Adhyay 6 • Shlok 6

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः | अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ||६-६||

Roman Transliteration (IAST)

bandhurātmātmanastasya yenātmaivātmanā jitaḥ . anātmanastu śatrutve vartetātmaiva śatruvat ||6-6||

Translations

English Translations 9
A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada English

For him who has conquered the mind, the mind is the best of friends; but for one who has failed to do so, his mind will remain the greatest enemy.

Dr.S.Sankaranarayan English

6.6. The self is the friend of that Self by Which the self has been verily subdued; but [in the case of] a person with an unsubdued self, the self alone would abide in enmity like an enemy.

Shri Purohit Swami English

6.6 To him who has conquered his lower nature by Its help, the Self is a friend, but to him who has not done so, It is an enemy.

Sri Abhinav Gupta English

6.5-6 Uddharet etc. Bandhuh etc. In this [path] there is no other means excepting the self i.e. nothing but one's mind. Indeed the subdued mind is a friend and it lifts up [the Self] from the highly dreadful cycle of birth and death. But the unsubdued one does the act of enmity as it throws [the Self] down in the horrible hell. The characteristic mark of the subdued-minded man is this :

Sri Ramanuja English

6.6 A person whose mind is conered by himself in relation to sense-objects, has that mind as his friend. In the case of one whose mind is not conered in this way, his own mind, like an enemy, remains hostile. The meaning is that it acts, against his attainment of supreme beatitude. It has been stated by Bhagavan Parasara also: 'The mind of man is the cause both of his bondage and his release. Its addiction to sense objects is the cause of his bondage; its separation from sense objects is the means of one's release' (V. P., 6.7.28). The proper condition for the beginning of Yoga is now taught:

Sri Shankaracharya English

6.6 Tasya, of him; yena, by whom; jitah, has been conered, subdued; his eva atma, very self, the aggregate of body and organs; that atma, self; is bandhuh, the friend; atmanah, of his self. The idea is that he is a coneror of his senses. Tu, but; anatmanah, for one who has not conered his self, who has no self-control; atma eva, his self itself; varteta, acts; satruvat, like an enemy; satrutve, inimically, with the attitude of an enemy. As an enemy, who is different from oneself, does harm to oneself, similarly one's self behaves like an enemy to oneself. This is the meaning. [If the body and organs are under control, they are helpful in concentrating one's mind on the Self; but, if they are not under control, they oppose this concentration.]

Swami Adidevananda English

6.6 The mind is the friend of him by whom the mind has been conered. But for him whose mind is not conered, the mind, like an enemy, remains hostile.

Swami Gambirananda English

6.6 Of him, by whom has been conered his very self by the self, his self is the friend of his self. But, for one who has not conered his self, his self itself acts inimically like an enemy.

Swami Sivananda English

6.6 The Self is the friend of the self of him by whom the self has been conered by the Self, but to the unconered self, this Self stands in the position of an enemy, like an (external) foe.

Hindi Translations 3
Sri Shankaracharya Hindi

।।6.6।।आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है यह बात कही गयी उसमें किन लक्षणोंवाला पुरुष तो ( आप ही ) अपना मित्र होता है और कौन ( आप ही ) अपना शत्रु होता है सो कहा जाता है उस जीवात्माका तो वही आप मित्र है कि जिसने स्वयमेव कार्यकरणके समुदाय शरीररूप आत्माको अपने वशमें कर लिया हो अर्थात् जो जितेन्द्रिय हो। जिसने ( कार्यकरणके संघात ) शरीररूप आत्माको अपने वशमें नहीं किया उसका वह आपही शत्रुकी भाँति शत्रुभावमें बर्तता है। अर्थात् जैसे दूसरा शत्रु अपना अनिष्ट करनेवाला होता है वैसे ही वह आप ही अपना अनिष्ट करनेमें लगा रहता है।

