupta Bhashya

।।18.4 -- 18.11।।तदत्रैव विशेषनिर्णयाय मतान्युपन्यस्यति -- त्याज्यमिति। दोषवत् हिंसादिमत्त्वात् ( S हिंसादित्त्वात ?N हिंसादिसत्त्वात् ) पापयुक्तम्। तत् कर्म,( S??N substitutes फलं for कर्म ) त्याज्यम्? न सर्वं शुभफलम् इति केचित् त्यागे विशेषं मन्यन्ते सांख्यगृह्या इव। अन्ये तु मीमांसककञ्चुकानुप्रविष्टाः ( K मीमांसाकंचुक -- ) -- क्रत्वर्थोऽहि शास्त्रादवगम्यते ( S. IV? i? 2 ) इति। तथातस्माद्या वैदिकी हिंसा -- ( SV. I? i? 2? verse 23 )इत्यादिनयेन इतिकर्तव्यतांशभागिनी हिंसा ( S??N omit हिंसा ) हिंसैव न भवति। न हिंस्यात् इति सामान्यशास्त्रस्य तत्र बाधनात् श्येनाद्येव तु ( श्येन द्येव न तु ) हिंसा।फलांशे भावनायाश्च प्रत्ययोऽनुविधायकः ( SV? I? i? 2? verse 222 ) इति। अ [ तोऽ ] न्यान् हिंसादियोगिनोऽपि न त्यजेत्। शास्त्रैकशरणकार्याकार्यविभागाः पण्डिता इति मन्यन्ते।।3।।निश्चयमित्यादि अभिधीयते इत्यन्तम्। तत्र त्वयं निश्चयः -- प्राग्लक्षितगुणस्वरूपवैचित्र्यात् त्यागस्यैव सत्त्वरजस्तमोमय्या चित्तवृत्त्या क्रियमाणस्य तद्विशिष्टस्वभावावभासित [ त्वात् ] वस्तुस्थित्या त्यागो नाम परब्रह्मविदां ( ? N परमब्रह्म -- ) सिद्ध्यसिद्ध्यादिषु समतया रागद्वेषपरिहारेण फलप्रेप्साविरहेण ( फलप्रेक्षा) कर्मणां निर्वर्त्तनम्। अत एव आह -- राजसं तामसं च त्यागं कृत्वा न कश्चित् ( न किंचित् ) [ त्याग ] फलसंबन्धः? इति। सात्त्विकस्य तु त्यागात् ( त्यागस्य )। शास्त्रार्थपालनात्मकं फलम्। त्यक्तगुणग्रामग्रहस्य पुनर्मुनेः सत्यतः त्यागवाचो युक्तिरुपपत्तिमती।

Sri Anandgiri Bhashya

।।18.4।।कर्माधिकृतान्प्रत्येवोक्तविकल्पप्रवृत्तावपि कुतो निर्धारणसिद्धिस्तत्राह -- तत्रेति। तमेव निश्चयं दर्शयितुमादौ त्यागगतमवान्तरविभागमाह -- त्यागो हीति। ननु त्यागसंन्यासयोरुभयोरपि प्रकृतत्वाविशेषे त्यागस्यैवावान्तरविभागाभिधाने संन्यासस्योपेक्षितत्वमापद्येत नेत्याह -- त्यागेति। सात्त्विको राजसस्तामसश्चेत्युक्तेऽर्थे त्रैविध्येऽपि स्वयमेव निश्चयासंभवात्किमत्र भागवतेन निश्चयेनेत्याशङ्क्याह -- यस्मादिति। भगवतोऽन्येनोक्तविभागे तत्त्वानिश्चयाद्भागवतनिश्चयस्य श्रोतव्यतेति निगमयति -- तस्मादिति।

