यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः | प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ||८-२३||
yatra kāle tvanāvṛttimāvṛttiṃ caiva yoginaḥ . prayātā yānti taṃ kālaṃ vakṣyāmi bharatarṣabha ||8-23||
Translations
English Translations
9
O best of the Bhāratas, I shall now explain to you the different times at which, passing away from this world, the yogī does or does not come back.
8.23. Departing at what times the Yogins attain the non-return or the return only-those times I shall declare to you, O chief of the Bharatas !
8.23 *Now I will tell thee, O Arjuna, of the times at which, if the mystics go forth, they do not return, and at which they go forth only to return.
8.23 Yatra etc. The non-return : emancipation. The return : i.e., for enjoying [worldly life]. (23)
8.23 - 8.24 Here, the term 'time' denotes a path, having many deities beginning with day and ending with year. The deities preside over divisions of time. The meaning is - I declare to you the path departing in which Yogins do not return and also the path departing in which the doers of good actions return. By the clause, 'Light in the form of fire, the day, bright fortnight, six months of the northern course,' year also is denoted.
8.23 Bharatarsabha, O best of the Bharata dynasty; vaksyami, I shall speak; tu, now; tam, of that; kalam, time; prayatah, by departing, by dying; (-these words are to be which time; yoginah, the yogis; yanti, attain; anavrttim, the State of Non-return, of nonrirth; ca eva, and also; of the time by departing at which they attain its opposite, avrttim, the State of Return. By 'Yogis' are implied both the yogis (men of meditation) and the men of acitons (rites and duties). But the men of action are yogis by courtesy, in accordance with the description, 'through the Yoga of Action for the yogis' (3.3). The Lord speaks of that time: [This is Ast.'s reading.-Tr.]
8.23 O best of the Bharata dynasty, I shall now speak of that time by departing at which the yogis attain the State of Non-return, and also (of the time by departing at which they attain) the State of Return. 8.23 Now I will tell thee, O chief of Bharatas, the times departing at which the Yogis will return or not return. 8.23 Bharatarsabha, O best of the Bharata dynasty; vaksyami, I shall speak; tu, now; tam, of that; kalam, time; prayatah, by departing, by dying; (-these words are to be which time; yoginah, the yogis; yanti, attain; anavrttim, the State of Non-return, of nonrirth; ca eva, and also; of the time by departing at which they attain its opposite, avrttim, the State of Return. By 'Yogis' are implied both the yogis (men of meditation) and the men of acitons (rites and duties). But the men of action are yogis by courtesy, in accordance with the description, 'through the Yoga of Action for the yogis' (3.3). The Lord speaks of that time: [This is Ast.'s reading.-Tr.]
8.23 O best of the Bharata dynasty, I shall now speak of that time by departing at which the yogis attain the State of Non-return, and also (of the time by departing at which they attain) the State of Return.
8.23 Now I will tell thee, O chief of Bharatas, the times departing at which the Yogis will return or not return.
Hindi Translations
3
।।8.23।।जिन्होंने ओंकारमें ब्रह्मबुद्धि सम्पादन की है जिन्हें कालान्तरमें मुक्ति मिलनेवाली है तथा यहाँ जिनका प्रकरण चल रहा है उन योगियोंकी ब्रह्मप्राप्तिके लिये आगेका मार्ग बताना चाहिये। अतः विवक्षित अर्थको बतलानेके लिये ही यत्र काले इत्यादि अगले श्लोक कहे जाते हैं। यहाँ पुनरावर्ती मार्गका वर्णन दूसरे मार्गकी स्तुति करनेके लिये किया गया है --, यत्र काले इस पदका व्यवधानयुक्त प्रयाताः इस अगले पदसे सम्बन्ध है। जिस कालमें अनावृत्तिको -- अपुनर्जन्मको और जिस कालमें आवृत्तिको -- उससे विपरीत पुनर्जन्मको योगी लोग पाते हैं। योगिनः इस पदसे कर्म करनेवाले कर्मी लोग भी योगी कहे गये हैं क्योंकि कर्मयोगेन योगिनाम् इस विशेषणसे कर्मी भी किसी गुणविशेषसे योगी हैं। तात्पर्य यह है कि अर्जुन जिस कालमें मरे हुए योगी लोग पुनर्जन्मको नहीं पाते और जिस कालमें मरे हुए लोग पुनर्जन्म पाते हैं मैं अब उस कालका वर्णन करता हूँ।
।।8.23।। हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! जिस काल अर्थात् मार्गमें शरीर छोड़कर गये हुए योगी अनावृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर नहीं आते और (जिस मार्गमें गये हुए) आवृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीछे लौटकर आते हैं, उस कालको अर्थात् दोनों मार्गोंको मैं कहूँगा।
।।8.23।। हे भरतश्रेष्ठ ! जिस काल में (मार्ग में) शरीर त्याग कर गये हुए योगीजन अपुनरावृत्ति को, और (या) पुनरावृत्ति को प्राप्त होते हैं, वह काल (मार्ग) मैं तुम्हें बताऊँगा।।
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English Commentaries
2
The unalloyed devotees of the Supreme Lord, who are totally surrendered souls, do not care when they leave their bodies or by what method. They leave everything in Kṛṣṇa’s hands and so easily and happily return to Godhead. But those who are not unalloyed devotees and who depend instead on such methods of spiritual realization as karma-yoga, jñāna-yoga and haṭha-yoga must leave the body at a suitable time in order to be sure of whether or not they will return to the world of birth and death. If the yogī is perfect he can select the time and situation for leaving this material world. But if he is not so expert his success depends on his accidentally passing away at a certain suitable time. The suitable times at which one passes away and does not come back are explained by the Lord in the next verse. According to Ācārya Baladeva Vidyābhūṣaṇa, the Sanskrit word kāla used herein refers to the presiding deity of time.