Swami Ramsukhdas Hindi

।।6.6।। जिसने अपने-आपसे अपने-आपको जीत लिया है, उसके लिये आप ही अपना बन्धु है और जिसने अपने-आपको नहीं जीता है, ऐसे अनात्माका आत्मा ही शत्रुतामें शत्रुकी तरह बर्ताव करता है।

Swami Tejomayananda Hindi

।।6.6।। जिसने आत्मा (इंद्रियों,आदि) को आत्मा के द्वारा जीत लिया है, उस पुरुष का आत्मा उसका मित्र होता है, परन्तु अजितेन्द्रिय के लिए आत्मा शत्रु के समान स्थित होता है।।

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Commentaries & Exposition

English Commentaries 2
A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada Bhashya

The purpose of practicing eightfold yoga is to control the mind in order to make it a friend in discharging the human mission. Unless the mind is controlled, the practice of yoga (for show) is simply a waste of time. One who cannot control his mind lives always with the greatest enemy, and thus his life and its mission are spoiled. The constitutional position of the living entity is to carry out the order of the superior. As long as one’s mind remains an unconquered enemy, one has to serve the dictations of lust, anger, avarice, illusion, etc. But when the mind is conquered, one voluntarily agrees to abide by the dictation of the Personality of Godhead, who is situated within the heart of everyone as Paramātmā. Real yoga practice entails meeting the Paramātmā within the heart and then following His dictation. For one who takes to Kṛṣṇa consciousness directly, perfect surrender to the dictation of the Lord follows automatically.

Swami Sivananda Bhashya

6.6 बन्धुः friend? आत्मा the Self? आत्मनः of the self? तस्य his? येन by whom? आत्मा the self? एव even? आत्मना by the Self? जितः is conered? अनात्मनः of unconered self? तु but? शत्रुत्वे in the place of an enemy? वर्तेत would remain? आत्मा the Self? एव even? शत्रुवत् like an enemy.Commentary Coner the lower mind through the higher mind. The lower mind is your enemy. The higher mind is your friend. If you make friendship with the higher mind you can subdue the lower mind ite easily. The lower mind is filled with Rajas and Tamas (passion and darkness). The higher mind is filled with Sattva or purity.The Self is the friend of one who is selfcontrolled? and who has subjugated the lower mind and the senses. But the Self is an enemy of one who has no selfrestraint? and who has not subdued the lower mind and the senses. Just as an external enemy does harm to him? so also his own (lower) self (mind) does harm to him. The lower mind injures him severely. The highest Self or Atman is the primary Self. Mind also is self. This is the secondary self.

Hindi Commentaries 2
Swami Chinmayananda Bhashya

।।6.6।। जिस मात्रा में जीव शरीर मन और बुद्धि से तादात्म्य को त्यागता है उस मात्रा में वह आत्मा के दिव्य प्रभाव से प्रभावित होता है। तब आत्मा उसका मित्र कहलाता है। वही मन जब बहिर्मुखी होकर विषयों मे आसक्त होता है तब मानों आत्मा उसका शत्रु होता है।निष्कर्ष यह निकला कि चैतन्य आत्मा समान रूप से विद्यमान रहता है परन्तु मन की अन्तर्मुखी अथवा बहिर्मुखी प्रवृत्तियों की दृष्टि से वह मनुष्य का मित्र अथवा शत्रु कहलाता है। और यदि आत्मा शब्द का अर्थ मन करें तो अर्थ होगा कि संयमित मन मनुष्य का मित्र है और स्वेच्छाचारी उसका शत्रु । यह श्लोक पूर्व श्लोक के अर्थ को अधिक स्पष्ट करता है।योगरूढ़ मनुष्य के पूर्णत्व की स्थिति को अगले श्लोक में बताया गया है

