Adhyay 5 • Shlok 11

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि | योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ||५-११||

Roman Transliteration (IAST)

kāyena manasā buddhyā kevalairindriyairapi . yoginaḥ karma kurvanti saṅgaṃ tyaktvātmaśuddhaye ||5-11||

Translations

English Translations 9
A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada English

The yogīs, abandoning attachment, act with body, mind, intelligence and even with the senses, only for the purpose of purification.

Dr.S.Sankaranarayan English

5.11. Having given up attachment, the men of Yoga perform action, just with the body, with the mind, with intellect and also with sense-organs, for attaining the Self.

Shri Purohit Swami English

5.11 The sage performs his action dispassionately, using his body, mind and intellect, and even his senses, always as a means of purification.

Sri Abhinav Gupta English

5.7-11 Yogayuktah etc. upto atma-siddhaye. He, whose (by whom) Self is [realised to be] the Self of all beings, is not stained, eventhough he performs all [sorts of] actions. For, he has undertaken neither what is enjoined nor what is prohibited. Hence, even while performing actions such as seeing and the like, he bears in mind, -i.e., he resolves with [all] firmness of observation, - that 'If the sense-organs like eyes etc., function on their respective objects, what does it matter for me ? Indeed one is not stained by what another does'. This act is nothing but dedicating one's actions to the Brahman. In this regard the characteristic mark is his detachment. Due to that he is not stained. Because they do not have attachment, the men of Yoga perform actions only with their body etc., that are freed from attachment and do not depend on each other.

Sri Ramanuja English

5.11 Renouncing attachment to heaven etc., the Yogins perform actions accomplishable by the body, the mind and the intellect for the purification of themselves, i.e., for annulling the bonds of his previous Karma which have afected the self and which involve the self in Samsara.

Sri Shankaracharya English

5.11 Since tyaktva, by giving up sangam, attachment with regard to results; yoginah, the yogis, men of action; kurvanti, undertake; karma, work; kevalaih, merely- this word is to be construed with each of the words, body etc., so as to deny the idea of ownership with regard to all actions-; kayena, through the body; manasa, through the mind; buddhya, through the intellect; and api, even; indriyaih, through the organs, which are devoid of the idea of ownership, which are unassociated with ownership thus: 'I act only for God, and not for my gain'; atmasudhaye, for the purification of themselves, i.e., for the purification of the heart, therefore you have competence only for that. So you undertake action alone. And also since,

Swami Adidevananda English

5.11 Merely witth the body, the mind, the intellect and the senses, Yogins do actions, renouncing attachment, for the purification of the self.

Swami Gambirananda English

5.11 By giving up attachment, the yogis undertake work merely through the body, mind, intellect and even the organs, for the purification of themselves.

Swami Sivananda English

5.11 Yogis, having abandoned attachment, perform actions only by the body, mind, intellect, and even by the senses, for the purification of the self.

Hindi Translations 3
Sri Shankaracharya Hindi

।।5.11।।उसके कर्मोंका फल तो केवल अन्तःकरणकी शुद्धिमात्र ही होता है क्योंकि योगी लोग केवल यानी मैं सब कर्म ईश्वरके लिये ही करता हूँ अपने फलके लिये नहीं। इस भावसे जिनमें ममत्वबुद्धि नहीं रही है ऐसे शरीर मन बुद्धि और इन्द्रियोंसे फलविषयक आसक्तिको छोड़कर आत्मशुद्धिके लिये अर्थात् अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्म करते हैं। सभी क्रियाओंमें ममताका निषेध करनेके लिये केवल शब्दका काया आदि सभी शब्दोंके साथ सम्बन्ध है। तेरा भी उसीमें अधिकार है इसलिये तू भी कर्म ही कर।

Swami Ramsukhdas Hindi

।।5.11।। कर्मयोगी आसक्तिका त्याग करके केवल (ममतारहित) इन्द्रियाँ-शरीर-मन-बुद्धि के द्वारा केवल अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये ही कर्म करते हैं।