8.23 यत्र where? काले in time? तु verily? अनावृत्तिम् nonreturn? आवृत्तिम् return? च and? एव even? योगिनः Yogis? प्रयाताः departing? यान्ति go to? तम् that? कालम् time? वक्ष्यामि (I) will tell? भरतर्षभ O chief of Bharatas.Commentary I shall declare to you? O Prince of the Bharatas? the time at which if the Yogis leave their body they will not be born again and also when if they die they will be born again.To return means to be born again.
Hindi Commentaries
2
।।8.23।। अभ्युदय और निःश्रेयस ये वे दो लक्ष्य हैं जिन्हें प्राप्त करने के लिए मनुष्य अपने जीवन में प्रयत्न करते हैं। अभ्युदय का अर्थ है लौकिक सम्पदा और भौतिक उन्नति के माध्यम से अधिकाधिक विषयों के उपभोग के द्वारा सुख प्राप्त करना। यह वास्तव में सुख का आभास मात्र है क्योंकि प्रत्येक उपभोग के गर्भ में दुःख छिपा रहता है। निःश्रेयस का अर्थ है अनात्मबंध से मोक्ष। इसमें मनुष्य आत्मस्वरूप का ज्ञान प्राप्त करता है जो सम्पूर्ण जगत् का अधिष्ठान है। इस स्वरूपानुभूति में संसारी जीव की समाप्ति और परमानन्द की प्राप्ति होती है।ये दोनों लक्ष्य परस्पर विपरीत धर्मों वाले हैं। भोग अनित्य है और मोक्ष नित्य एक में संसार का पुनरावर्तन है तो अन्य में अपुनरावृत्ति। अभ्युदय में जीवभाव बना रहता है जबकि ज्ञान में आत्मभाव दृढ़ बनता है। आत्मानुभवी पुरुष अपने आनन्दस्वरूप का अखण्ड अनुभव करता है।यदि लक्ष्य परस्पर भिन्नभिन्न हैं तो उन दोनों की प्राप्ति के मार्ग भी भिन्नभिन्न होने चाहिए। भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ भरतश्रेष्ठ अर्जुन को वचन देते हैं कि वे उन दो आवृत्ति और अनावृत्ति मार्गों का वर्णन करेंगे।यहाँ काल शब्द का द्वयर्थक प्रयोग किया गया है। काल का अर्थ है प्रयाण काल और उसी प्रकार प्रस्तुत सन्दर्भ में उसका दूसरा अर्थ है मार्ग जिससे साधकगण देहत्याग के उपरान्त अपने लक्ष्य तक पहुँचते हैं।प्रथम अपुनरावृत्ति का मार्ग बताते हैं --
।।8.23।। व्याख्या --[जीवित अवस्थामें ही बन्धनसे छूटनेको 'सद्योमुक्ति' कहते हैं अर्थात् जिनको यहाँ ही भगवत्प्राप्ति हो गयी, भगवान्में अनन्यभक्ति हो गयी, अनन्यप्रेम हो गया, वे यहाँ ही परम संसिद्धिको प्राप्त हो जाते हैं। दूसरे जो साधक किसी सूक्ष्म वासनाके कारण ब्रह्मलोकमें जाकर क्रमशः ब्रह्माजीके साथ मुक्त हो जाते हैं, उनकी मुक्तिको 'क्रममुक्ति' कहते हैं। जो केवल सुख भोगनेके लिये ब्रह्मलोक आदि लोकोंमें जाते हैं, वे फिर लौटकर आते हैं। इसको 'पुनरावृत्ति' कहते हैं। सद्योमुक्तिका वर्णन तो पंद्रहवें श्लोकमें हो गया, पर क्रममुक्ति और पुनरावृत्तिका वर्णन करना बाकी रह गया। अतः इन दोनोंका वर्णन करनेके लिये भगवान् आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।] 'यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं ৷৷. वक्ष्यामि भरतर्षभ'--पीछे छूटे हुए विषयका लक्ष्य करानेके लिये यहाँ 'तु' अव्ययका प्रयोग किया गया है।