Swami Ramsukhdas Bhashya

।।6.6।। व्याख्या--'बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः'--अपनेमें अपने सिवाय दूसरेकी सत्ता है ही नहीं। अतः जिसने अपनेमें अपने सिवाय दूसरे-(शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि-) की किञ्चिन्मात्र भी आवश्यकता नहीं रखी है अर्थात् असत् पदार्थोंके आश्रयका सर्वथा त्याग करके जो अपने सम स्वरूपमें स्थित हो गया ,है उसने अपने-आपको जीत लिया है। वह अपने-आपमें स्थित हो गया--इसकी क्या पहचान है? उसका अन्तःकरण समतामें स्थित हो जायगा; क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है। उस ब्रह्मकी निर्दोषता और समता उसके अन्तःकरणपर आ जाती है। इससे पता लग जाता है कि वह ब्रह्ममें स्थित है (गीता 5। 19)। तात्पर्य यह निकला कि ब्रह्ममें स्थित होनेसे ही उसने अपने द्वारा अपने-आपपर विजय प्राप्त कर ली है। वास्तवमें ब्रह्ममें स्थिति तो नित्य-निरन्तर थी ही, केवल मन, बुद्धि आदिको अपना माननेसे ही उस स्थितिका अनुभव नहीं हो रहा था।संसारमें दूसरोंकी सहायताके बिना कोई भी किसीपर विजय प्राप्त नहीं कर सकता और दूसरोंकी सहायता लेना ही स्वयंको पराजित करना है। इस दृष्टिसे स्वयं पहले पराजित होकर ही दूसरोंपर विजय प्राप्त करता है। जैसे, कोई अस्त्र-शस्त्रोंसे दूसरेको पराजित करता है, तो वह दूसरोंको पराजित करनेमें अपने लिये अस्त्र-शस्त्रोंकी आवश्यकता मानता है; अतः स्वयं अस्त्र-शस्त्रोंसे पराजित ही हुआ। कोई शास्त्रके द्वारा, बुद्धिके द्वारा शास्त्रार्थ करके दूसरोंपर विजय प्राप्त करता है, तो वह स्वयं पहले शास्त्र और बुद्धिसे पराजित होता ही है और होना ही पड़ेगा। तात्पर्य यह निकला कि जो किसी भी साधनसे जिस किसीपर भी विजय करता है, वह अपने-आपको ही पराजित करता है। स्वयं पराजित हुए बिना दूसरोंपर कभी कोई विजय कर ही नहीं सकता--यह नियम है। अतः जो अपने लिये दूसरोंकी किञ्चिन्मात्र भी आवश्यकता नहीं समझता, वही अपने-आपसे अपने-आपपर विजय प्राप्त करता है और वही स्वयं अपना बन्धु है।'अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्'--जो अपने सिवाय दूसरोंकी अर्थात् शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, धन, वैभव, राज्य, जमीन, घर, पद, अधिकार आदिकी अपने लिये आवश्यकता मानता है, वही 'अनात्मा' है। तात्पर्य है कि जो अपना स्वरूप नहीं है, आत्मा नहीं है, उसको अपने लिये आवश्यक और सहायक समझता है तथा उसको अपना स्वरूप मान लेता है। ऐसा अनात्मा होकर जो किसी भी प्राकृत पदार्थको अपना समझता है, वह आप ही अपने साथ शत्रुताका बर्ताव करता है। यद्यपि वह यही समझता है कि मन, बुद्धि आदिको अपना मानकर मैंने उनपर अपना आधिपत्य कर लिया है, उनपर विजय प्राप्त कर ली है, तथापि वास्तवमें (उनको अपना माननेसे) वह खुद ही पराजित हुआ है। तात्पर्य यह निकला कि दूसरोंसे पराजित होकर अपनी विजय समझना ही अपने साथ शत्रुताका बर्ताव करना है।'शत्रुत्वे' कहनेमें भाव यह है कि जो अपना नहीं है, उससे 'मैं' और 'मेरा'-पनका सम्बन्ध मानना अपने साथ शत्रुपनेमें मुख्य हेतु है। इससे यह सिद्ध हुआ कि स्वयं प्रकृतिजन्य पदार्थोंके साथ अपना सम्बन्ध स्थापित कर लेता है--यहींसे शत्रुता शुरू हो जाती है। मनुष्य प्राकृत वस्तुओंपर जितना-जितना अधिकार जमाता चला जाता है, उतना-उतना वह अपने-आपको पराधीन बनाता चला जाता है। उसमें भी वह मान, बड़ाई, कीर्ति आदि चाहता है और अधिक-से-अधिक पतनकी तरफ जाता है। उसको दीखता तो यही है कि मैं अच्छा कर रहा हूँ, मेरी उन्नति हो रही है, पर बात बिलकुल उलटी है। वास्तवमें वह अपने साथ अपनीशत्रुताको ही बढ़ा रहा है।बड़े आश्चर्यकी बात है कि जो मानवशरीर जडताका सर्वथा त्याग करके केवल चिन्मयताकी प्राप्तिके लिये मिला है, उसको भूलकर वह वर्तमानमें तथा मरनेके बाद भी मूर्ति, चित्र आदिके रूपमें अपना नाम-रूप कायम रहे--इस तरह जडताको महत्त्व देकर उसको स्थिर रखना चाहता है। इस तरह चिन्मय होकर भी जडताकी दासतामें फँसकर वह अपने साथ महान् शत्रुताका ही बर्ताव करता है।'शत्रुवत्' कहनेमें भाव यह है कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिको अपनी समझकर वह अपनेको उनका अधिपति मानता है; परन्तु वास्तवमें हो जाता है उनका दास! यद्यपि उसका बर्ताव अपनी दृष्टिसे अपना अहित करनेका नहीं होता, तथापि परिणाममें तो उसका अपना अहित ही होता है। इसलिये भगवान्ने कहा है कि उसका बर्ताव अपने साथ शत्रुवत् अर्थात् शत्रुताकी तरह होता है।तात्पर्य यह हुआ कि कोई भी मनुष्य अपनी दृष्टिसे अपने साथ शत्रुताका बर्ताव नहीं करता। परन्तु असत् वस्तुका आश्रय लेकर मनुष्य अपने हितकी दृष्टिसे भी जो कुछ बर्ताव करता है, वह बर्ताव वास्तवमें अपने साथ शत्रुकी तरह ही होता है; क्योंकि असत् वस्तुका आश्रय परिणाममें जन्म-मृत्युरूप महान् दुःख देनेवाला है।  सम्बन्ध--अपने द्वारा अपनी विजय करनेका परिणाम क्या होता है? इसका उत्तर आगेके तीन श्लोकमें देते हैं।

