पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ | जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ||७-९||
puṇyo gandhaḥ pṛthivyāṃ ca tejaścāsmi vibhāvasau . jīvanaṃ sarvabhūteṣu tapaścāsmi tapasviṣu ||7-9||
Translations
English Translations
9
I am the original fragrance of the earth, and I am the heat in fire. I am the life of all that lives, and I am the penances of all ascetics.
7.9. I am the pure smell in the earth; I am also the brilliance in the sun; I am the life in al beings and austerity in the ascetics.
7.9 I am the Fragrance of earth, the Brilliance of fire. I am the Life Force in all beings, and I am the Austerity of the ascetics.
7.9 Punyah etc. By its own nature pure is that smell which exists in the earth as its exclusive property. The foulness, the excessiveness [of th smell] are due to contamination of other elements. That has been stated [elsewhere] as : '[A particular thing] becomes hard because of the excess of the properties of the earth; foul-smelling on account of the rise of the fire-properties; and stiff due to liberality (excess) of the properties of water' and so on.
7.8 - 7.11 All these entities with their peculiar characteristic are born from Me alone. They depend on Me; inasmuch as they constitute My body, they exist in Me alone. Thus I alone exist while all of them are only My modes.
7.9 I am also the punyah, sweet; gandhah, fragrance; prthivyam, in the earth. The earth is dependent on Me who am its fragrance. The natural sweetness of smell in the earth is cited by way of suggesting sweetness of taste of water etc. as well. But foulness of smell etc. is due to contact with particular things, resulting from nescience, unholiness, etc. of worldly people. Ca, and ; asmi, I am; the tejah, brilliance; vibhavasau, in fire; so also (I am) the jivanam, life-that by which all creatures live; sarva-bhutesu, in all beings. And I am the tapah, austerity; tapasvisu, of ascetics. Ascetics are established in Me who am that austerity.
7.9 I am the pure smell in the earth; I am the brilliance in the fire; I am the life-principle in all beings, and austerity in ascetics.
7.9 I am also the sweet fragrance in the earth; I am the brillinace in the fire, and the life in all beings; and I am the austerity of the ascetics.
7.9 I am the sweet fragrance in the earth and the brilliance in the fire, the life in all beings, and I am the austerity in ascetics.
Hindi Translations
3
।।7.9।।पृथिवीमें मैं पवित्र गन्ध सुगन्ध हूँ अर्थात् उस सुगन्धरूप मुझ ईश्वरमें पृथिवी पिरोयी हुई है। जल आदिमें रस आदिकी पवित्रताका लक्ष्य करानेके लिये यहाँ गन्धकी स्वाभाविक पवित्रता ही पृथिवीमें दिखलायी गयी है। गन्धरस आदिमें जो अपवित्रता आ जाती है वह तो सांसारिक पुरुषोंके अज्ञान और अधर्म आदिकी अपेक्षासे एवं भूतविशेषोंके संसर्गसे है ( वह स्वाभाविक नहीं है )। मैं अग्निमें प्रकाश हूँ तथा सब प्राणियोंमें जीवन हूँ अर्थात् जिससे सब प्राणी जीते हैं वह जीवन मैं हूँ और तपस्वियोंमें तप मैं हूँ अर्थात् उस तपरूप मुझ परमात्मामें ( सब ) तपस्वी पिरोये हुए हैं।
।।7.9।। पृथ्वीमें पवित्र गन्ध मैं हूँ, और अग्निमें तेज मैं हूँ, तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें जीवनीशक्ति मैं हूँ और तपस्वियोंमें तपस्या मैं हूँ।
।।7.9।। पृथ्वी में पवित्र गन्ध हूँ और अग्नि में तेज हूँ; सम्पूर्ण भूतों में जीवन हूँ और तपस्वियों में मैं तप हूँ।।
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English Commentaries
2
Puṇya means that which is not decomposed; puṇya is original. Everything in the material world has a certain flavor or fragrance, as the flavor and fragrance in a flower, or in the earth, in water, in fire, in air, etc. The uncontaminated flavor, the original flavor, which permeates everything, is Kṛṣṇa. Similarly, everything has a particular original taste, and this taste can be changed by the mixture of chemicals. So everything original has some smell, some fragrance and some taste. Vibhāvasu means fire. Without fire we cannot run factories, we cannot cook, etc., and that fire is Kṛṣṇa. The heat in the fire is Kṛṣṇa. According to Vedic medicine, indigestion is due to a low temperature in the belly. So even for digestion fire is needed. In Kṛṣṇa consciousness we become aware that earth, water, fire, air and every active principle, all chemicals and all material elements are due to Kṛṣṇa. The duration of man’s life is also due to Kṛṣṇa. Therefore by the grace of Kṛṣṇa, man can prolong his life or diminish it. So Kṛṣṇa consciousness is active in every sphere.