Swami Tejomayananda Hindi

।।5.11।। योगीजन, शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा आसक्ति को त्याग कर आत्मशुद्धि (चित्तशुद्धि) के लिए कर्म करते हैं।।

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Commentaries & Exposition

English Commentaries 2
A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada Bhashya

When one acts in Kṛṣṇa consciousness for the satisfaction of the senses of Kṛṣṇa, any action, whether of the body, mind, intelligence or even the senses, is purified of material contamination. There are no material reactions resulting from the activities of a Kṛṣṇa conscious person. Therefore purified activities, which are generally called sad-ācāra, can be easily performed by acting in Kṛṣṇa consciousness. Śrī Rūpa Gosvāmī in his Bhakti-rasāmṛta-sindhu (1.2.187) describes this as follows: īhā yasya harer dāsye karmaṇā manasā girā nikhilāsv apy avasthāsu jīvan-muktaḥ sa ucyate “A person acting in Kṛṣṇa consciousness (or, in other words, in the service of Kṛṣṇa) with his body, mind, intelligence and words is a liberated person even within the material world, although he may be engaged in many so-called material activities.” He has no false ego, for he does not believe that he is this material body, or that he possesses the body. He knows that he is not this body and that this body does not belong to him. He himself belongs to Kṛṣṇa, and the body too belongs to Kṛṣṇa. When he applies everything produced of the body, mind, intelligence, words, life, wealth, etc. – whatever he may have within his possession – to Kṛṣṇa’s service, he is at once dovetailed with Kṛṣṇa. He is one with Kṛṣṇa and is devoid of the false ego that leads one to believe that he is the body, etc. This is the perfect stage of Kṛṣṇa consciousness.

Swami Sivananda Bhashya

5.11 कायेन by the body? मनसा by the mind? बुद्ध्या by the intellect? केवलैः only? इन्द्रियैः by the senses? अपि also? योगिनः Yogis? कर्म action? कुर्वन्ति perform? सङ्गम् attachment? त्यक्त्वा having abandoned? आत्मशुद्धये for the purification of the self. Commentary Yogis here means Karma Yogis who are devoted to the path of action? who are free from egoism and selfishness? who work for the purification of their hearts without the least attachment to the fruits or results of their actions? and who dedicate all actions to the Lord as their offerings.Kevalam only by (free from egoism and selfishness) applies to the body? mind? intellect and the senses.

Hindi Commentaries 2
Swami Chinmayananda Bhashya

।।5.11।। कर्मयोगी का प्रयत्न यह होता है कि अपने स्वरूप में ही रहकर स्वयं के अन्तर्बाह्य घटित हो रही घटनाओं को उनके साथ तादात्म्य किये बिना केवल साक्षी भाव से देखे। कुछ काल तक इसका अभ्यास करने पर उसे यह स्पष्टतया ज्ञात होगा कि समस्त कर्म उपाधियों के द्वारा किये जाते हैं और साक्षी के साथ उनका कोई सम्बन्ध नहीं होता। तथापि उसको इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि यह साक्षित्व अथवा साक्षी स्वयं पारमार्थिक सत्य नहीं है वरन् बुद्धि की खिड़की में से झांकता हुआ परम सत्य यह साक्षी है। हमारा अनुभव है कि हम स्वयं को कार्यरत देखते हैं तब हमें इस देखने वाले साक्षी का भी भान होता है। शुद्ध चैतन्यस्वरूप आत्मतत्त्व वह है जो इस उपर्युक्त द्रष्टा को भी प्रकाशित करता है यह उपनिषदों की घोषणा है।यदि परम सत्य साक्षित्व से भी परे है तो कर्मयोगी को इस साक्षीभाव का अभ्यास क्यों करना चाहिये इसका उत्तर है आत्मविशुद्धये अर्थात् अन्तकरण की शुद्धि के लिए। साक्षीभाव से कर्म करने पर स्वाभाविक ही अहंकार का त्याग होकर पूर्व संचित वासनाओं का क्षय हो जायेगा। जितनी अधिक मात्रा में वासना निवृत्ति होगी उतना ही शुद्ध और स्थिर अन्तकरण होगा जिसमें परमात्मा की अनुभूति स्पष्ट रूप से होगी।निम्नलिखित कारण से भी कर्मयोगी अनासक्त भाव से कर्म करता है