Sri Dhanpati Bhashya

।।18.4।।एवं मतभेदेन संन्यासत्यागशब्दार्थयोस्तत्त्वं पृथगुक्त्वा स्वाभिमतं तयोरैक्यं दर्शियितुमाह -- निश्चयमिति। तत्र त्यागे त्यागसंन्यासविकल्पे मे मम वचनान्निश्चयं श्रृण्ववधारय। त्यागसंन्यासवाच्यो योर्थः स एकएवेत्यभिप्रेत्याह। त्यागस्त्रिविधः त्रिप्रकारः तामसादिप्रकारैः संप्रकीर्तितः सम्यक्शास्त्रेषु कथितः हि चस्मात्त्यागसंन्यासशब्दवाच्योऽर्थोधिकृतस्य कर्मिणोऽनात्मज्ञस्य तामसादिभेदेन त्रिविधः शास्त्रेषु संप्रकीर्तितः सर्वशास्त्र्ज्ञादीश्वरादन्येन वक्तुमशक्यः। तस्मादत्र दुर्विज्ञानेऽर्थे परमार्थशास्त्रार्थविषयमैश्वरं निश्चयमध्वसायं श्रुणु। भरतानां क्षत्रियवराणां मध्ये सत्तम साधुतमेति संबोधयन् क्षत्रियवरैः कर्तव्ये त्यागे संन्यासे च मयोत्यमानं निश्चयं श्रृण्विति ध्वनयति। न केवलं क्षत्रियवरैरेव कर्तव्ये त्यागसंन्याससश्ब्दार्थे निश्चयो मयोच्यतेऽपितु पुरुषश्रेष्ठैरन्यैपरि कर्माधिकृतैरज्ञैः कर्तव्ये तस्मन्निति ध्वनयन् संबोधयति पुरुषव्याघ्रेति।

Sri Jayatritha Bhashya

।।18.4।।न केवलं मनीषिण इति विशेषणसामर्थ्यादिवमुच्यते? किन्तु भगवताऽपि तदविरोधप्रकारस्य व्युत्पाद्यमानत्वादिति भावेनोत्तरवाक्यतात्पर्यमाह -- तदिति। न तु परमहंसानां यज्ञदानयोरभावात् कथमुच्यतेन त्याज्यं कार्यमेव तत् [18।5] इति तत्राऽऽह यज्ञेति। ननु ज्योतिष्टोमादिकमेव यज्ञो धनदानादिकमेव दानं गृहीत्वा पारमहंस्यमेव कुतो न निराक्रियते इत्यत आह -- अन्यथेति। यतिर्हंसादिः। आस्थातुं प्राप्तुम्। उत्तमाश्रमं पारमहंस्यम्। नन्वेतेषां मध्य इत्येवं व्याख्यानेऽपि कथं परमहंसानां यज्ञादिसम्भव इत्यत आह -- ज्ञानेति। बहुव्रीहित्रयगर्भः कर्मधारयोऽयम्। विद्याभयविषयं दानं येषां ते तथोक्तास्ते परमहंसाः। ननु पारमहंस्ये हि प्रवृत्तः प्रियव्रतो हिरण्यगर्भेण निवारित इति पुराणेषूच्यते [भाग.5।1।1119] तत्कथं पारमहंस्यकर्तव्यता इत्यत आह -- अत इति। उक्तवाक्याविरोधादेव वाक्यत्वाविशेषात् पुराणवाक्येनैव स्मृतेर्बाधः किं न स्यात् इत्याह -- अन्यथेति। एवमयोजने इतरेषां ब्रह्मचारीत्यादीनां गत्यन्तराभावादप्रामाण्यमेव प्रसज्यत इति शेषः। एवं परमहंसानामपि यज्ञादिकर्तव्यतासम्पादनेनेदमपि परास्तम्। यत्केनचिदुक्तम् --,अज्ञान्कर्मण्यधिकारिणोऽधिकृत्य एतत्प्रकरणं प्रवृत्तं? न परमहंसपरिव्राजकानिति।