Sanskrit Commentaries 13
Sri Abhinav Gupta Bhashya

।।6.5 6.6।।अस्यां च बुद्धौ अवश्यमेवावधेयमित्याह उद्धरेदिति। बन्धुरिति। अत्र च नान्य उपायः अपि तु आत्मैव मन एवेत्यर्थः। जितं हि मनो मित्रं घोरतरसंसारोद्धरणं करोति अजितं तु तीव्रनिरयपातनात् शत्रुत्वं कुरुते।

Sri Anandgiri Bhashya

।।6.6।।उक्तमनूद्य प्रश्नपूर्वकं श्लोकान्तरमवतारयति आत्मैवेत्यादिना। एकस्यैवात्मनो मिथो विरुद्धं बन्धुत्वं रिपुत्वं च लक्षणभेदमन्तरेणायुक्तमिति चोदिते वशीकृतसंघातस्यात्मानं प्रति बन्धुत्वमितरस्य शत्रुत्वमित्यविरोधं दर्शयति बन्धुरित्यादिना। वशीकृतसंघातस्य विक्षेपाभावादात्मनि समाधानसंभवादुपपन्नमात्मानं प्रति बन्धुत्वमिति साधयति तस्येति। अवशीकृतसंघातस्य पुनर्विक्षेपोपपत्तेरात्मनि समाधानायोगादात्मानं प्रति शत्रुभावे प्रसिद्धशत्रुवदात्मैव शत्रुत्वेन वर्तेतेत्युत्तरार्धं व्याकरोति अनात्मन इति। दृष्टान्तं व्याचष्टे यथेति।उक्तदृष्टान्तवशादवशीकृतसंघातः स्वस्य हितानाचरणादात्मानं प्रति शत्रुरेवेति दार्ष्टान्तिकमाह तथेति।