ऊर्ध्वगतिवालोंको कालाभिमानी देवता जिस मार्गसे ले जाता है, उस मार्गका वाचक यहाँ 'काल' शब्द लेना चाहिये; क्योंकि आगे छब्बीसवें और सत्ताईसवें श्लोकमें इसी 'काल' शब्दको मार्गके पर्यायवाची 'गति' और 'सृति' शब्दोंसे कहा गया है। 'अनावृत्तिमावृत्तिम्' कहनेका तात्पर्य है कि अनावृत ज्ञानवाले पुरुष ही अनावृत्तिमें जाते हैं और आवृत ज्ञानवाले पुरुष ही आवृत्तिमें जाते हैं। जो सांसारिक पदार्थों और भोगोंसे विमुख होकर परमात्माके सम्मुख हो गये हैं, वे अनावृत ज्ञानवाले हैं अर्थात् उनका ज्ञान (विवेक) ढका हुआ नहीं है, प्रत्युत जाग्रत् है। इसलिये वे अनावृत्तिके मार्गमें जाते हैं, जहाँसे फिर लौटना नहीं पड़ता। निष्कामभाव होनेसे उनके मार्गमें प्रकाश अर्थात् विवेककी मुख्यता रहती है।सांसारिक पदार्थों और भोगोंमें आसक्ति, कामना और ममता रखनेवाले जो पुरुष अपने स्वरूपसे तथा परमात्मासे विमुख हो गये हैं, वे आवृत ज्ञानवाले हैं अर्थात् उनका ज्ञान (विवेक) ढका हुआ है। इसलिये वे आवृत्तिके मार्गमें जाते हैं, जहाँसे फिर लौटकर जन्म-मरणके चक्रमें आना पड़ता है। सकामभाव होनेसे उनके मार्गमें अन्धकार अर्थात् अविवेककी मुख्यता रहती है। जिनका परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य है, पर भीतरमें आंशिक वासना रहनेसे जो अन्तकालमें विचलितमना होकर पुण्यकारी लोकों-(भोग-भूमियों-) को प्राप्त करके फिर वहाँसे लौटकर आते हैं, ऐसे योगभ्रष्टोंको भी आवृत्तिवालोंके मार्गके अन्तर्गत लेनेके लिये यहाँ 'चैव' पद आया है। यहाँ 'योगिनः' पद निष्काम और सकाम -- दोनों पुरुषोंके लिये आया है। सम्बन्ध --अब उन दोनोंमेंसे पहले शुक्लमार्गका अर्थात् लौटकर न आनेवालोंके मार्गका वर्णन करते हैं।
Sanskrit Commentaries
13
।।8.23।।एवं च सतताभ्यासेन येषां क्लेशं विनैव भगवदाप्तिः तेषां वृत्तमुक्तम्। इदानीम् (NK (n) इदानीं पुनः) उत्क्रान्त्या येऽपवर्गं भोगं चेच्छन्ति तेषां कश्चिद्विशेष उच्यते -- यत्रेति। अनावृत्तिः मोक्षः। आवृत्तिः भोगाय।
।।8.23।।ननु ज्ञानायत्ता परमपुरुषप्राप्तिरुक्ता। न च ज्ञानं मार्गमपेक्ष्य फलाय कल्पते विदुषो गत्युत्क्रान्तिनिषेधश्रुतेस्तथाच मार्गोक्तिरयुक्तेत्याशङ्क्य सगुणशरणानां तदुपदेशोऽर्थवानित्यभिप्रेत्याह -- प्रकृतानामिति। वक्तव्य इति यत्र काल इत्याद्युच्यत इति संबन्धः। स चेद्वक्तव्यस्तर्हि किमित्यध्यात्मादिभावेन सविशेषं ब्रह्म ध्यायतां फलाप्तये मूर्धन्यनाडीसंबद्धे देवयाने पथ्युपास्यत्वाय वक्तव्ये कालो निर्दिश्यते तत्राह -- विवक्षितेति। सोऽर्थो मार्गस्तदुक्तिशेषत्वेन कालोक्तिरित्यर्थः। पितृयाणमार्गोपन्यासस्तर्हि किमिति क्रियते तत्राह -- आवृत्तीमिति। मार्गान्तरस्यावृत्तिफलत्वादस्य चानावृत्तिफलत्वात्तदपेक्षया महीयानयमिति स्तुतिर्विवक्षितेति भावः। योगिन इति ध्यायिनां कर्मिणां च तन्त्रेणाभिधानमित्याह -- योगिन इति। कथं कर्मिषु योगिशब्दो वर्ततामित्याशङ्क्यानुष्ठानगुणयोगादित्याह -- कर्मिणस्त्विति। गुणतो योगिन इति संबन्धः। तत्रैव वाक्योपक्रमस्यानुकूल्यमाह -- कर्मयोगेने(णे)ति। अवशिष्टान्यक्षराणि व्याचक्षाणो वाक्यार्थमाह -- यत्रेति। योगिनो ध्यायिनोऽत्र विवक्षिताः आवृत्तावधिकृता योगिनः कर्मिण इति विभागः। कालप्राधान्येन मार्गद्वयोपन्यासमुपक्रम्य तमेव प्रधानीकृत्य देवयानं पन्थानमवतारयति -- तं कालमिति।
