अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् | सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ||२-३४||
akīrtiṃ cāpi bhūtāni kathayiṣyanti te.avyayām . sambhāvitasya cākīrtirmaraṇādatiricyate ||2-34||
Translations
English Translations
9
People will always speak of your infamy, and for a respectable person, dishonor is worse than death.
2.34. The creatures will speak of your endless ill-fame; and for the one who has been highly esteemed the illfame is worse than death.
2.34 Men will talk forever of thy disgrace; and to the noble, dishonour is worse than death.
2.34 See Comment under 2.37
2.34 You will then incur not merely the loss of all happiness and honour but will be the object of disrespect by all people, the alifies and even the unalified, for all time. They will ridicule you saying, 'When the battle began, Arjuna ran away.' It it be asked, 'What if it be so?", the reply is: 'To one who is honoured by all for courage, prowess, valour, etc., this kind of dishonour arising from the reverse of these attributes, is worse than death? The meaning is that itself would be better for you than this kind of dishonour. If it is said, 'How could dishonour accrue to me, who am a hero, but have withdrawn from the battle only out of love and compassion for my relatives?' the reply is as follows:
2.34 Not only will there be the giving up of your duty and fame, but bhutani, people; ca api, also; kathayisyanti, will speak; te, of your; avyayam, unending, perpetual; akrtim, infamy. Ca, and; sambhavitasya, to an honoured person, to a person honoured with such epithets as 'virtuous', 'heroic', etc.; akirtih, infamy; atiricyate, is worse than; maranat, death. The meaning is that, to an honoured person death is perferable to infamy.
2.34 Further, people will speak ill of you for all time, and for one accustomed to be honoured, dishonour is worse than death.
2.34 People also will speak of your unending infamy. And to an honoured person infamy is worse than death.
2.34 People, too, will recount thy everlasting dishonour; and to one who has been honoured, dishonour is worse than death.
Hindi Translations
3
।।2.34।।केवल स्वधर्म और कीर्तिका त्याग होगा इतना ही नहीं सब लोग तेरी बहुत दिनोंतक स्थायी रहनेवाली अपकीर्ति ( निन्दा ) भी किया करेंगे। धर्मात्मा शूरवीर इत्यादि गुणोंसे प्रतिष्ठा पाये हुए पुरुषके लिये अपकीर्ति मरणसे भी अधिक होती है। अभिप्राय यह है कि संभावित ( इज्जतदार ) पुरुषके लिये अपकीर्तिकी अपेक्षा मरना अच्छा है।
।।2.34।। और सब प्राणी भी तेरी सदा रहनेवाली अपकीर्तिका कथन अर्थात निंदा करेंगे। वह अपकीर्ति सम्मानित मनुष्यके लिये मृत्युसे भी बढ़कर दुःखदायी होती है।
।।2.34।। और सब लोग तुम्हारी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति को भी कहते रहेंगे; और सम्मानित पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण से भी अधिक होती है।।
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English Commentaries
2
Both as friend and philosopher to Arjuna, Lord Kṛṣṇa now gives His final judgment regarding Arjuna’s refusal to fight. The Lord says, “Arjuna, if you leave the battlefield before the battle even begins, people will call you a coward. And if you think that people may call you bad names but that you will save your life by fleeing the battlefield, then My advice is that you’d do better to die in the battle. For a respectable man like you, ill fame is worse than death. So, you should not flee for fear of your life; better to die in the battle. That will save you from the ill fame of misusing My friendship and from losing your prestige in society.” So, the final judgment of the Lord was for Arjuna to die in the battle and not withdraw.
2.34 अकीर्तिम् dishonour? च and? अपि also? भूतानि beings? कथयिष्यन्ति will tell? ते thy? अव्ययाम् everlasting? संभावितस्य of the honoured? च and? अकीर्तिः dishonour? मरणात् than death? अतिरिच्यते exceeds.Commentary The world also will ever recount thy infamy which will survive thee for a long time. Death is really preferable to disgrace to one who has been honoured as a great hero and mighty warrior with noble alities.