Sri Dhanpati Bhashya

।।6.6।।उभयत्रैवकारं प्रत्युञ्जनस्यायमाशयः यत्रापि देवदत्तस्य यज्ञदत्तो बन्धुरुच्यते यत्र वा चैत्रस्य मैत्रो वैरीत्युच्यते तत्रापि चैतन्यस्योपधीयमानस्य स्वतोऽपरिणामित्वान्न बन्धुतारिते। उपाधेः परमन्तःकरणस्यैव रागाख्ये परिणामे बन्धुता द्वेषाख्ये तस्मिन् अरितेति नान्यत्रैतौ धर्मौ संभवत इति बन्धुत्वं रिपुत्वं चान्तःकरणस्य स्पष्टयति बन्धुरिति। तस्यात्मनो जीवस्यात्मान्तःकरणं बन्धुर्भवति येन नियन्त्रा जीवेनान्तःकरणेनैव पूर्वोक्तसहायसहकृतेनात्मा शरीराख्यः सेन्द्रियो जितः स्वाधीनः संपादितः तस्यान्तःकरणं बन्धुरित्यर्थः। कदा पुनरन्तःकरणं रिपुस्तत्राह अनात्मनः पूर्वमात्मशब्देनोक्तस्य देहस्य यदा शत्रुत्वं वशत्वाभावस्तदात्मान्तःकरणमेव शत्रुवद्वर्तत इति ज्ञेयमित्यर्थ इतीतरकल्पितं तत्पुनः पुनरात्मशब्दप्रयोगस्वारस्यान्निरसनीयम्। अन्यथा आत्मशब्दस्य मुख्यामुख्यवृत्त्या बह्वर्थकत्वादन्यदपि किंचित्कल्पयितुं शक्यम्। तथाहि आत्मनेश्वरेणात्मानं जीवमुद्धरेत्। नात्मानमवसादयेत्। यत आत्मा ईश्वर एक जीवस्य बन्धुः स एव चैतस्य रिपुरित्यर्थः। ईश्वरस्यैव बन्धुत्वं रिपुत्वं च स्फुटयति। तस्य जीवस्यात्मेश्वरो बन्धुरुद्धारकः। येनात्मना भक्तियुक्तेन मनसा आत्मेश्वरो जितः वशीकृतः। अनात्मनस्त्ववशीकृतपरमेश्वरस्य त्वीश्वर एव शत्रुवत् शत्रुत्वेन वर्तेत। यद्वा आत्मना पुण्यलब्धेन मनुष्यदेहेनात्मानमुद्धरेत्। यतः आत्मैव देह एवात्मनो बन्धुः सएव जीवस्य रिपुः। देहस्य बन्धुत्वं रिपुत्वं च स्फुटयति। तस्यात्मनः आत्मा देहो बन्धुः येनात्मना विवेकयुक्तेन मनसा आत्मा देहो जितः। अनात्मनस्तु अजितदेहस्य तु शत्रुवत्। शत्रुत्वं देहएव वर्तत इत्यर्थः। अथवा आत्मना अखण्डाकारबुद्धिरुपेणात्मानमहंकारमुत् ऊर्ध्वं नयेत् देहात् प्रच्याव्य ब्रह्मण्यहंब्रह्मास्मीति योजयेत्। नात्मानमहंकारमवसादयेत् परिच्छिन्ने देहे तदभिमानेन पीडयेत्। यत आत्मैवाहंकारएव ब्रह्मणि नियोजितो बन्धुरात्मनो जीवस्य ब्रह्माभेदसंपादनेन बन्धनिवर्तकत्वात्। सएव परिच्छिन्ने देहे पीडितः शत्रुर्जन्ममरणाद्यनर्थनिचयसंपादकत्वात्। अहंकारस्यैव बन्धुत्वं निपुत्वं च विशदयति। तस्यात्मन आत्मा अहंकाररुपो बन्धुर्येनाहंकार एव आत्मनोक्तबुद्धिरुपेण जितः वशीकृत्य ब्रह्माकारतां नीतः। अनात्मनस्त्ववशीकृताहंकारस्य तु शत्रुवच्छत्रुत्वे वर्तत इत्यर्थः। सर्वथाप्यनासक्तेन संसारनिवृत्तिः संपाद्येत्यलं विस्तरेण। तस्मात्प्रकृतानुसारिभाष्योक्तव्याख्यानमेव शरणीकरणीयमिति दिक्।