।।8.23।।यद्यपीहैवात्मसाक्षात्कारवतांन तस्य प्राणा उत्क्रामन्त्यत्रैव समवलीयन्ते इति श्रुत्या गत्युत्क्रान्तिनिषेधाद्वक्ष्यमाणमार्गोपदेशस्तदर्थ नोपयज्यते तथापि प्रणवावेशितबुद्धीना प्रकृतानां योगिनां सगुणोपासकानां क्रममुक्तिभाजां केन क्रमेण ब्रह्मप्राप्तिरित्याकाङ्क्षायामुत्तरमार्गे निरुपिव्ये उत्तरमार्गेण गता न निवर्तन्ते गतास्तु पुररावृत्तिभाज इत वक्तव्यस्तुत्यर्थे पितृयाणमार्गोपदेशः। यत्रेति। यत्र काले प्रयाता मृता योगिनो ध्यानयोगिन उपासका अनावृत्तिमपुनरावृत्तिं यान्ति कर्मयोगिनश्चावृत्तिं पुनरावृत्तिं यान्ति तं कालं वक्ष्यामि कर्मिणः योगित्वमनुष्ठानयोगात्कर्मयोगेन योगिनामित्युक्तत्वात् योगिन इत्यनेन प्रक्रान्ता ओमित्येकाक्षरमित्यादिक्तो ग्राह्यास्तेन पञ्चाग्निविद्योपासकानां देवयानमार्गेण ब्रह्मलोकं गतानामपि ततो निवृत्तौ न क्षतिः। कर्मयोगिनोऽप्यपासनासमुच्चितकर्मयोगिनो ग्राह्याः। भरतर्षभेति संबोधयन् भरता अपि निष्कामकर्मयोगसमुच्चितेनेपास नेनात्रैव साक्षात्कारं लब्ध्वा साक्षान्मुक्तिं देवयानमार्गेण गत्वा क्रमेण वा प्राप्तास्त्वं तु तेभ्यः श्रेष्ठस्तथैव भवितुं योग्योऽसीति सूचयति।
।।8.23।।यस्मिन् काले मृताः आवृत्त्यनावृत्ती यान्ति तत्प्रतिपादनार्थमुत्तरो ग्रन्थ इत्यन्यथाप्रतीतिनिरासार्थमाह -- यदिति। याश्च ताः कालाभिमानिन्यश्चेति विग्रहः। देवता गता इति तदधिष्ठितमार्गाभ्यां गता इत्यर्थः काल इत्युक्तत्वात्। कथमादिपदप्रक्षेपेण व्याख्यानं इत्यत आह -- काल इति। कुतः इत्यत आह -- अग्न्यादेरिति। अग्निर्ज्योतिर्धूमानाम्।
।।8.23।।यत्कालाद्यभिमानिदेवता गता आवृत्त्यनावृत्ती गच्छन्ति ता आह -- यत्रेत्यादिना। काल इत्युपलक्षणं अग्न्यादेरपि वक्ष्यमाणत्वात्।
।।8.23।।सगुणब्रह्मोपासकास्तत्पदं प्राप्य न निवर्तन्ते किंतु क्रमेण मुच्यन्ते। तत्र तल्लोकभोगात्प्रागनुत्पन्नसम्यग्दर्शनानां तेषां मार्गापेक्षा विद्यते नतु सम्यग्दर्शिनामिव तदनपेक्षेत्युपासकानां तल्लोकप्राप्तये देवयानमार्ग उपदिश्यते। पितृयाणमार्गोपन्यासस्तु तस्य स्तुतये -- प्राणोत्क्रमणानन्तरं यत्र यस्मिन्काले कालाभिमानिदेवतोपलक्षिते मार्गे प्रयाता योगिनो ध्यायिनः कर्मिणश्य अनावृत्तिमावृत्तिं च यान्ति देवयाने पथि प्रयाता ध्यायिनोऽनावृत्तिं यान्ति। पितृयाणे पथि प्रयाताश्च कर्मिण आवृत्तिं यान्ति। यद्यपि देवयानेऽपि पथि प्रयाताः पुनरावर्तन्त इत्युक्तंआब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनः इत्यत्र तथापि पितृयाणे पथि गता आवर्तन्त एव न केऽपि तत्र क्रममुक्तिभाजः। देवयाने पथि गतास्तु यद्यपि केचिदावर्तन्ते प्रतीकोपासकास्तडिल्लोकपर्यन्तं गता हिरण्यगर्भपर्यन्तममानवपुरुषनीता अपि पञ्चाग्निविद्याद्युपासका अतत्क्रतवो भोगान्ते निवर्तन्त एव तथापि दहराद्युपासकाः क्रमेण मुच्यन्ते भोगान्त इति न सर्व एवावर्तन्ते। अतएव पितृयाणः पन्था नियमेनावृत्तिफलत्वान्निकृष्टः। अयं