Swami Ramsukhdas Bhashya

5.11।। व्याख्या--'योगिनः' यहाँ 'योगिनः'--पद कर्मयोगीके लिये आया है। जो योगी भगवदर्पणबुद्धिसे कर्म करते हैं, वे भक्तियोगी कहलाते हैं। परन्तु जो योगी केवल संसारकी सेवा के लिये निष्कामभावपूर्वक कर्म करते हैं, वे कर्मयोगी कहलाते हैं। कर्मयोगी अपने कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदिसे कर्म करते हुए भी उन्हें अपना नहीं मानता, प्रत्युत संसारका ही मानता है। कारण कि शरीरादिकी संसारके साथ एकता है।'कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि'--जिनको साधारण मनुष्य अपनी मानते हैं, वे शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि वास्तवमें किसी भी दृष्टिसे अपनी नहीं हैं, प्रत्युत अपनेको मिली हुई हैं और बिछुड़नेवाली हैं। इनको अपनी मानना सर्वथा भूल है। इन सबकी संसारके साथ स्वतःसिद्ध एकता है।विचारपूर्वक देखा जाय तो शरीरादि पदार्थ किसी भी दृष्टिसे अपने नहीं हैं। मालिककी दृष्टिसे देखें तो ये भगवान्के हैं, कारणकी दृष्टिसे देखें तो ये प्रकृति हैं और कार्यकी दृष्टिसे देखें तो ये संसारके (संसारसे अभिन्न) हैं। इस प्रकार किसी भी दृष्टिसे इनको अपना मानना, इनमें ममता रखना भूल है। ममताको सर्वथा मिटानेके लिये ही यहाँ 'केवलैः' पद प्रयुक्त हुआ है। यहाँ 'केवलैः' पद बहुवचन होनेसे इन्द्रियोंका ही विशेषण है; परन्तु इन्द्रियोंसे ही ममता हटानेके लिये कहा जाय, शरीर-मन-बुद्धिसे नहीं--ऐसा सम्भव नहीं है। शरीरादिका सम्बन्ध समष्टि संसारके साथ है। व्यष्टि कभी समष्टिसे अलग नहीं हो सकती। इसलिये व्यष्टि-(शरीरादि-) से सम्बन्ध जोड़नेपर समष्टि-(संसार-) से स्वतः सम्बन्ध जुड़ जाता है। जैसे लड़कीसे विवाह होनेपर अर्थात् सम्बन्ध जुड़नेपर सास, ससुर आदि ससुरालके सभी सम्बन्धियोंसे अपने-आप सम्बन्ध जुड़ जाता है ,ऐसे ही संसारकी किसी भी वस्तु-(शरीरादि-) से सम्बन्ध जुड़नेपर अर्थात् उसे अपनी माननेपर पूरे संसारसे अपने-आप सम्बन्ध जुड़ जाता है। अतः यहाँ 'केवलैः' पद शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि सबमें ही साधकको ममता हटानेकी प्रेरणा करता है (टिप्पणी प0 295.1)।वास्तवमें कर्ताका स्वयं निर्मम होना ही आवश्यक है। यदि कर्ता स्वयं निर्मम हो तो शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सब जगहसे ममता सर्वथा मिट जाती है। कारण कि वास्तवमें शरीर, इन्द्रियाँ आदि स्वरूपसे सर्वथा भिन्न हैं; अतः इनमें ममता केवल मानी हुई है, वास्तवमें है नहीं। कर्मयोगकी साधनामें फलकी इच्छाका त्याग मुख्य है। (गीता 5। 12)। साधारण लोग फल-प्राप्तिके लिये कर्म करते हैं, पर कर्मयोगी फलकी आसक्तिको मिटानेके लिये कर्म करता है। परन्तु जो शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदिको अपना मानता रहता है, वह फलकी इच्छाका त्याग कर ही नहीं सकता (टिप्पणी प0 295.2)। कारण कि उसका ऐसा भाव रहता है कि शरीरादि अपने हैं तो उनके द्वारा किये गये कर्मोंका फल भी अपनेको मिलना चाहिये। इस प्रकार शरीरादिको अपना माननेसे स्वतः फलकी इच्छा उत्पन्न होती है। इसलिये फलकी इच्छाको मिटानेके लिये शरीरादिको कभी भी अपना न मानना अत्यन्त आवश्यक है।'