7.9 पुण्यः sweet? गन्धः fragrance? पृथिव्याम् in earth? च and? तेजः brilliance? च and? अस्मि am (I)? विभावसौ in fire? जीवनम् life? सर्वभूतेषु in all beings? तपः austerity? च and? अस्मि am (I)? तपस्विषु in ascetics.Commentary In Me as odour in the earth woven in Me as brilliance is the fire woven in Me as life all beings are woven in Me as austerity all ascetics are woven. I am the support (Adhishthanam or Asraya) for everything.I am the power or Sakti which helps the ascetics to control the mind and the senses.Krishna says? I am the agreeable odour. If Arjuna had asked Him? Then who is the disagreeable odour? He would have replied? It is also I.
Hindi Commentaries
2
।।7.9।। किस प्रकार परमात्मरूपी सूत्र में नामरूपमय मणि पिरोकर सुन्दर सृष्टिरूप कण्ठाभरण की निर्मिति हुई है इसका वर्णन इन दो श्लोकों में किया गया है। इसके पूर्व भगवान् ने यह कहा था कि परा और अपरा प्रकृतियों के द्वारा मैं ही जगत् का कारण हूँ और मुझसे भिन्न किञ्चिन्मात्र कोई वस्तु नहीं है। वह सनातन तत्त्व क्या है जो सर्वत्र व्याप्त होते हुये भी दृष्टिगोचर नहीं होता इस प्रश्न का उत्तर यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण ने दिया है।किसी वस्तु का धर्म या स्वरूप वह है जो सदा एक समान बना रहता है और जिसके बिना उस वस्तु का अस्तित्व ही सिद्ध नहीं हो सकता। यहाँ दिये दृष्टान्त जल में रस सूर्य चन्द्र में प्रकाश समस्त वेदों में प्रणव आकाश में शब्द पृथ्वी में पवित्र गन्ध पुरुषों में पुरुषत्व एवं तपस्वियों में तप आदि ये सब दर्शाते हैं कि आत्मा ही वह तत्त्व है जिसके कारण इन वस्तुओं का अपना विशेष अस्तित्व होता है। संक्षेपत आत्मा समस्त भूतों का जीवन है।भगवान् श्रीकृष्ण कुछ और उदाहरण देते हुये कहते हैं
।।7.9।। व्याख्या--'पुण्यो गन्धः पृथिव्याम्'--पृथ्वी गन्ध-तन्मात्रासे उत्पन्न होती है, गन्ध-तन्मात्रारूपसे रहती है और गन्ध-तन्मात्रामें ही लीन होती है। तात्पर्य है कि गन्धके बिना पृथ्वी कुछ नहीं है। भगवान् कहते हैं कि पृथ्वीमें वह पवित्र गन्ध मैं हूँ।यहाँ गन्धके साथ पुण्यः'विशेषण देनेका तात्पर्य है कि गन्धमात्र पृथ्वीमें रहती है। उसमें पुण्य अर्थात् पवित्र गन्ध तो पृथ्वीमें स्वाभाविक रहती है, पर दुर्गन्ध किसी विकृतिसे प्रकट होती है। 'तेजश्चास्मि विभावसौ'--तेज रूप-तन्मात्रासे प्रकट होता है, उसीमें रहता है और अन्तमें उसीमें लीन हो जाता है। अग्निमें तेज ही तत्त्व है। तेजके बिना अग्नि निस्तत्त्व है, कुछ नहीं है। वह तेज मैं ही हूँ। 'जीवनं सर्वभूतेषु'--सम्पूर्ण प्राणियोंमें एक जीवनीशक्ति है, प्राणशक्ति है, जिससे सब जी रहे हैं। उस प्राणशक्तिसे वे प्राणी कहलाते हैं। प्राणशक्तिके बिना उनमें प्राणिपना कुछ नहीं है। प्राणशक्तिके कारण गाढ़ नींदमें सोता हुआ आदमी भी मुर्दे-से विलक्षण दीखता है। वह प्राणशक्ति मैं ही हूँ !'तपश्चास्मि तपस्विषु'--द्वन्द्वसहिष्णुताको तप कहते हैं। परन्तु वास्तवमें परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये कितने ही कष्ट आयें, उनमें निर्विकार रहना ही असली तप है। यही तपस्वियोंमें तप है, इसीसे वे तपस्वी कहलाते हैं और इसी तपको भगवान् अपना स्वरूप बताते हैं। अगर तपस्वियोंमेंसे ऐसा तप निकाल दिया जाय तो वे तपस्वी नहीं रहेंगे।