तु देवयानः पन्था अनावृत्तिफलत्वादतिप्रशस्त इति स्तुतिरुपपद्यते। केषांचिदावृत्तावप्यनावृत्तिफलत्वस्यानपायात्। तं देवयानं पितृयाणं च कालं कालाभिमानिदेवतोपलक्षितं मार्गं वक्ष्यामि हे भरतर्षभ अत्र कालशब्दस्य मुख्यार्थत्वे अग्निर्ज्योतिर्धूमशब्दानामनुपपत्तिर्गतिसृतिशब्दयोश्चेति तदनुरोधेनैकस्मिन्कालपद एव लक्षणाश्रिता कालाभिमानिदेवतानां मार्गद्वयेऽपि बाहुल्यात् अग्निधूमयोस्तदितरयोः सतोरप्यग्निहोत्रशब्दवदेकदेशेनाप्युपलक्षणं कालशब्देन। अन्यथा प्रातरग्निदेवताया अभावात्तत्प्रख्यं चान्यशास्त्रमित्यनेन तस्य नामधेयता न स्यात्। आम्रवणमिति च लौकिकों दृष्टान्तः।
।।8.23।।पूर्वोक्तानामोंकारद्वारा सगुणब्रह्मविदां क्रममुक्तिभाजां ब्रह्मप्रतिपत्तये उत्तरो मार्गो वक्तव्य इत्यत आह -- यत्रेति। आवृत्तिमार्गोपन्यासोऽनावृत्तिमार्गस्तुत्यर्थः। योगिन इति। योगिनः कर्मिणश्चोच्यन्ते तेषां यथायोगं मार्गद्वयविभागः। शेषं स्पष्टम्।
।।8.23।।नन्वितो गता य आवर्तन्ते निवर्तन्ते वा ये तेऽत्र कथं ज्ञेयाः इत्याशङ्क्याह -- यत्रेति। यत्र काले यस्मिन् काले प्रयाता योगिनः अनावृत्तिं यान्ति प्राप्नुवन्ति च पुनः यस्मिन् काले प्रयाता आवृत्तिमेव प्राप्नुवन्ति हे भरतर्षभ ज्ञानयोग्यकुलोत्पन्न तं कालं वक्ष्यामि कथयामीत्यर्थः।,
।।8.23।।अत्र कालशब्दो मार्गस्य अहःप्रभृतिसंवत्सरान्तकालाभिमानिदेवताभूयस्तया मार्गोपलक्षणार्थः यस्मिन् मार्गे प्रयाता योगिनो अनावृत्तिं पुण्यकर्माणः च आवृत्तिं यान्ति तं मार्गं वक्ष्यामि इत्यर्थः।
।।8.23।। -- यत्र काले प्रयाताः इति व्यवहितेन संबन्धः। यत्र यस्मिन् काले तु अनावृत्तिम् अपुनर्जन्म आवृत्तिं तद्विपरीतां चैव। योगिनः इति योगिनः कर्मिणश्च उच्यन्ते कर्मिणस्तु गुणतः -- कर्मयोगेन योगिनाम् (गीता 3।3) इति विशेषणात् -- योगिनः। यत्र काले प्रयाताः मृताः योगिनः अनावृत्तिं यान्ति यत्र काले च प्रयाताः आवृत्तिं यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ।।तं कालमाह --,
।।8.23।।तदेवं परमेश्वरोपासकाः तत्पदं प्राप्य न निवर्तन्ते अन्ये त्वावर्तन्त इत्युक्तम्। तत्र केन मार्गेण गता नावर्तन्ते केन वा गताश्चावर्तन्त इत्यपेक्षायामाह -- यत्रेति। यत्र यस्मिन्काले प्रयाता योगिनोऽनावृत्तिं यान्ति यस्मिंश्च काले प्रयाता आवृत्तिं यान्ति तं कालं वक्ष्यामीत्यन्वयः। अत्र च रश्म्यनुसारी अतश्चायनेऽपि दक्षिण इति सूचितन्यायेनोत्तरायणादिकालविशेषस्मरणस्य विवक्षितत्वात्कालशब्देन कालाभिमानिनीभिरातिवाहिकीभिर्देवताभिः प्राप्यो मार्ग उपलक्ष्यते अतोऽयमर्थः -- यस्मिन्कालाभिमानिदेवतोपलक्षिते मार्गे प्रयाता योगिन उपासकाः कर्मिणश्च यथाक्रममनावृत्तिमावृत्तिं च यान्ति तं कालाभिमानिदेवतोपलक्षितं मार्गं कथयिष्यामीति। अग्निज्योतिषोः कालाभिमानित्वाभावेऽपि भूयसामहरादिशब्दोक्तानां कालाभिमानित्वात्तत्साहचर्यादाम्रवनमित्यादिवत्कालशब्देनोपलक्षणमविरुद्धम्।