केवलैः'--पदका तात्पर्य है कि जैसे वर्षा बरसती है और उससे लोगोंका हित होता है; परन्तु उसमें ऐसा भाव नहीं होता कि मैं बरसती हूँ, मेरी वर्षा है कि जिससे दूसरोंका हित होगा, दूसरोंको सुख होगा। ऐसे हीइन्द्रियों आदिके द्वारा होनेवाले हितमें भी अपनापन मालूम न दे। परन्तु शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियोंके द्वारा किसीका अभीष्ट हो गया, किसीकी मनचाही बात हो गयी--इन क्रियाओँको लेकर अपने मनमें खुशी आती है तो मन, बुद्धि आदिमें केवलपना नहीं रहा, प्रत्युत उनके साथ सम्बन्ध जुड़ गया, ममता हो गयी।'सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये'--[पीछे दसवें श्लोकमें भी 'सङ्गं त्यक्त्वा' पद आये हैं; अतः इनकी व्याख्या वहीं देखनी चाहिये।] साधारणतः मल, विक्षेप और आवरण-दोषके दूर होनेको अन्तःकरणकी शुद्धि माना जाता है। परन्तु वास्तवमें अन्तःकरणकी शुद्धि है--शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे ममताका सर्वथा मिट जाना। शरीरादि कभी नहीं कहते कि हम तुम्हारे हैं और तुम हमारे हो। हम ही उनको अपना मान लेते हैं। उनको अपना मानना ही अशुद्धि है --'ममता मल जरि जाइ' (मानस 7। 117 क)। अतः शरीरादिके प्रति अहंता-ममतापूर्वक माने गये सम्बन्धका सर्वथा अभाव ही आत्मशुद्धि है।इस श्लोकमें आये 'केवलैः' पदसे शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिको अपना न माननेकी बात आयी है अर्थात् वहाँ 'केवलैः' पदमें अपनापन हटानेका उद्देश्य है और यहाँ 'आत्मशुद्धये' पदमें अपनापन सर्वथा हटनेकी बात आयी है। तात्पर्य यह है कि अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये (अपनापन सर्वथा हटानेके उद्देश्यसे) शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिको अपना न माननेपर भी इनमें सूक्ष्म अपनापन रह जाता है। उस सूक्ष्म अपनेपनका सर्वथा मिटना ही आत्मशुद्धि अर्थात् अन्तःकरणकी शुद्धि है।अहंतामें भी ममता रहती है। ममता सर्वथा मिटनेपर जब अहंतामें भी ममता नहीं रहती, तब सर्वथा शुद्धि हो जाती है।'कर्म कुर्वन्ति'--शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिमें जो सूक्ष्म अपनापन रह जाता है, उसे सर्वथा दूर करनेके लिये कर्मयोगी कर्म करते हैं।जबतक मनुष्य कर्म करते हुए अपने लिये किसी प्रकारका सुख चाहता है अर्थात् किसी फलकी इच्छा रखता है और शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदि कर्म-सामग्रीको अपनी मानता है, तबतक वह कर्मबन्धनसे मुक्त नहीं हो सकता। इसलिये कर्मयोगी फलकी इच्छाका त्याग करके और कर्म-सामग्रीको अपनी न मानकर केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है। कारण कि योगारूढ़ होनेकी इच्छावाले मननशील योगीके लिये (दूसरोंके हितके लिये) कर्म करना ही हेतु कहा जाता है--'आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते' (गीता 6। 3)। इस प्रकार दूसरोंके हितके लिये वह ज्यों-ज्यों कर्म करता है, त्यों-ही-त्यों ममता-आसक्ति मिटती चली जाती है और अन्तःकरणकी शुद्धि होती चली जाती है।  सम्बन्ध--अब भगवान् आगेके श्लोकमें अन्वय और व्यतिरेक-रीतिसे कर्मयोगकी महिमाका वर्णन करते हैं।