Sanskrit Commentaries
13
।।7.9।।पुण्य इति। यो धरायां (S धरायाः) केवलधर्मतया गन्धगुणः स स्वभावपुण्यः। पूत्युत्कटादीनि(SN प्रत्युत्कटत्वादीनि) तु भूतान्तरसंबन्धात्। उक्तं च दृढं भूमिगुणाधिक्याद् दुर्गन्ध्यग्निगुणोदयात्।जडमम्बुगुणौदार्यात् इत्यादि।
।।7.9।।मयि सर्वमिदं प्रोतमित्यस्यैव परिमाणार्थं प्रकारान्तरमाह पुण्य इति। पृथिव्यां पुण्यशब्दितो यः सुरभिगन्धः सोऽहमस्मीत्यत्र वाक्यार्थं कथयति तस्मिन्निति। कथं पृथिव्यां गन्धस्य पुण्यत्वं तत्राह पुण्यत्वमिति। यत्तु पृथिव्यां गन्धस्य स्वाभाविकं पुण्यत्वं दर्शितं तदबादिषु रसादेरपि स्वाभाविकपुण्यत्वस्योपलक्षणार्थमित्याह पृथिव्यामिति। प्रथमोत्पन्नाः पञ्चापि गुणाः पुण्या एव सिद्धादिभिरेव भोग्यत्वादिति भावः। कथं तर्हि गन्धादीनामपुण्यत्वप्रतिभानं तत्राह अपुण्यत्वं त्विति। तदेव स्फुटयति संसारिणामिति। गन्धादयः स्वकार्यैर्भूतैः सह परिणममानाः प्राणिनां पापादिवशादपुण्याः संपद्यन्त इत्यर्थः।यच्चाग्नेस्तेजस्तद्भूते मयि श्रोतोऽग्निरित्याह तेज इति। जीवनभूते च मयि सर्वाणि भूतानि प्रोतानीत्याह तथेति। जीवनशब्दार्थमाह येनेति। अन्नरसेनामृताख्येनेत्यर्थः। तपश्चास्मीत्यादेस्तात्पर्यार्थमाह तस्मिन्निति। चित्तैकाग्र्यमनाशकादि वा तपस्तदात्मनीश्वरे प्रोतास्तपस्विनो विशेषणाभावे विशिष्टस्य वस्तुनोऽभावादित्यर्थः।
।।7.9।।पृथ्वीसारभूते सुरभिगन्धे गन्धतन्मात्रभूते मयि पृथिवी प्रोता। रसादेः पुण्यत्वं स्वभावादेवापुण्यत्वं त्वविद्याधर्माद्यपेक्षं संसारिणां भूतविशेषनिमित्तजं भवति। अग्निसारभूते तेजसि तेजोरुपे मयि विभावसुरग्निः प्रोतः।तथा जीवने सर्वमूतसारभूते आयरुपे अन्नरुपे वा तस्मिंस्तद्रूपे मयि सर्वे भूताः प्रोताः। तपस्विसारभूते तपोरुपे मयि तपस्विनः प्रोताः।
।।7.8 7.12।।भूमिः 7।4 इत्यादिनेत्यत्रावधेरनुक्तेःरसोऽहं इत्याद्यपि ज्ञानप्रकरणमिति प्रतीतिः स्यात् तन्निरासाय तत्समाप्तिमाह इदमिति। एतावता ग्रन्थेन ज्ञानं निरूपितमित्यर्थ। कुतोऽत्र ज्ञानप्रकरणस्य समाप्तिः इत्यत आह रसोऽहमिति। इतिशब्दाद्यभावेऽपि प्रकरणान्तरारम्भ एव समाप्तिं गमयिष्यति। अलौकिकमाहात्म्यप्रतिपादनादस्य विज्ञानप्रकरणत्वं ज्ञायत इति भावः।प्रभवादेः इत्युक्तन्यायेनैवरसोऽहं इत्यादेरपि व्याख्यानं सिद्धम्। रसादीनां सत्तादिकारणत्वाद्भोक्तृत्वाच्च भगवान् रसादिरिति। नन्वबादयो धर्मिणो भगवदधीनास्तद्भोग्याश्चेत्यङ्गीक्रियते न वा। नेति पक्षेअहं कृत्स्नस्य 7।