।।8.23।।अथ कदा केन मार्गेण गता नावर्त्तन्ते केन वा गताश्चावर्त्तन्ते इत्यपेक्षायामाह -- यत्रेति। अत्र कालशब्दोऽपि चाहःप्रभृतिसंवत्सरान्तकालाभिमानिदेवताभिरातिवाहिकीभिर्द्वारा मार्गोपलक्षणार्थः। तथा चायमर्थः -- कालाभिमानिदेवोपलक्षिते यत्र काले मार्गे च प्रयाताः प्राणतो वियोगिनो वा सन्तो भगवन्महिमज्ञानिनः भक्ता अर्थार्थिनश्च यथाक्रममनावृत्तिमावृत्तिं च यान्ति तं वक्ष्यामि। यद्यप्यग्निज्योतिषोः कालाभिमानित्वं स्वतो न सम्भवति तथापि सायम्प्रातः कालाभिमानित्वेन तथोक्तिः सम्भवति। अतएव मंत्रे -- अग्निश्च मामन्युश्च,[म.ना.31।3] इति रात्रौ सूर्यश्च मामन्युश्च इति दिवा निरूप्यते।
।।8.23।।यत्र काले तु इत्यादेःयोगयुक्तो भवार्जुन [8।27] इत्यन्तस्य तात्पर्यमाह -- अथेति। अत्र धूमादिमार्गकथनं हेयत्वार्थम् अर्चिरादिमार्गोपदेशस्तु तदनुसन्धानार्थ एवेति तत्रैव तात्पर्यमिति भावः। ननु परमपुरुषार्थनिष्ठस्यैव ह्यर्चिरादिगतिः तत्कथमत्र साधारण्यमुच्यते इत्यत्राह -- द्वयोरपीति। आत्मनिष्ठस्याप्यपुनरावृत्तेः पूर्वोक्तत्वात्तस्याप्यर्चिरादिकैव गतिरिति दर्शयितुमाह -- सा चेति। साधारण्यापुनरावृत्त्योः श्रुतिमेव दर्शयति -- यथेति। अङ्गिफलमेवाङ्गेऽपि व्यपदिश्यत इत्याशङ्क्य परिहरति -- नचेति। हेतुमाह -- ये चेति। यद्यप्यङ्गिफलमेवाङ्गेऽपि निर्देष्टुं युक्तम् तथाप्यङ्गिना सहाङ्गस्य तुल्यवत्पृथङ्निर्दिष्टस्य तत्फलनिर्देशो न युक्त इति भावः। एतेन प्रथमषट्कोदितप्रत्यगात्मवेदनादत्रत्याक्षरयाथात्म्यानुसन्धानस्य भेदोऽपि दर्शितः।तद्य इत्थं विदुः इत्यस्य प्रत्यगात्मनिष्ठविषयत्वं कथं इत्यत्राह -- पञ्चाग्निविद्यायां चेति। आपः पुरुषवचसो भवन्ति [छां.उ.5।9।14] इति त्रिवृत्कृतानामभिधीयमानत्वाद्भूतान्तरसंसर्गसिद्धिः।अपामेवेत्यात्मस्वरूपपरिणामव्युदासायोक्तम्। एवंविधशरीरसम्बन्धमात्रस्याप्यौपाधिकत्वप्रदर्शनायाहपुण्यपापहेतुक इति। रमणीयचरणा रमणीयां योनिं ৷৷. कपूयचरणाः कपूयां योनिम् इत्यादिवचनान्न केवलाचिद्विषयमिदं प्रकरणम्। तद्य इत्थं विदुर्ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते इत्युक्तयद्वृत्तद्वयस्य तेऽर्चिषम् इत्येकेन तद्वृत्तेन प्रतिनिर्देशादुभयोर्गतिरविशिष्टेति ज्ञापनाय तद्य इत्थं विदुः तेऽर्चिषम् इति व्यवहितमुपात्तम्। इत्थंशब्दानूदितं प्रस्तुताकारविशेषं दर्शयति -- विविक्ते इति। ,ननुतत्पुरुषोऽमानवः स एनान् ब्रह्म गमयति [छां.उ.4।15।6] इत्यर्चिरादिना गतस्य ब्रह्मप्राप्तिः श्रूयते तत्कथं केवलात्मोपासकस्य ब्रह्मप्रापकार्चिरादिगतिप्राप्तिः इत्यत्राह -- आत्मयाथात्म्येति। अयं पञ्चाग्निविद्यानिष्ठो न केवलात्मोपासकः अपितु ब्रह्मात्मकस्वात्मानुसन्धायीति भावः। अन्यथा तत्क्रतुन्यायविरोध इत्यभिप्रायेणाह -- तत्क्रतुन्यायाच्चेति। चकार इतरेतरयोगे। यथावस्थितात्मानुसन्धानस्य परशेषतैकरसत्वानुसन्धानरूपत्वे प्रमाणमाह -- य आत्मनीति। आदिशब्देन पतिं विश्वस्य [तै.ना.6।11।3] करणाधिपाधिपः [श्वे.उ.6।