Sri Madhavacharya Bhashya

।।18.4।।तत्प्रकारं चाह -- निश्चयमित्यादिना। यज्ञभेद उक्तःद्रव्ययज्ञाः [4।28] इत्यादिना। दाने त्वभयदानमन्तर्भवति। एतेषां मध्ये यत्किञ्चिद्यज्ञादिकं कर्तव्यमेवेत्यर्थः। अन्यथाब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिस्तथा। यदीच्छेन्मोक्षमास्थातुमुत्तमाश्रममाश्रयेत् इत्यादिव्यासस्मृतिविरोधः। ज्ञानयज्ञविद्याभयदानब्रह्मचर्यादितपसो हि ते। अतो यद्वचोऽन्यथाप्रतीयतेऽधिकारभेदेन तद्योज्यम्। अन्यथेतरेषां गत्यभावात्।

Sri Madhusudan Saraswati Bhashya

।।18.4।।निश्चयमिति। एवं विप्रतिपत्तौ तत्र त्वया पृष्टे कर्माधिकारिकर्तृके संन्यासत्यागशब्दाभ्यां प्रतिपादिते त्यागे फलाभिसन्धिपूर्वककर्मत्यागे मे मम वचनान्निश्चयं पूर्वाचार्यैः कृतं शृणु। हे भरतसत्तम? किं तत्र दुर्ज्ञेयमस्तीत्यत आह पुरुषेति। हे पुरुषव्याघ्र पुरुषश्रेष्ठ? हि यस्मात् त्यागः कर्माधिकारिकर्तृकः फलाभिसन्धिपूर्वककर्मत्यागस्त्रिविधस्त्रिप्रकारस्तामसादिभेदेन संप्रकीर्तितः। अथवा विशिष्टाभावरूपस्त्यागो विशेषणाभावाद्विशेष्याभावादुभयाभावाच्च त्रिविधः संप्रकीर्तितः। तथाहि फलाभिसन्धिपूर्वककर्मत्यागः सत्यपि कर्मणि फलाभिसन्धित्यागादेकः? सत्यपि फलाभिसन्धौ कर्मत्यागाद्वितीयः? फलाभिसन्धेः कर्मणश्च त्यागात्तृतीयः। तत्र प्रथमः सात्त्विक आदेयो द्वितीयस्तु हेयो द्विविधो दुःखबुद्ध्या कृतो राजसो विपर्यासेन कृतस्तामसः। एतावान्कर्माधिकारिकर्तृकस्त्यागोऽर्जुनस्य प्रश्नविषयः? तृतीयस्तु कर्मानधिकारिकर्तृको नैर्गुण्यरूपो नार्जुनप्रश्नविषयः। सोऽपि साधनफलभेदेन द्विविधः। तत्र सात्त्विकेन फलाभिसन्धित्यागपूर्वककर्मानुष्ठानरूपेण त्यागेन शुद्धान्तःकरणस्योत्पन्नविविदिषस्यात्मज्ञानसाधनश्रवणाख्यवेदान्तविचारस्य फलाभिसन्धिरहितस्यान्तःकरणशुद्धौ सत्यां तत्साधनस्य कर्मणो वैतुष्ये जात इवावहननस्य परित्यागः स एकः साधनभूतो विविदिषासंन्यास उच्यते? तमग्रे नैष्कर्म्यसिद्धिं परमामिति वक्ष्यति। द्वितीयस्तु जन्मान्तरकृतसाधनाभ्यासपरिपाकादस्मिञ्जन्मन्यादावेवोत्पन्नात्मबोधस्य कृतकृत्यस्य स्वत एव फलाभिसन्धेः कर्मणश्च परित्यागः फलभूतः स विद्वत्संन्यास इत्युच्यते। स तु यस्त्वात्मरतिरेव स्यादित्यादि श्लोकाभ्यां प्राग्व्याख्यातः स्थितप्रज्ञलक्षणादिभिश्च बहुधा प्रपञ्चितः। यस्मादेवं त्यागस्य तत्त्वं दुर्ज्ञेयं त्वया चोक्तं तत्त्वं वेदितुमिच्छामीति? अतो मम सर्वज्ञस्य वचनाद्विद्धीत्यभिप्रायः। संबोधनद्वयेन कुलनिमित्तोत्कर्षः पौरुषनिमित्तोत्कर्षश्च योग्यतातिशयसूचनायोक्तः।