6 इत्युक्तविरोधः। आद्ये तुअप्सु रसः इत्यादेर्धर्मिभ्यो निष्कृष्य धर्माणां ग्रहणस्यानुपपत्तिरित्यतः प्रथमं पक्षं तावदङ्गीकरोति अबादयोऽपीति। धर्मिणोऽपि तदधीना एव तद्भोग्याश्चैव। ननु तत्रोक्तो दोष इत्यतः कारणत्वे तावद्विशेषशब्दोपादाने प्रयोजनमाह तथापीति। यद्यपि धर्मिणोऽपि भगवदधीना एव तथापि धर्मिभ्यो निष्कृष्य धर्माणामुपादानं युज्यत इति शेषः। कथं इत्यत आह रसादीति। रसादयश्च ते स्वभावा अबादीनामनागन्तुकधर्माश्चेति रसादिस्वभावास्तेषां साराणामबादिधर्मेषु सङ्ख्यादिषु श्रेष्ठानां च तेषामेवाबादिस्वभावभूतानां तद्धर्मेषु श्रेष्ठानां च रसादीनामिति यावत्। स्वभावत्वेऽबादीनामिति शेषः। सारत्वेऽबादिधर्मेष्विति शेषः। रसादित्वे चेति चार्थः। स भगवानेव। विशेषतोऽपीत्यस्य व्यावर्त्यं न त्विति। अनुबद्धोऽनुषङ्गसिद्धः। तत्सारत्वादिश्चेति। तस्य रसादेरबादिधर्मेषु सारत्वमबादिस्वभावत्वं रसत्वादिकंचेत्यर्थः। यथा लोके कुविन्दादिः पटादिद्रव्येष्वेव व्यापारवाननुभूयते न तु तदीयेषु गन्धरसादिषु गुणेषु तद्धर्मेषु च गन्धत्वादिषु पृथग्व्यापारवान् किन्तु ते पटादिजन्मानुषङ्गिजन्मान एव। न तथा भगवान्। अपित्वबादेधर्मेषु रसादिषु तद्धर्मेषु च स्वभावत्वादिषु पृथक् प्रयत्नवान् नत्वबादिनियमानुषङ्गिसत्तादिकास्त इति दर्शयितुं विशेषशब्दा उपात्ता इत्यर्थः। भोगपक्षेऽपि प्रयोजनमाह भोगश्चेति। अबादिभोगादप्यतिशयेन रसादेर्भोगः परमेश्वरस्येति दर्शयति विशेषशब्दैरिति सम्बन्धः।रसोऽहं इत्याद्यभेदोक्तेरर्थान्तरं सूचयन् तत्रापि विशेषशब्दोपादाने प्रयोजनमाह उपासनार्थं चेति। विशेषतः रसादेरिति वर्तते। अर्थवशाद्रसादेरिति सप्तमीत्वेन विपरिणम्यते। रसादयः परमेश्वरोपासने प्रतिमात्वेनात्र विवक्षिताः। प्रतिमायां चाभेदोक्तिः प्रसिद्धा। प्रतिमात्ममबादीनां समानम्। योऽप्सु तिष्ठन् बृ.उ.7।3।4 इत्यादेः। अतः किं विशेषशब्दग्रहणेनेति चेत् अबादिभ्यो विशेषतः रसादिषु भगवदुपासनार्थं तदुपपत्तिरिति।उक्तेऽर्थत्रये प्रमाणमाह उक्तं चेति। तथा चशब्दः अन्योन्यसमुच्चये। एवशब्दस्येश्वर इत्यनेन सम्बन्धः। सर्वत्राबादिषु। ईश्वरो रसादिकं जगदित्युच्यत इत्यर्थः। अबादयोऽबाद्यभिमानिनः। ज्ञानिनां ज्ञानार्थिनां सम्पत्त्यै प्राप्त्यै अन्येषां रसार्थिनाम्। अबादय इति रसादीति च पादयोः सप्तनवाक्षरत्वेऽपि न वा एकेनाक्षरेण छन्दांसि वियन्ति ऐ.ब्रा.1।6 इति वचनाददोषः। स्वभावस्य भगवदधीनत्वमलौकिकमित्यतस्तत्रान्यान्यपि वाक्यानि पठति स्वभाव इति। अस्त्वेवं धर्मिभ्यो निष्कृष्य धर्माणामुपादानम् धर्माणां विशेषणोपादानं तु किमर्थमित्यत आह धर्मेति। आदिपदेनपुण्यो गन्धः इत्यस्य ग्रहणम्। कामादिषु विशिष्टंष्वेव भगवानुपास्यः न धर्मविरुद्धेष्वशुचिष्विति ज्ञापनाय कामादीनां धर्माणां धर्माविरुद्धत्वादिविशेषणोपादानमित्यर्थः। अत्र प्रमाणमाह उक्तं वेति। कामं पुरुषार्थम्। कामरागादेः कामरागादिना। अनिञ्छद्भिः कामादिकम्। गन्धस्य विशेषणोपादाने प्रयोजनान्तरमाह पुण्य इति। पुण्यगन्धस्यैव भगवतो भोगो न दुर्गन्धस्येति ज्ञापयितुमत्र विशेषणोपादानमित्यर्थः। ननु दुर्गन्धं भगवाननुभवति न वा नेति पक्षे सार्वज्ञाभावः आद्ये कथं भोगाभावः उच्यते अनुभूयमाना अपि दुर्गन्धादयो न फलहेतव इत्यभिप्रायः। सुगन्धस्तु सुखहेतुरित्युपपादितम्।