9] इत्यादिवाक्यशतं गृह्यते। अत्र शारीरकभाष्यादिविरोधो मन्दैराशङ्कितः इह तावच्छ्रुतिसूत्रभाष्यादिष्वन्यत्र च पञ्चाग्निविदः परमात्मात्मकस्वात्मानुसन्धातृत्वमर्चिरादिगतिश्चाविशेषेणोच्यते। तस्याश्च ब्रह्मगमयितृत्वस्य श्रुत्यादिष्विह चतत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः इति सिद्धत्वात् पञ्चाग्निविदोऽपि परमात्मप्राप्तिरस्त्येवेति स्वीकर्तव्यम्। तत्र प्राप्तौ ज्ञानिनां परमात्मात्मकस्वात्मानुसन्धानस्य स्वविशिष्टो भोग्यः अक्षरयाथात्म्यनिष्ठानां तु स्वस्वरूपमेव पूर्वं भोग्यम् वस्वादिपदप्राप्तिपूर्वकब्रह्मप्राप्तिसाधनमधुविद्यादिन्यायादन्ततो ब्रह्मप्राप्तिः ईदृशपर्वक्रमप्रतिनियमश्च प्राचीनापेक्षाभेदात् स च प्राचीनकर्मविशेषात्चतुर्विधा भजन्ते माम् [7।16] इति प्रागेव दर्शितः।न चात्र जिज्ञासोरन्य एवात्मयाथात्म्यविदिति भाष्यते जिज्ञासुवेद्यतयोक्तस्वभावविसर्गयोरत्र च पञ्चाग्निविद्योदाहरणात् मध्ये च कैवल्यार्थिन एव मूर्धन्यनाड्या निष्क्रमणमनावृत्तिश्चोक्ता आत्मयाथात्म्याक्षरयाथात्म्यशब्दयोश्चात्र न भिन्नार्थत्वम् तस्योपासने किञ्चिदस्ति विशेषः अक्षरयाथात्म्यविदः -- परमात्मशरीरभूतस्वात्मोपासकाः ज्ञानिनस्तु स्वात्मशरीरकपरमात्मोपासका इत्ययमेव विशेषः तद्य इत्थं विदुर्ये चेमेऽरण्ये [छां.उ.5।10।1] इति विभागनिर्देशाभिप्रेत इति भाष्यादिषूक्तः। सारे तुउभयेऽपि हि परिपूर्णं ब्रह्मोपासते मुखभेदेन स्वात्मशरीरकं ब्रह्म केचन ब्रह्मात्मकस्वात्मानमितरे [वे.सा.4।3।14] इति। अत एव सप्तमे प्रक्रान्तो जिज्ञासुः परमात्मप्राप्तिकामज्ञानिव्यतिरिक्तत्वात् अब्रह्मात्मकस्वात्मानुसन्धायीति न भ्रमितव्यम्। तस्य चोदारकोटिमात्रे निवेशः स्वात्मानुभवविलम्बिविमुखज्ञानिव्यतिरेकात्।अर्चिरादिगतिनिषेधस्तु ब्रह्मात्मकस्वात्मानुसन्धानरहितस्वात्मोपासनविषयः। इदमपि भाष्यादिषु व्यक्तमेवोक्तंतस्मादचिन्मिश्रं केवलं वा चिद्वस्तु ब्रह्मदृष्ट्या तद्वियोगेन च य उपासते न तान्नयति अपितु परं ब्रह्मोपासीनान् आत्मानं च प्रकृतिवियुक्तं ब्रह्मात्मकमुपासीनानातिवाहिको गुणो नयति [ब्र.सू.भा.4।3।15] इत्यादिभिः। यत्पुनरुच्यते ये तु शिष्टास्त्रयो भक्ताः फलकामा हि ते मताः। सर्वे च्यवनधर्माणः प्रतिबुद्धस्तु मोक्षभाक् [म.भा.12।341।35] इति तत्रापि आत्ममात्रानुभवसुखस्य स्थिरत्वादेव च्यवनधर्मत्वमुच्यते न तावता पुनः संसारप्रसङ्गःइन्द्रलोकात्परिभ्रष्टो मम लोकपरायणः। प्रमुक्तः सर्वसंसारैर्मम लोकं च गच्छति [वा.पु.139।98] प्रच्युतो वा एषोऽस्माल्लोकादसतो देवलोकम् [यजुः6।1।1।5] इत्यादिष्विवोत्तरोत्तरातिशयितपदप्राप्तावपि पूर्वपदभ्रंशमात्राच्च्यवनधर्मत्ववाचो युक्तेरविरोधात् परिमितसुखानुभवविलम्बनेन तदानीं निरतिशयसुखानुभवाद्भ्रष्टत्वेनापि निन्दोपपत्तेश्च। उपासनदशानुभूते परमात्मनि फलदशायां किञ्चित्कालमनुभवविच्छेदाद्वा प्राप्तभ्रंशलक्षणं च्यवनधर्मत्वम्।प्रतिबुद्धस्तु मोक्षभाक् [म.भा.12।341।35] इति चाव्यवहितमोक्षभाक्त्वं प्रतिबुद्धस्योच्यते न तावतान्यस्य मोक्षाभावःभुक्त्वा च भोगान्विपुलांस्त्वमन्ते मत्प्रसादतः। ममानुस्मरणं प्राप्य मम लोकमवाप्स्यसि [वि.पु.5।19।26] इतिवदविरोधात्।