Sri Neelkanth Bhashya

।।18.4।।निश्चयमिति। तत्र कर्मणां त्यागात्त्यागविषये विप्रतिपत्तौ सत्यां प्रथमोपात्ते त्यागे विषये मे मद्वचनान्निश्चयं श्रृणु। हि यस्मात् हे पुरुषव्याघ्र? त्यागः त्रिविधः सात्त्विकराजसतामसभेदेन त्रिप्रकारः परिकीर्तितः शास्त्रे। दृढवैराग्यपूर्वकः कर्मसंन्यासः सात्त्विकः? आयासभयात्तत्त्यागो राजसः? मौढ्यात्तत्त्यागस्तामस इति? तस्माद्गहनत्वात्त्यागो निश्चयेन विचारणीय इत्यर्थः।

Sri Purushottamji Bhashya

।।18.4।।एवं सर्वेषां तत्त्वाज्ञानेन मतान्युक्त्वा तन्मतेषु तत्त्वज्ञानार्थं तन्मतनिश्चितं स्वमतमाह -- निश्चयमिति। तत्र बहुभिर्बहुधा प्रपञ्चिते त्यागे हे भरतसत्तम सत्कुलोत्पन्नत्वेन श्रवणयोग्य मे मत्तो निश्चयं निर्धारितं शृणु। एवमभिमुखीकृत्याऽऽह -- त्याग इति। हे पुरुषव्याघ्र पुरुषश्रेष्ठ पुरुषस्य भगवद्भजनाधिकारित्वात्तेषु श्रेष्ठत्वोक्तौ व्याघ्रत्वोक्त्या तथा श्रवणानन्तरं करणेन पौरुषप्रकटनसमर्थत्वं ज्ञापयित्वाऽऽह -- त्यागो हीति। त्यागो निश्चयेन त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः सम्यक्प्रकारेण कथितः।

Sri Ramanuja Bhashya

।।18.4।।तत्र एवं वादिविप्रतिपन्ने त्यागे त्यागविषयं निश्चयं मे मत्तः श्रृणु। त्यागः क्रियमाणेषु एव वैदिकेषु कर्मसु फलविषयतया? कर्मविषयतया? कर्तृत्वविषयतया च पूर्वम् एव हि मया त्रिविधःसंप्रकीर्तितः -- मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा। निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः।। (गीता 3।30) इति।कर्मजन्यं स्वर्गादिकं फलं मम न स्याद् इति फलत्यागः। मदीयफलसाधनतया मदीयम् इदं कर्म इति कर्मणि ममतायाः परित्यागः कर्मविषयः त्यागः सर्वेश्वरे कर्तृत्वानुसन्धानेन आत्मनः कर्तृतात्यागः कर्तृत्वविषयः त्यागः।

Sri Shankaracharya Bhashya

।।18.4।। --,निश्चयं श्रृणु अवधारय मे मम वचनात् तत्र त्यागे त्यागसंन्यासविकल्पे यथादर्शिते भरतसत्तम भरतानां साधुतम। त्यागो हि? त्यागसंन्यासशब्दवाच्यो हि यः अर्थः सः एक एवेति अभिप्रेत्य आह -- त्यागो हि इति। पुरुषव्याघ्र? त्रिविधः त्रिप्रकारः तामसादिप्रकारैः संप्रकीर्तितः शास्त्रेषु सम्यक् कथितः यस्मात् तामसादिभेदेन त्यागसंन्यासशब्दवाच्यः अर्थः अधिकृतस्य कर्मिणः अनात्मज्ञस्य त्रिविधः संभवति? न परमार्थदर्शिनः? इत्ययमर्थः दुर्ज्ञानः? तस्मात् अत्र तत्त्वं न अन्यः वक्तुं समर्थः। तस्मात् निश्चयं परमार्थशास्त्रार्थविषयम् अध्यवसायम् ऐश्वरं मे मत्तः श्रृणु।।कः पुनः असौ निश्चयः इति? आह --,