Sri Jayatritha Bhashya

।।6.6।।आत्मैव हि 6।5 इत्युक्तमेव उत्तरश्लोके किमिति कथ्यते इति मन्दाशङ्कानिरासार्थमाह कस्येति। किंविशेषणश्चेत्यपि ग्राह्यम्। तस्यैव तमेव प्रति बन्धुत्वं रिपुत्वं च विरुद्धम् तद्विशेषणभेदेन व्यवस्थाप्यम्। तथा च किंविशेषणस्यात्मनः किंविशेषणो वाऽऽत्मा बन्धू रिपुश्च इत्यर्थ इति पृच्छायामिति शेषः।आत्मा आत्मनः इति पदद्वयम्। आत्मशब्दस्यानेकार्थत्वाद्व्याचष्टे आत्मेति। नन्वाद्यश्लोके स्वपर्याय एवात्मशब्दः प्रकृतः तदुपपादकद्वितीये कथमन्योऽर्थः इत्यत आह आत्मनेति। अनयैव रीत्याऽऽद्यश्लोकोत्तरार्धगतात्मशब्दव्याख्यानं द्रष्टव्यम्।येनात्मैवात्मना जितः इत्यत्रात्मशब्दौ व्याचष्टे आत्मैवेति। एवशब्दोपादानं व्याख्येयविवेकार्थम्। जीवेनैव इत्यवधारणं प्राधान्यज्ञापनार्थम्। यदाऽऽत्मशब्दो जीवे तदा कर्तरि तृतीया यदा बुद्धौ तदा करण इति ज्ञापयन्नुपपादयति स हीति। विजयति विजयते मन इति शेषः।स्वेनैव रा.भा. इत्यादिव्याख्याननिरासार्थमुक्तेऽर्थे प्रमाणान्याह उक्तं चेति। अनात्मन इति नञ्समासो बहुव्रीहिर्वा स्यात्। नाद्यः आत्मन आत्मान्यत्वानुपपत्तेः आत्मान्तरादन्यत्वस्य च प्रकृतेऽनुपयोगात्। न द्वितीयः आत्मशब्दस्य जीववाचित्वे वा मनोवाचित्वे वा संसारिणि तदभावस्यासम्भवादित्यत आह अनात्मन इति। बहुव्रीहिपरिग्रहसूचनाय पुरुषस्येत्यन्यपदार्थो दर्शितः। अनात्मशब्दार्थं दर्शयितुमाह अजितेति। नन्वविद्यमान आत्मा यस्यासावनात्मा तत्कथमुच्यतेऽजितात्मन इति तत्राह सदपीति। विद्यमानमपि मनोऽजितमनुपकारीति। अविद्यमानसादृश्यादविद्यमानतामुपचर्य अजितात्मा अनात्मोक्त इत्यर्थः। गौणप्रयोगे किं प्रयोजनं इति चेत् न रूढोपचारे प्रयोजनानपेक्षणात् इति भावेनाह सन्नपीति। भृत्यपदे सेवादौ। पदानां व्यवहितत्वादनात्मन इत्यर्धं व्याचष्टे तस्येति। तस्याजितमनस्कस्य बन्धुरेवेत्येवार्थः। शत्रुवत्प्रसिद्धशत्रुरिव शत्रुत्वेऽपकारित्वे।