Hindi Commentaries
2
।।2.34।। एक प्रसिद्ध सम्मानित वीर के लिए अपकीर्ति मरण से भी अधिक होती है। श्रीकृष्ण अर्जुन को दुविधा त्याग कर युद्ध में प्रवृत्त करने के लिए एक और तर्क प्रस्तुत करते हैं। अर्जुन का पक्ष धर्म और न्याय का होने पर भी उसका युद्ध से पलायन कायरता का लक्षण है। भगवान् के शब्दों में अर्जुन के प्रति सहानुभूति अन्तर्निहित है क्योंकि वे जानते हैं कि भावावेग में शूरवीर अर्जुन भी मन से दुर्बल होकर हतोत्साहित हो सकता है। आगे
2.34।। व्याख्या--'अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्' -- मनुष्य, देवता, यक्ष, राक्षस आदि जिन प्राणियोंका तेरे साथ कोई सम्बन्ध नहीं है अर्थात् जिनकी तेरे साथ न मित्रता है और न शत्रुता, ऐसे साधारण प्राणी भी तेरी अपकीर्ति, अपयशका कथन करेंगे कि देखो ! अर्जुन कैसा भीरू था, जो कि अपने क्षात्र-धर्मसे विमुख हो गया। वह कितना शूरवीर था, पर युद्धके मौकेपर उसकी कायरता प्रकट हो गयी, जिसका कि दूसरोंको पता ही नहीं था; आदि-आदि। 'ते' कहनेका भाव है कि स्वर्ग, मृत्यु और पाताल-लोकमें भी जिसकी धाक जमी हुई है, ऐसे तेरी अपकीर्ति होगी। अव्ययाम् कहनेका तात्पर्य है कि जो आदमी श्रेष्ठताको लेकर जितना अधिक प्रसिद्ध होता है, उसकी कीर्ति और अपकीर्ति भी उतनी ही अधिक स्थायी रहनेवाली होती है। 'सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते'-- इस श्लोकके पूर्वार्धमें भगवान्ने साधारण प्राणियोंद्वारा अर्जुनकी निन्दा किये जानेकी बात बतायी। अब श्लोकके उत्तार्धमें सबके लिये लागू होनेवाली सामान्य बात बताते हैं। संसारकी दृष्टिमें जो श्रेष्ठ माना जाता है, जिसको लोग बड़ी ऊँची दृष्टिसे देखते हैं, ऐसे मनुष्यकी जब अपकीर्ति होती है, तब वह अपकीर्ति उसके लिये मरणसे भी अधिक भयंकर दुःखदायी होती है। कारण कि मरनेमें तो आयु समाप्त हुई है, उसने कोई अपराध तो किया नहीं है, परन्तु अपकीर्ति होनेमें तो वह खुद धर्म-मर्यादासे ,कर्तव्यसे च्युत हुआ है। तात्पर्य है कि लोगोंमें श्रेष्ठ माना जानेवाला मनुष्य अगर अपने कर्तव्यसे च्युत होता है, तो उसका बड़ा भयंकर अपयश होता है।
Sanskrit Commentaries
13
।।2.34 2.38।।यद्भयाच्च भवान् युद्धात् निवर्तते (K निवर्तेत) तदेव शतशाखमुपनिपतिष्यति भवत इत्याह अथ चेत्यादि। श्लोकपञ्चकमिदम् अभ्युपगम्यवादरूपमुच्यते ( N उपगम्य) यदि लौकिकेन व्यवहारेणास्ते भवान् तथाप्यवश्यानुष्ठेयमेतत्।