Sri Sridhara Swami Bhashya

।।18.4।।एवं मदभेदमुपन्यस्य स्वमतं कथयितुमाह -- निश्चयमिति। तत्रैवं विप्रतिपन्ने त्यागे निश्चयं मे वचनाच्छृणु। त्यागस्य लोकप्रसिद्धत्वात्किमत्र श्रोतव्यमिति मावमंस्था इत्याह -- हे पुरुषव्याघ्र पुरुषश्रेष्ठ? त्यागोऽयं दुर्बोधः। हि यस्मादयं,कर्मत्यागस्तत्त्वविद्भिस्तामसादिभेदेन त्रिविधः सम्यग्विवेकेन प्रकीर्तितः। त्रैविध्यं चनियतस्य तु संन्यासः कर्मणः इत्यादिना वक्ष्यति।

Sri Vallabhacharya Bhashya

।।18.4।।एवं हि श्रौतो निर्णयः? न तं निश्चिन्वन्तीति स्वयं निर्णयमाह -- निश्चयं श्रृण्विति। स एव त्यागोऽन्यथाकृतश्चेद्गौणो भवेदित्याह। त्रिविधः तामसो राजसः सात्त्विकश्चेति प्रकीर्तितः। उक्तश्लोके वा त्रिविधः कीर्त्तितः।मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्य [3।30] इत्यत्र निराशीः कामशून्यः निर्मम इति फलकर्मणोर्ममतारहितः (भूत्वा) एवं मयि कर्माणि सन्न्यस्य समर्प्य तत्कर्तृत्वं मय्यनुसन्धायतदधीनशक्तिरिदं करोमि इति धिया कृतकर्मसु कर्त्तृत्वममत्त्वफलानां त्यागो यः स सन्न्यास इति।

Vedantadeshikacharya Venkatanatha Bhashya

।।18.4।।तत्र इति शब्दः प्रकृते विप्रतिपत्तिविषयतानुवादमुखेन न्यायप्रवृत्तिविषयसन्दिग्धताद्योतक इत्यभिप्रायेणाऽऽहएवं वादिविप्रतिपन्न इति।मे निश्चयम् इत्यनेन मतान्तरोत्थानशङ्काव्युदासायाऽऽहत्यागविषयं निश्चयं मत्तः शृण्विति। मत्तः भ्रमादिदोषरहितादित्यर्थः।त्यागो हि इत्यादिकं न वक्ष्यमाणसात्त्विकत्यागादित्रैविध्यविषयं? किन्तु सात्त्विकत्यागावान्तरभेदविषयंसम्प्रकीर्तितः इत्यस्य,प्रागुक्ततत्परत्वस्वारस्यात्। हिशब्देन श्रोतृसम्प्रतिपत्त्यादिप्रतीतेश्चेत्यभिप्रायेणाऽऽहत्यागः क्रियमाणेष्वेवेत्यादि।मयि सर्वाणि इत्येक एव श्लोकस्त्रिविधत्यागपर इति अत्र निष्फलानुष्ठानस्वरूपत्यागं? साङ्ख्यमतशङ्कां च प्रतिक्षेप्तुं त्रयाणां स्वरूपं विविनक्तिकर्मजन्यमित्यादिना।मदीयफलसाधनतयेत्यादि -- स्वकीयप्रीतिसाधनतया स्वार्थमेव भगवान् प्रवर्तयतीति हि मुमुक्षोरनुसन्धानमिति भावः। स्वकर्तृत्वस्य तादधीन्यतदनुमतिसापेक्षत्वादिभिः सर्वेश्वरे कर्तृत्वानुसन्धानम्। कर्तृत्वत्यागस्तु अनेककर्तृके परप्रयुक्तस्वात्मकर्तृकत्वानुसन्धानमित्युत्तरत्र विशोधयिष्यते।

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