Sanskrit Commentaries 13
Sri Abhinav Gupta Bhashya

।।5.7 5.11।।योगयुक्त इत्यादि आत्मसिद्धये इत्यन्तम्। सर्वभूतानामात्मभूतः आत्मा यस्य स सर्वमपि कुर्वाणो न लिप्यते अकरणप्रतिषेधारूढत्वात्। अत एव दर्शनादीनि कुर्वन्नपि असौ एवं धारयति प्रतिपत्तिदार्ढ्येन निश्चिनुते चक्षुरादीनामिन्द्रियाणां यदि स्वविषयेषु प्रवृत्तिः मम किमायातम् न हि अन्यस्य कृतेनापरस्य (S अन्यस्य कृतेनान्यस्य अन्यकृतेन परस्य) लेपः इति। तदेव ब्रह्मणि कर्मणां समर्पणम्। अत्र चिह्नम् अस्य गतसङ्गता। अतो न लिप्यते। योगिनश्च केवलैः सङ्गरहितैः परस्परानपेक्षिभिश्च कायादिभिः कुर्वन्ति कर्माणि सङ्गाभावात्।

Sri Anandgiri Bhashya

।।5.11।।अविदुषस्तर्हि कृतेन कर्मणा किं स्यादित्याशङ्क्याह केवलमिति। अज्ञस्येश्वरार्पणबुद्ध्यानुष्ठितं कर्म बुद्धिशुद्धिफलमित्यत्रैव हेतुमाह यस्मादिति। केवलशब्दस्य प्रत्येकं संबन्धे प्रयोजनमाह सर्वव्यापारेष्विति। कर्मणश्चित्तशुद्धिफलत्वे तादर्थ्येन कर्मानुष्ठानमेव तव कर्तव्यमिति यस्मादित्यस्यापेक्षितं वदन्फलितमाह तस्मादिति।