शुचिवस्त्वेव भगवतो भोग्यमित्यत्र प्रमाणमाह तथा हीति। अमुमुपासकम्। कुतः तस्य देवत्वात्। तथापि कुतः न ह वै देवमात्रस्य पुण्यभोगनियमे देवोत्तमस्य सुतरां तत्सिद्धि।ऋतं कठो.3।1 इति श्रुतिः कथं प्रकृतोपयोगिनी इत्यत आह ऋतं चेति। कुतः इत्यतः सामान्यविशेषाभिधानादित्याह ऋतमिति। प्रयोगगः शब्दजन्यः। तथा च श्रुतावृतशब्दः पुण्यफलस्योपलक्षक इति भावः। स्यादिदं व्याख्यानं यदि भगवतोविषयभोगो युक्तः स्यात् न चैवम् तदङ्गीकारे श्रुत्यादिविरोधात्। ऋतं पिबन्तौ इति चात एव छत्रिन्यायेनोपचरितमित्यत आह न चेति। कुतो नेत्यत आह स्थूलेति। श्रुत्यादिषु स्थूलस्य जीवभोग्यस्य विषयस्याभोगोक्तेः सूक्ष्मभोगस्य चाङ्गीकारादिति भावः। सूक्ष्माशने प्रमिते भवेदियं व्यवस्था। तदेव कुतः इत्यत आह आह चेति। गन्धादिषु यो जीवेन्द्रियागोचरः सारभागस्तस्य भोगम्। परमेश्वरोऽस्माच्छारीरादात्मनो जीवादतिशयेन विलक्षणभोग एव भवति। अवतारेषु स्थूलमपि भुङक्ते इतीवशब्दः।ननु प्रविविक्ताहारतरोऽयं जीव एवेत्यत आह न चेति। न हि जीवो जीवादेव विलक्षणाहार इति युज्यत इत्यर्थः। ननु शारीराज्जागरावस्थाज्जीवात्स्वप्नसुषुप्त्यवस्थः स एव प्रविविक्ताहार इत्यवस्थाभेदोपाधिकं जीवस्य भेदमङ्गीकृत्य व्याख्यास्यामीत्यत आह स्वप्नादिश्चेति।स्वपो नन् अष्टा.3।3।91 इति स्वप्नशब्दः कर्तरि। स्वप्नः सुषुप्तश्च शारीर एव न केवलं जाग्रत् तथाच त्र्यवस्थस्यापि शारीरशब्देन गृहीतत्वात् न ततो भेदः स्वप्नसुषुप्तयोरित्यर्थः। अवस्थात्रयवतोऽपि शारीरत्वं कुतः इत्यत आह शारीर स्त्विति। जाग्रदादिष्वंवस्थासु। अस्तु त्र्यवस्थोऽपि शारीरः तथाप्यस्मादिति विशेषणेनात्र शारीरादिति जाग्रदवस्थो गृह्यते। तस्माच्च स्वप्नाद्यवस्थस्य भेदोक्तिरुक्तविधया सम्भवति। भवत्पक्षेऽपि शारीरादिति जीवे सिद्धेऽस्मादिति विशेषणं व्यर्थं स्यादिति तत्राह अस्मादिति। नैतद्विशेषणसार्थक्यायेश्वरं परित्यज्य जीवोऽत्र ग्राह्यः शारीरादित्येवोक्तावीश्वरस्यापि प्राप्तावीश्वरादेवेश्वरस्य भेदानुपपत्तेः। तद्व्यावृत्त्यर्थं जीवमात्रपरिग्रहाय विशेषणमिति सार्थक्योपपत्तेरित्यर्थः। भवेदेवं यदि शारीरत्वमीश्वरस्यापि स्यात् तदेव कुतः इत्यत आह शारीराविति। नन्वेवं पक्षद्वयेऽप्युपपत्तावीश्वर एवात्रोच्यते न जीवः इति कुतः विनिगमनमित्यत आह भेदेति। चो हेतौ। भेदश्रुतेः स्वाभाविकभेदरूपे गत्यन्तरे सम्भवति पुरुषभेद एवार्थतया ग्राह्यः न त्ववस्थोपाधिको भेदः।मुख्यामुख्ययोर्मुख्ये सम्प्रत्ययात् अतो युक्तं विनिगमनम्। न केवलमुक्तव्यवस्था न्यायप्राप्ता किन्त्वागमसिद्धा चेत्याह आह चेति। अभोक्ता च भोक्ता चेत्येतयोर्व्युत्क्रमेणान्धयः।सर्वभूतस्थमात्मानं 6।29 इत्युक्तत्वात्।न त्वहं तेषु 7।12 इति कथमुच्यते इत्यत आह न त्वहमिति। तदनाधारत्वं तदुपजीवनेन स्थित्यभावः। कुत एतत् इत्यत आह उक्तं चेति। न केवलं मुक्तविरोधादिति चार्थः।