।।2.34।।युद्धाकरणे क्षत्रियस्य प्रत्यवायमामुष्मिकमापाद्य शिष्टगर्हालक्षणं दीर्घकालभाविनमैहिकमपि प्रत्यवायं प्रतिलम्भयति न केवलमिति। युद्धे स्वस्मरणसंदेहात्तत्परिहारार्थमकीर्तिरपि सोढव्या आत्मसंरक्षणस्य श्रेयस्करत्वादित्याशङ्क्याह धर्मात्मेति। मान्यानामकीर्तिर्भवति मरणादपि दुःसहेति तात्पर्यार्थमाह संभावितस्येति।
।।2.34।।किंच अकीर्तिमव्ययां दीर्घकालां धर्मात्मा शूर इत्येवमादिभिर्गुणैः संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते तस्याकीर्तेर्मरणं वरमित्यर्थः।
।।2.34।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
।।2.34।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
।।2.34।।एवं कीर्तिधर्मयोरिष्टयोरप्राप्तिरनिष्टष्य च पापस्य प्राप्तिर्युद्धपरित्यागे दर्शिता। तत्र पापाख्यमनिष्टं व्यवधानेन दुःखफलमामुत्रिकत्वात् शिष्टगर्हालक्षणं त्वनिष्टमासन्नफलदमत्यसह्यमित्याह भूतानि देवर्षिमनुष्यादीनि ते तवाव्ययां दीर्घकालमकीर्तिं न धर्मात्मायं न शूरोऽयमित्येवंरूपां कथयिष्यन्त्यन्योन्यं कथाप्रसङगे। कीर्तिधर्मनाशसमुच्चयार्थौ निपातौ। न केवलं कीर्तिधर्मौ हित्वा पापं प्राप्स्यसि अपितु अकीर्तिं च प्राप्स्यसि। न केवलं त्वमेव तां प्राप्स्यसि अपितु भूतान्यपि कथयिष्यन्तीति वा निपातयोरर्थः। ननु युद्धे स्वमरणसंदेहात्तत्परिहारार्थमकीर्तिरपि सोढव्या आत्मरक्षणस्यात्यन्तापेक्षितत्वात्। तथाचोक्तं शान्तिपर्वणि साम्ना दानेन भेदेन समस्तैरुत वा पृथक्। विजेतुं प्रयतेतारीन्न युध्येत कदाचन।।अनित्यो विजयो यस्माद्दृश्यते युध्यमानयोः। पराजयश्च संग्रामे तस्माद्युद्धं विवर्जयेत्।।त्रयाणामप्युपायानां पूर्वोक्तानामसंभवे। तथा युध्येत संपत्तौ विजयेत रिपून्यथा।। इति। एवमेव मनुनाप्युक्तम्। तथाच मरणभीतस्य किमकीर्तिर्दुःखमिति शङ्कामपनुदति संभावितस्य धर्मात्मा शूर इत्येवमादिभिरनन्यलभ्यैर्गुणैर्बहुमतस्य जनस्याकीर्तिर्मरणादप्यतिरिच्यतेऽधिका भवति। चो हेतौ। एंव यस्मादतोऽकीर्तेर्मरणमेव वरं न्यूनत्वात्। त्वमप्यतिसंभावितोऽसि महादेवादिसमागमेन। अतो नाकीर्तिदुःखं सोढुं शक्ष्यसीत्यभिप्रायः। उदाहृतवचनं त्वर्थशास्त्रत्वात्न निवर्तेत संग्रामात् इत्यादिधर्मशास्त्राद्दुर्बलमिति भावः।
।।2.34।।अव्ययां दीर्घकालम्।
।।2.34।।किञ्च पापात्परलोकनाश एव भविष्यतीति न किन्त्विह लोकेऽप्यपकीर्तिर्भविष्यतीत्याह अकीर्तिं चापीति। भूतानि अपि ते अकी र्ति৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷ मव्ययां सदानुवर्त्तमानां कथयिष्यन्ति। भूतानीति नपुंसकलिङ्गकथनेन तथा कथनायोग्या अपि कथयिष्यन्तीति व्यञ्जितम्। नन्वकीर्तिकथनेन किं स्यादित्यत आह सम्भावितस्येति। सम्भावितस्य युद्धादौ अकीर्तिः मरणात् अतिरिच्यते अधिका भवतीत्यर्थः।