Sri Madhavacharya Bhashya

।।6.6।।कस्य बन्धुरात्मा इत्याह बन्धुरात्मेति। आत्मा मनः आत्मनो जीवस्य। आत्मना मनसा आत्मानं जीवम्। आत्मैव मनः आत्मना बुद्ध्या जीवेनैव वा।स हि बुद्ध्या विजयति। उक्तं च मनः परं कारणमामनन्तिमन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः मैत्रा.4।3।11।ब्र.बिं.2उद्धरेन्मनसा जीवं न जीवमवसादयेत्। जीवस्य बन्धुः शत्रुश्च मन एव न संशयः।जीवेन बुद्ध्या हि यदा मनो जितं तदा बन्धुः शत्रुरन्यत्र चास्य। ततो जयेद्बुद्धिबलो नरस्तद्देवे च भक्त्या मधुकैटभारौं। इत्यादि ब्रह्मवैवर्ते। अनात्मनोऽजितात्मनः पुरुषस्य अजितमनस्कस्य सदपि मनोऽनुपकारीत्यनात्मा। सन्नपि भृत्यो न यस्य भृत्यपदे वर्तते स ह्यभृत्यः तस्यात्मन एव शत्रुवच्छत्रुत्वे वर्तते।

Sri Madhusudan Saraswati Bhashya

।।6.6।।इदानीं किंलक्षण आत्मात्मनो बन्धुः किंलक्षणो वात्मनो रिपुरित्युच्यते आत्मा कार्यकरणसंघातो येन जितः स्ववशीकृतः आत्मनैव विवेकयुक्तेन मनसैव नतु शस्त्रादिना तस्यात्मा स्वरूपमात्मनो बन्धुरुच्छृङ्खलस्वप्रवृत्त्यभावेन स्वहितकरणात् अनात्मनस्तु अजितात्मन इत्येतत्। शत्रुत्वे शत्रुभावे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् बाह्यशत्रुरिवोच्छृङ्खलप्रवृत्त्या स्वस्य स्वेनानिष्टाचरणात्।

Sri Neelkanth Bhashya

।।6.6।।आत्मना मनः आत्मना मनसा अनात्मनः अजितचेतसः आत्मा मन एव शत्रुः।

Sri Purushottamji Bhashya

।।6.6।।ननु कथं स एव बन्धुः कथं वा स एव शत्रुः अत आह बन्धुरिति। येन आत्मना भावस्वरूपेण आत्मा जितः वशीकृतः अधिकरणादिदेहकृतिभ्यो भावरूपे स्थापित इत्यर्थः। तस्य आत्मन आत्मैव बन्धुर्हितकृद्भवतीत्यर्थः। स्वस्य दास्यार्थे प्रकटितस्य तदुचितकरणैकभावप्रयुक्तसन्तोषेण बन्धुस्तद्भावस्वरूप एव स्वाधिदैविकस्वरूपेण भवतीति भावः। तु पुनः। अनात्मनो भावस्वरूपरहितस्य आत्मैव शत्रुवत् शत्रुत्वे तद्भावप्रतिबन्धके वर्तेत। तथा चायमर्थः भावरहितकेवलकर्मासक्तस्वदास्यार्थप्रकटितप्रयोजनरहितस्वस्य स्वरूपानर्थक्यकृतिरोषेणाधिदैविक आत्मा अत्र कर्मसु सेवादिषु तदावेशप्रतिबन्धको भवेत्।