।।7.8 7.12।।इदं ज्ञानम्। रसोऽहमित्यादिविज्ञानम्। अबादयोऽपि तत एव। तथापि रसादिस्वभावाना सागणां च स्वभावत्वे सारत्वे च विशेषतोऽपि स एव नियमाकः न त्वबादिनियमानुबद्धो रसादिस्तत्सारत्वादिश्चेति दर्शयति अप्सु रस इत्यादिविशेषशब्दैः। भोगश्च विशेषतो रसादेरिति च उपासनार्थं च।उक्तं च गीताकल्पेरसादीनां रसादित्वे स्वभावत्वे तथैव च। सारत्वे सर्वधर्मेषु विशेषेणापि कारणम्। सारभोक्ता च सर्वत्र यतोऽतो जगदीश्वरः। रसादिमानिनां देहे स सर्वत्र व्यवस्थितः। अबादयः पार्षदाश्च ध्येयः स ज्ञानिनां हरिः। रसादिसम्पत्त्या अन्येषां वासुदेवो जगत्पतिः इति।स्वभावो जीव एव च।सर्वस्वभावो नियतस्तेनैव किमुतापरम्।न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् इति च।धर्माविरुद्धःकामरागबिवर्जितम्इत्याद्युपासनार्थम्। उक्तं च गीताकल्पेधर्मारुविद्धकामेऽसावुपास्यः काममिच्छता। विहीने कामरागादेर्बले च बलमिच्छता। ध्यातस्तत्र त्वनिच्छद्भिर्ज्ञानमेव ददाति च इत्यादि पुण्यो गन्ध इति भोगापेक्षया। तथा हि श्रुतिः पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान् पापं गच्छति बृ.उ.1।5।20 ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके कठो.3।1 इत्यादिका। ऋतं च पुण्यम्।ऋतं सत्यं तथा धर्मः सुकृतं चाभिधीयते इत्यभिधानात्।ऋतं तु मानसो धर्मः सत्यं स्यात्सम्प्रयोगगः इति च। नच अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति श्वे.उ.4।6 मुं.3।1।1ऋक्2।3।17।5अन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान् इत्यादिविरोधि स्थूलानशनोक्तेः। आह च सूक्ष्माशनम्। प्रविविक्ताहारतर इवैव भवत्यस्माच्छारीरारादात्मनः।न चात्र जीव उच्यते शारीरादात्मन इति भेदाभिधानात्। स्वप्नादिश्च शारीर एवशारीरस्तु त्रिधा भिन्नो जाग्रदादिष्ववस्थितेः इति वचनाद्गारुडे। अस्मादिति त्वीश्वरव्यावृत्त्यर्थम्।शारीरौ तावुभौ ज्ञेयौ जीवश्चेश्वरसंज्ञितः। अनादिबन्धनस्त्वेको नित्यमुक्तस्तथाऽपरः इति वचनान्नारदीये भेदश्रुतेश्च। सति गत्यन्तरे पुरुषभेद एव कल्प्यो नत्ववस्थाभेदः। आह च प्रविविक्तभुग्यतो ह्यस्माच्छारीरात्पुरुषोत्तमः। अतोऽभोक्ता च भोक्ता च स्थूलाभोगात्स एव तु इति गीताकल्पे। न त्वहं तेष्विति तदनाधारत्वमुच्यते। उक्तं च तदाश्रितं जगत्सर्वं नासौ कुत्रचिदाश्रितः इति गीताकल्पे।
।।7.9।।पुण्यः सुरभिरविकृतो गन्धः सर्वपृथिवीसामान्यरूपस्तन्मात्राख्यः पृथिव्यामनुस्यूतोऽहम्। चकारो रसादीनामपि पुण्यत्वसमुच्चयार्थः। शब्दस्पर्शरूपरसगन्धानां हि स्वभावत एव पुण्यत्वमविकृतत्वं प्राणिनामधर्मविशेषात्तु तेषामपुण्यत्वं नतु स्वभावत इति द्रष्टव्यम्। तथा विभावसावग्नौ यत्तेजः सर्वदहनप्रकाशनसामर्थ्यरूपमुष्णस्पर्शसहितं सितभास्वरं रूपं पुण्यं तदहमस्मि। चकाराद्यो वायौ पुण्य उष्णस्पर्शात्तुराणामाप्यायकः शीतस्पर्शः सोऽप्यहमिति द्रष्टव्यम्। सर्वभूतेषु सर्वेषु प्राणिषु जीवनं प्राणधारणमायुरहमस्मि। तद्रूपे मयि सर्वे प्राणिनः प्रोता इत्यर्थः। तपस्विषु नित्यं तपोयुक्तेषु वानप्रस्थादिषु यत्तपः शीतोष्णक्षुत्पिपासादिद्वन्द्वसहनसामर्थ्यरूपं तदहमस्मि। तद्रूपे मयि तपस्विनः प्रोताः विशेषणाभावे विशिष्टाभावात्। तपश्चेति चकारेण चित्तैकाग्र्यमान्तरं जिह्वोपस्थादिनिग्रहलक्षणं बाह्यं च सर्वं तपः समुच्चीयते।