Sri Dhanpati Bhashya

।।5.11।।यस्मात्कायेन केवलेनाहंभावममभाविवर्जितेन तथा केवलेन मनसा केवलया बुद्य्धा केवलैरिन्द्रियैरपि कर्मयोगिनः कर्म कुर्वन्ति। केवलैरितिपदं मनसेत्यनेन वचनस्य कायेन बुद्य्धेत्याभ्यां लिङ्गवचनयोर्व्यत्ययेन योजनीयम्। अत्रापरे केवलपदव्यावर्त्यं धनादि वर्णयन्ति। तथाहि केवलवाचालब्धधनादिलाभानपेक्षितता ततश्च केवलेन कायेन स्त्रानशौचद्विजोच्छिष्टमार्जनादीनि कर्माणि योगिनः कुर्वन्ति नतु तेषामतीतकालता नापि कदाचिद्धनापेक्षेति भावः। तथा केवलेन मनसा जगदीशध्यानं यथाशक्ति परोपकारसंकल्पनादीनि च कर्णाभ्यामुत्तमश्लेकजन्मकर्माकर्णनादीनि रसनया तीर्थनैवेद्यास्वादनादीनि घ्राणेन तदुपभुक्तमाल्यामोदग्रहणादीनि त्वचा पुण्यतीर्थोदकस्पर्शादीनि पद्य्भां तीर्थाटनादीनि हस्ताभ्यां परेशपूजादीनि वाचा स्तुत्यादीनि च कुर्वन्ति सङ्गं धनादिफलासङ्गं त्यक्त्वेति तैर्मानसादिकर्माणि धनाद्यपेक्षाऽप्रसक्तेस्तत्रापि स्वेन संबन्धितस्य केवलपदस्य वैयर्थ्य परिहर्तव्यम्। तस्मात्सर्वव्यापारेषु ममतावर्जिता योगिनः कर्म कुर्वन्ति। सङ्गं त्यक्त्वा फलविषयमात्मशुद्धये सत्त्वशुद्धय इत्यर्थ इति भाष्यमेव रमणीयम्।

Sri Jayatritha Bhashya

।।5.11।।कायेनेत्यनेनापि सन्न्यासयोगयुक्तस्यात्मशुद्धिलक्षणः पापालेष उच्यत इत्यत आह एवं चेति। उभयसमुच्चयरूप एवेत्यर्थः। अन्यत्र तात्पर्यान्न पुनरुक्तिरिति भावः। आचारकथनमपि नियमसमर्थनार्थमिति ज्ञातव्यम्।

Sri Madhavacharya Bhashya

।।5.11।।एवं चाचार इत्याह कायेनेति।

Sri Madhusudan Saraswati Bhashya

।।5.11।।तदेव विवृणोति कायेन मनसा बुद्ध्येन्द्रियैरपि योगिनः कर्मिणः फलसङ्गं त्यक्त्त्वा कर्म कुर्वन्ति। कायादीनां सर्वेषां विशेषणं केवलैरिति। ईश्वरायैव करोमि न मम फलायेति ममताशून्यैरित्यर्थः। आत्मशुद्धये चित्तसत्त्वशुद्ध्यर्थम्।

Sri Neelkanth Bhashya

।।5.11।।कायेनेति। केवलैरिति विपरिणामेन सर्वत्र संबन्धनीयम्। केवलेन कायेन अहमयं ब्राह्मणो युवेत्यात्माध्यासशून्येन। एवमन्यत्रापि सङ्गं त्यक्त्वा देहादिभ्यो विविक्तेऽपि आत्मनि तार्किकादिवदहं करोमीत्यभिनिवेशं त्यक्त्वा योगिनः कर्म कुर्वन्ति। आत्मशुद्धये चित्तशुद्ध्यर्थम्। तस्मात्तवापि तत्रैवाधिकारोऽस्तीति तदेव त्वं कुरु।

Sri Purushottamji Bhashya

।।5.11।।नन्वेतत्सिद्धदशायामुक्तं साधनदशायां तत्करणे कथं न लेपः स्यात् इत्याशङ्क्याह कायेनेति। कायेन देहेन भावस्वरूपरहितेन अधिष्ठानात्मकेन तादृशेनैव मनसा केवलैरिन्द्रियैराध्यात्मिकैर्बुद्ध्यापि तत्प्राप्ति रूपेच्छया आत्मशुद्धये भावस्वरूपप्राप्त्यर्थं योगिनः संयोगात्मकसाधनवन्तः सङ्गं कर्मफलं त्यक्त्वा कर्म भगवदिच्छया कर्तव्यात्मकत्वेन कुर्वन्ति। साधनदशायामपि भगवदिच्छां ज्ञात्वा फलाभावेन कृतं कर्म न बन्धकं भवतीति भावः।