Sri Ramanuja Bhashya

।।6.6।।येन पुरुषेण स्वेन एव स्वमनो विषयेभ्यो जितं तन्मनः तस्य बन्धुः अनात्मनः अजितमनसः स्वकीयम् एव मनः स्वस्य शत्रुवत् शत्रुत्वे वर्तेत स्वनिःश्रेयसविपरीते वर्तेत इत्यर्थः। यथोक्तं भगवता पराशरेण अपि मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। बन्धाय विषयासङ्गि मुक्त्यै निर्विषयं मनः। (वि0 पु0 6।7।28) इति।योगारम्भयोग्यावस्था उच्यते

Sri Shankaracharya Bhashya

।।6.6।। बन्धुः आत्मा आत्मनः तस्य तस्य आत्मनः स आत्मा बन्धुः येन आत्मना आत्मैव जितः आत्मा कार्यकरणसंघातो येन वशीकृतः जितेन्द्रिय इत्यर्थः। अनात्मनस्तु अजितात्मनस्तु शत्रुत्वे शत्रुभावे वर्तेत आत्मैव शत्रुवत् यथा अनात्मा शत्रुः आत्मनः अपकारी तथा आत्मा आत्मन अपकारे वर्तेत इत्यर्थः।।

Sri Sridhara Swami Bhashya

।।6.6।।कथंभूतस्यात्मैव बन्धुः कथंभूतस्य चात्मैव रिपुरित्यपेक्षायामाह बन्धुरिति। येनात्मनैवात्मा कार्यकारणसंघातरूपो जितो वशीकृतस्तस्य तथाभूतस्यात्मन आत्मैव बन्धुः। अनात्मनोऽजितात्मनस्त्वात्मैवात्मनः शत्रुत्वे शत्रुवदपकारकारित्वे वर्तेत।

Sri Vallabhacharya Bhashya

।।6.6।।किम्भूतस्यैवात्मा बन्धुरात्मा रिपुश्च इत्यपेक्षायामाह बन्धुरिति। आत्मा कार्यकरणसङ्घाताभिमानिरूपः। आत्मना विविक्तधिया।

Vedantadeshikacharya Venkatanatha Bhashya

।।6.6।।एकस्यैवैकं प्रति बन्धुत्वं रिपुत्वं च व्याहतमिति शङ्का परिह्रियते बन्धुरात्मेति श्लोकेन।स्वेनैवेति स्वात्मनेत्यर्थः। मनसो विजयो नाम विषयेभ्यो व्यावर्तनमित्यभिप्रायेणोक्तं विषयेभ्यो विजितमिति। बन्धुत्वोपपादनं हि मनसो विजयेनोक्तम्। शत्रुत्वोपपादनमपि हि तदभावेनेत्यभिप्रायेणोक्तंअनात्मनोऽजितमनस इति।आत्मैव इत्येवकाराभिप्रेतमाह स्वकीयमेव मन इति। स्वशेषभूतमेव हि विरोधि सञ्जातमिति भावः। शत्रुशब्दयोः पुनरुक्तिभ्रमव्युदासायान्वयमाह शत्रुवच्छत्रुत्वे वर्तेतेति। सम्प्रतिपन्नो बाह्यशत्रुरिह दृष्टान्तितः। शत्रुकृत्यमिह शत्रुत्वंविवक्षितमित्याह स्वनिश्श्रेयसविपरीत इति। नन्वत्रात्मनेत्यादीनां मनोविषयत्वं कथम् कार्यकरणसङ्घातविषयत्वं हि परैः (शं.) उक्तम् ऐकरूप्येण सर्वेषामात्मशब्दानां स्वात्मविषयत्वं किं न स्यात् कथं च मनसो जयादिः विषयव्यावर्तनादिरूपः इति शङ्कायां कर्मकर्त्रादिभेदव्यपदेशौचित्यात् पूर्वोत्तरानुसन्धानाच्च सिद्धमेवार्थं संवादेन द्रढयति यथोक्तमिति।

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