।।7.9।।पुण्य इति। रसादिष्वपि द्रष्टव्यम्। अपुण्यस्य सर्वस्याविद्यामात्रविलसितत्वात्। विभावसौ वह्नौ तेजः दहनशक्तिः। जीवन्त्यनेनेति जीवनमन्नं विराजम्। तत्र हि सर्वाणि भूतानि प्रोतानि। अन्ये तु जीवनं आयुरिति व्याचक्षते तपश्चेति। तपो धर्मस्तद्रूपे मयि तपस्विनः प्रोताः।
।।7.9।।च पुनः पृथिव्यां पुण्यो गन्धोऽस्मि येन गन्धेन पुलिन्द्यादिषु भगवद्रसोत्पत्तिः स्यात् स पुण्यरूपो गन्धस्तत्सम्बन्धेन पृथिव्या गन्धवत्त्वं तद्वत्त्वेनात्रत्यामोदेनाऽऽह्लादकवृन्दावनाधारत्वादिकं चेति भावः। तथा विभावसौ अग्नौ यत्तेजस्तापकत्वं कान्तिस्तदहमस्मि।अत्रायं भावः विप्रयोगतापरूपाग्नेर्ममांशसम्बन्धेनाग्नौ तापस्तेन सर्वपरिपाकं कृत्वा सर्वस्यान्नादेर्मद्भोग्यतासम्पादकत्वं भवतीति भावः। सर्वभूतेषु जीवनं प्राणधारणम् अन्यथा भगवद्वियुक्तानां तेषां तदाधारतां विना कथं स्थितिः स्यात्। तपस्विषु तापप्रयत्नवत्सु तपःक्लेशानन्दरूपोऽस्मि। अन्यथा तदभावे सुखादित्यागेन दुःखे को वा प्रवर्तते।
।।7.9।।एते सर्वे विलक्षणा भावा मत्त एव उत्पन्नाः मच्छेषभूता मच्छरीरतया मयि एव अवस्थिताः अतः तत्प्रकारः अहम् एव अवस्थितः।
।।7.9।। पुण्यः सुरभिः गन्धः पृथिव्यां च अहम् तस्मिन् मयि गन्धभूते पृथिवी प्रोता। पुण्यत्वं गन्धस्य स्वभावत एव पृथिव्यां दर्शितम् अबादिषु रसादेः पुण्यत्वोपलक्षणार्थम्। अपुण्यत्वं तु गन्धादीनाम् अविद्याधर्माद्यपेक्षं संसारिणां भूतविशेषसंसर्गनिमित्तं भवति। तेजश्च दीप्तिश्च अस्मि विभावसौ अग्नौ। तथा जीवनं सर्वभूतेषु येन जीवन्ति सर्वाणि भूतानि तत् जीवनम्। तपश्च अस्मि तपस्विषु तस्मिन् तपसि मयि तपस्विनः प्रोताः।।
।।7.9।।किंच पुण्य इति। पुण्योऽविकृतो गन्धः। गन्धतन्मात्रं पृथिव्या आश्रयभूतमहमित्यर्थः। यद्वा विभूतिरूपेणाश्रयधत्वस्य विवक्षितत्वात्सुरभिगन्धस्यैवोत्कृष्टतया विभूतित्वात्पुण्यो गन्ध इत्युक्तम्। तथा विभावसावग्नौ यत्तेजः सहजा दीप्तिस्तदहम्। सर्वभूतेषु जीवनं प्राणधारणमायुरहमित्यर्थः। तपस्विषु वानप्रस्थादिषु द्वन्द्वसहनरूपं तपोऽस्मि।
।।7.9।।पुण्य इति। सुरभिर्गन्धः पृथिव्यां तेजश्चास्मि विभावसौ। स्पष्टमेव। सर्वभूतेषु जीवनं प्राणनं तपः कायशोधनम्।
।। 7.9 एवंभूमिरापः 7।4 इत्यादिना भेदश्रुत्यर्थ उपबृंहितःमयि सर्वम् 7।7 इति तु घटकश्रुत्यर्थः अथ तदुभयनिर्वाहिताभेदश्रुत्यर्थोपबृंहणं क्रियत इत्यभिप्रायेणाह अत इति। केचित्मयि सर्वमिदम् इत्यस्य रसादिधर्मविशिष्टे मयि प्रोतमित्यर्थः तद्विवरणंरसोऽहम् इत्यादि इति व्याचख्युः तत्परिहारायाह सर्वस्य परमपुरुषशरीरत्वेनेति। परोक्ते त्वाधाराधेयभाववैपरीत्यादिदोष इति भावः। प्रकारवाचिशब्दानां प्रकारिणि पर्यवसानस्वाभाव्यं जातिगुणादिशब्देष्वपि सामान्यतः सिद्धमिति दर्शयितुं प्रकारत्वोपादानम्।अभिधानं मुख्यवृत्त्या बोधनम्। यद्यपि रसादिशब्दा लोके निष्कर्षकाः प्रयुज्यन्ते व्यधिकरणतया चात्रावादिद्रव्योपादानम् तथापि रसादीनां परमात्मशरीरभूतद्रव्यप्रकारत्वेन परमात्मनः प्रकारित्वाद्रसादिशब्दानां चात्र तत्समानाधिकरणतया प्रयोगात्तत्र निष्कर्षकत्वं नास्तीत्यभ्युपगन्तव्यम्। द्रव्योपादानं तु तत्रतत्र द्रव्ये प्रधानभूतरसगन्धादिप्रकारीभूतोऽहमिति ज्ञापनार्थम्। द्रव्यप्रकाराणां च तत्प्रकारत्वं काठिन्यवान् (न्येन)यो बिभर्ति वि.