Sri Ramanuja Bhashya

।।5.11।।कायमनोबुद्धीन्द्रियसाध्यं कर्म स्वर्गादिफलसङ्गं त्यक्त्वा योगिनः आत्मविशुद्धये कुर्वन्ति आत्मगतप्राचीनकर्मबन्धनविनाशाय कुर्वन्ति इत्यर्थः।

Sri Shankaracharya Bhashya

।।5.11।। कायेन देहेन मनसा बुद्ध्या च केवलैः ममत्ववर्जितैः ईश्वरायैव कर्म करोमि न मम फलाय इति ममत्वबुद्धिशून्यैःइन्द्रियैरपि केवलशब्दः कायादिभिरपि प्रत्येकं संबध्यते सर्वव्यापारेषु ममतावर्जनाय। योगिनः कर्मिणः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वा फलविषयम् आत्मशुद्धये सत्त्वशुद्धये इत्यर्थः। तस्मात् तत्रैव तव अधिकारः इति कुरु कर्मैव।।यस्माच्च

Sri Sridhara Swami Bhashya

।।5.11।।बन्धकत्वाभावमुक्त्वा मोक्षहेतुत्वं सदाचारेण दर्शयति कायेनेति। कायेन स्नानादि बुद्ध्या तत्त्वनिश्चयादि केवलैः कर्माभिनिवेशरहितैरिन्द्रियैश्च श्रवणकीर्तनादिलक्षणं कर्म फलसङ्गं त्यक्त्वा चित्तशुद्धये योगिनः कर्म कुर्वन्ति।

Sri Vallabhacharya Bhashya

।।5.11।।अत्र सदाचारं प्रमाणयति कायेनेति। कायेनाऽऽसनादिना मनसा ध्यानादिना बुद्ध्या तत्त्वनिश्चयादिना अभिनिवेशरहितैरिन्द्रियैः शुद्धं श्रवणदर्शनकीर्त्तनादिलक्षणं कर्म नारदादयः सङ्गं त्यक्त्वा आत्मनः शुद्धये समत्वाय कुर्वन्ति। अतो ये केवलं साङ्ख्यास्ते कर्मसन्न्यासं सिद्धान्ततयाऽभ्युपगच्छन्ति। ये च योगिनस्ते कर्मकरणमेवेति फलितम्।

Vedantadeshikacharya Venkatanatha Bhashya

।।5.11।।एवमुक्तार्थदृढीकरणाय शिष्टाचारसिद्धतोच्यते कायेनेतिश्लोकेन। बुद्धिरत्र कृत्यध्यवसायः।केवलैः इति कर्तृत्वाभिमानत्यागो विवक्षितः। अथवा ममत्वबुद्धिविषयतारहितैरित्यर्थः। तदाकायेन इत्यादौ केवलेनेत्यादि परिणाम्यम्। यद्वा कायशब्देन कर्मेन्द्रियवर्गस्यापि लक्षणया सङ्ग्रहणात्केवलैरिन्द्रियैः इति ज्ञानेन्द्रियाण्युच्यन्ते तेषां च केवलत्वं वचनादानादिकर्मरहितत्वम् ततश्चधर्मः श्रुतो वा दृष्टो वा कथितो वा कृतोऽपि वा। अनुमोदितो वा राजेन्द्र नयतीन्द्रपदं नरम्।।म.भा.14।93।31 इत्यादिकमपि सूचितं भवति। आत्मशुद्धेरत्रैव फलतया निर्देशात् निष्फलप्रवृत्त्ययोगाच्चस्वर्गादिफलसङ्गमित्युक्तम्। शुद्धिर्हि केनचिद्दूषितस्यापेक्षिता स च दोषोऽत्र स्वतः शुद्धस्याप्यात्मनोऽनादिकालकृतमात्मतत्त्वसाक्षात्कारविरोधि कर्मेत्यभिप्रायेणाह आत्मगतेति।

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