।।2.34।।न केवलं निरतिशयसुखकीर्तिहानिमात्रं पार्थो युद्धे प्रारब्धे पलायित इति अव्ययां सर्व देशकालव्यापिनीम् अकीर्तिं च समर्थानि असमर्थानि सर्वाणि भूतानि कथयिष्यन्ति ततः किमिति चेत् शौर्यवीर्यपराक्रमादिभिः सर्व संभावितस्य तद्विपर्ययजा हि अकीर्तिः मरणाद् अतिरिच्यते। एवंविधाया अकीर्तेः मरणम् एव तव श्रेयः इत्यर्थः।बन्धुस्नेहात् कारुण्याच्च युद्धात् निवृत्तस्य शूरस्य मम अकीर्तिः कथम् आगामिष्यति इति अत्राह
।।2.34।। अकीर्तिं चापि युद्धे भूतानि कथयिष्यन्ति ते तव अव्ययां दीर्घकालाम्। धर्मात्मा शूर इत्येवमादिभिः गुणैः संभावितस्य च अकीर्तिः मरणात् अतिरिच्यते संभावितस्य च अकीर्तेः वरं मरणमित्यर्थः।।किञ्च
।।2.34।।किंच अकीर्तिमिति। अव्ययां शाश्वतीम्। संभावितस्य बहुमानितस्याकीर्तिर्मरणादतिरिच्यतेऽधिकतरा भवति।
।।2.34।।किञ्च अकीर्तिमिति। भूतानि प्राणिजातानि। विजयीति सम्भावितस्य।
।।2.34।।एवं दृष्टादृष्टरूपफलहानिरदृष्टप्रत्यवायश्चोक्तः अथ दृष्टप्रत्यवायमाह अकीर्तिं चेति। अकीर्तिरिह दुष्कीर्तिः।न ते केवलम् इत्यादावपि पारलौकिकनिरतिशयपापमात्रमित्यनुसन्धेयम्।प्रारब्धे पलायित इति कान्दिशीकतया प्रथमव्यापारमप्यकृत्वेति भावः। अव्ययशब्देनाविनाशित्वाभिधानात् सर्वकालव्यापित्वमुच्यताम् सर्वदेशव्यापित्वं तु कथमुच्यते इत्थं यद्यकीर्तिः सर्वदेशव्यापिनी न स्यात् सर्वकालव्यापिन्यपि न स्यात् कालक्रमेण सङ्कोचाद्विच्छेदोपपत्तेरिति। यद्वा देशतः कालतश्चान्यूनत्वमेवात्र अव्ययत्वं विवक्षितम्। भूतान्यपीतिअपिशब्दान्वयः। चापीत्यनतिरिक्तार्थत्वे निष्प्रयोजनत्वम्ततो भूतानि इति सामान्यनिर्देशात्। अपिशब्दान्वयबलाच्चोक्तंसमर्थान्यसमर्थान्यपीत्यादि। अकीर्तेरिष्टत्वमाशङ्क्योत्तरार्धमुच्यत इत्याह ततः किमिति। चश्शङ्कानिराकरणार्थः। अर्जुनस्य सम्भावितत्वहेतूनाह शौर्येति।सर्वसम्भावितस्येति। पूर्वनिर्दिष्टैः समर्थैरसमर्थैश्च भूतैः सम्भावितस्येत्यर्थः। ननु मरणादतिरेकः किं हेयतया उपादेयतया वा न प्रथमःजीवन् भद्राणि पश्यति म.भा.आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् इत्यादिवचनात्। न द्वितीयः प्रकरणविरोधादित्यत्राह एवंविधाया इति।जीवन् भद्राणि इत्यादिकं तु क्षत्ित्रयापुत्रस्य तेऽद्य नोपादेयम्। न चेयमकीर्तिर्लघीयसी येन मरणाच्छ्रेयसी स्यात्। किन्त्वेवंविधा सर्वकालदेशव्यापिनी इयं च नरकायापि स्यात् तथैव स्मृत्यादिसिद्धत्वात्। तथा चोत्तरस्मिन् रामायणे वि.7।45।12।13 रघुनाथवाक्यम् अकीर्तिर्यस्य गीयेत लोके भूतस्य कस्यचित्। पतत्येवाधमान् लोकान्यावच्छब्दः स कीर्त्यते इति। युद्धे मरणं तु तत एव स्वर्गाय स्यादिति भावः।