पु.1।14।28 इत्यादिषु प्रयुक्तमिति भावः। रसस्य पृथिव्यां वृत्तौ सत्यामप्यपां रूपादिगुणान्तरसद्भावेऽपिरसोऽहमप्सु इति विशिष्योपादानं तेजस्तत्त्वादब्रूपपरिणामस्य पूर्वतत्त्वानुत्पन्नरसप्रधानत्वात्। अन्यत्र चआत्तगन्धा तदा (ततो) भूमिः प्रलयत्वाय कल्पते वि.पु.6।4।14 इत्यादिना च पृथिव्यादीनां गन्धरसाद्यधीनत्वमुक्तम्। एवमुत्तरत्रापि प्राधान्यतो विशेषनिर्देशे यथोचितं भाव्यम्।प्रभा स्वाश्रयातिरिक्तप्रसारितेजोद्रव्यविशेषः। प्रभयैव चन्द्रसूर्यौ जगदुपकारहेतुभूताविति तौ तत्प्रधानौ। सर्वेषां वेदानां बीजत्वादिना तेषुप्रणवः प्रधानभूतः।पौरुषं पुरुषस्य भावः यतः पुरुषबुद्धिरित्येके सन्तानपरम्पराहेतुभूतं रेत इत्यपरे यद्वा पौरुषं सामर्थ्यं कर्तृत्वशक्तिरित्यर्थः तयैव हि कर्तुरात्मनः कारकान्तरेभ्यः प्राधान्यम्। नृषु जीवेष्वित्यर्थः। यद्वा पौरुषं पुंस्त्वम् स्त्रीनपुंसकव्यावृत्तः सत्त्वादिस्वभावविशेषः। नृशब्दश्च पुरुषपर्यायः। पुण्यो गन्धः तुलस्यादिगन्धः सुरभिगन्धमात्रं वा तद्योगेन हि पृथिवी सत्त्वोन्मेषस्य सुखस्य वा हेतुर्भवति। विभावसुरत्राग्निः। तत्र च तेजो दाहकत्वशक्तिः। भूतशब्देनात्र शरीरिणो गृह्यन्ते। सर्वशब्देनात्र ब्रह्मशर्वादीनामपि सङ्ग्रहः। तेषु जीवनं प्राणनम् प्राणस्थितिहेतुर्वा। येन सर्वाणि भूतानि जीवन्ति भूतेषूपजीवनीयं वा रूपम्।सर्वभूतानां सनातनं बीजं प्रकृतितत्त्वम्। अथवा प्रधानधर्मनिर्देशप्रकरणत्वाद्बीजशब्दोऽत्रोपादानत्वाख्यस्वभावपरः। सर्वेषां परिणामिद्रव्याणां स्वकार्यपरिणामसामर्थ्यमित्यर्थः। अथवा बीजं प्ररोहकारणं जङ्गमस्थावरभूतानां तत्तदुपादानद्रव्यम्। बुद्धिः अध्यवसायः ज्ञानमात्रं वा। तेजस्विनः प्रतापशीलाः तेषां तेजः अनभिभवनीयत्वं पराभिभवसामर्थ्यं वा। तेजोऽभिमान इति केचित् प्रागल्भ्यमित्यपरे। बलं धारणादिशक्तिः। कामरागवशात् स्वकार्ये प्रवृत्तस्य बलस्य परपीडादिहेतुत्वाद्धर्मोपयुक्तशरीरादिधारणमात्रादिविषयत्वायकामरागविवर्जितम् इत्युक्तम्। काम इच्छायाः काष्ठा प्राप्तदशा। राग इच्छा। यद्वा कामशब्दः काम्यपरः तद्विषयो रागः कामरागः भूतेषु देवमनुष्यादिरूपेणावस्थितेषु जन्तुषु। धर्माविरुद्धः कामः स्वदारप्रीत्यादिः।अथरसोऽहम् इत्यादिसामानाधिकरण्यं सहेतुकमुपपादयति एत इति। न चायं तदधीनसामर्थ्यप्रदर्शनार्थोराजा राष्ट्रम् इत्यादिवदारोपः मुख्यसम्भवे वृत्त्यन्तरायोगादिति भावः।एत इत्यनेनेश्वरव्यतिरिक्तैरशक्यक्रियत्वमभिप्रेतम्।सर्व इत्यनेन ब्रह्मरुद्रादिभिरन्यैश्च क्रियमाणानामपि ब्रह्मादिशरीरपरमात्माधीनसृष्टत्वम्अहं कृत्स्नस्य 7।6 इति पूर्वोक्तं स्मारितम्। वक्ष्यमाणराजसतामसेभ्यो वैलक्षण्यार्थमुक्तंविलक्षणा इति।मत्त एव पृथग्विधाः 10।5 इति च वक्ष्यते। एतेनन विलक्षणत्वादस्य ब्र.सू.2।1।4 इत्यधिकरणार्थोऽपि स्मारितः।मत्त एवोत्पन्ना इत्यादि तत्तद्वस्त्वनुरूपं यथासम्भवं सामानाधिकरण्यहेतुः। गुणजातिशरीरेष्वनुगतः सामानाधिकरण्यहेतुरपृथक्सिद्धिरिति प्रदर्शनायोक्तंमय्येवावस्थिता इति।