यथा च मुमुक्षोरेव कस्यचिन्मध्ये ब्रह्मकायनिषेवणसुखमुच्यते तथात्रापि स्थानविशेषे स्वात्मानुभवविलम्बः। यथा चअथवा नेच्छते तत्र ब्रह्मकायनिषेवणम्। उत्क्रामति च मार्गस्थः शीतीभूतो निरामयः इत्यादिना ब्रह्मकायनिषेवणसङ्गात् मुक्तस्य देवयानेन मार्गेण परमाकाशगमनमुच्यते तद्वदिहापि स्वात्मानुभवस्थानात्प्रच्युतस्य परमव्योमाधिरोहः स्यात् अर्चिरादिगतिश्चास्यावान्तरफलानुभवात्पश्चाद्वा गतिमध्ये वा। दक्षिणायनमृतस्य चन्द्रमसः सायुज्यवद्विश्रममात्ररूपोऽयमवान्तरफलानुभव इत्युभयधापि न विरोधः। एतेन पश्चादेवास्याप्रतीकालम्बनत्वमित्यपि निरस्तं मधुविद्यावदेव प्रथममपि तदुपपत्तेः। स्मरन्ति च स्वात्मानुभवस्थानं मुक्तिस्थानादर्वाचीनंयोगिनाममृतं स्थानं स्वात्मसन्तोषकारिणाम्। एकान्तिनः सदा ब्रह्मध्यायिनो योगिनो हि ये। तेषां तत्परमं स्थानं यद्वै पश्यन्ति सूरयः [वि.पु.1।6।38] इति। अमृतस्थानवर्तिनां च मुक्तत्वव्यपदेशो जरामरणादिविरहात्पुनर्जन्महेतुभूतपुण्यपापविगमाच्च।अस्ति च परित्यक्तस्थूलदेहानामपि तत्तदुपासनाविशेषाधीनमपवर्गादर्वाचीनं फलम्। तच्च प्रकृतिलयादिशब्देन साङ्ख्याः पठन्तिधर्मेण गमनमूर्ध्वं गमनमधस्ताद्भवत्यधर्मेण। ज्ञानेन चापवर्गो विपर्ययादिष्यते बन्धः।।वैराग्यात्प्रकृतिलयः संसारो भवति राजसाद्रागात्। ऐश्वर्यादविघातो विपर्ययात्तद्विपर्यासः।।[सां.स.का.44।45],इति।विपर्ययादिष्यते बन्धः इत्यत्र च वाचस्पतिना व्याख्यातं -- विपर्ययात् -- अतत्त्वंज्ञानात् इष्यते बन्धः स च त्रिविधः प्राकृतिको वैकृतिको दाक्षायणिकश्चेति। तत्र प्रकृतावात्मज्ञानाद्ये प्रकृतिमुपासते तेषां प्राकृतिको बन्धः। यः पुराणे प्रकृतिलयान् प्रकृत्योच्यते -- पूर्णं वर्षसहस्रं तु तिष्ठन्त्यव्यक्तचिन्तकाः इति। वैकारिको बन्धः तेषाम् ये विकारानेव भूतेन्द्रियाहङ्कारबुद्धीरुपासते पुरुषबुद्ध्या तान् प्रतीदमुच्यते यथा -- दश मन्वन्तराणीह तिष्ठन्तीन्द्रियचिन्तकाः। भौतिकास्तु शतं पूर्णं सहस्रं त्वाभिमानिकाः।।बौद्धा दश सहस्राणि तिष्ठन्ति विगतज्वराः। ते खल्वमी विदेहा येषां वैकृतिको बन्धः।। इति।एवमव्यक्तादितत्त्वचिन्तकानामिव प्रत्यगात्मतत्त्वचिन्तकानामपि तदुचितदेशकालं ततोऽनिश्चितमतिशयितं फलमुपपद्यते। अत एव भूमविद्यायां प्रत्यगात्ममात्रोपासकस्याप्यतिवादित्वमुक्तम्। ब्रह्मात्मकस्वात्मानुसन्धाने तु ब्रह्मप्राप्तौ विश्रमादपुनरावृत्तिरिति विशेषः। अत एवाक्षरानुभवस्यान्तवत्त्वे तदर्थिनां कथमैश्वर्याधिकारणोऽधिकार्यन्तरत्वमित्यपि निरस्तम् बाह्यान्तरभोक्तव्यविभागादावृत्त्यनावृत्तियोग्यताभेदाच्च तद्भेदोपपत्तेः। विलम्बाक्षमाणां पुनरियं निष्ठा -- सर्वधर्मांश्च सन्त्यज्य सर्वलोकांश्च साक्षरान्। लोकविक्रान्तचरणौ शरणं तेऽव्रजं विभो।। इति।कैवल्यं भगवन्तं च मन्त्रोऽयं साधयिष्यति [बृ.हा.स्मृ.3।40] इत्यादिष्वपि कैवल्यशब्देनात्ममात्रानुभवसुखं तदपेक्षिभिः प्राप्यमुच्यते। एतच्चान्तरायकोटिनिविष्टत्वादादितः सावधाना ज्ञानिनः परिहरन्ति। केचित्तु ब्रह्मानुभववैमुख्येन नित्यमात्मानुभवसुखमिच्छन्ति न तत्र भाष्यकारादिसम्प्रदायं प्रमाणं युक्तिं वा पश्यामः निश्शेषकर्मक्षये स्वाभाविकरूपाविर्भावेन ब्रह्मानुभवावश्यम्भावात् कर्मशेषयोगे तु संसारप्रसङ्गाच्च जरामरणादिहेतुभूतसर्वकर्मविनाशादसंसारः तावन्मात्रेण च मुक्तत्वव्यपदेशः। ब्रह्मानुभवप्रतिबन्धककर्मणस्त्वविनाशात्तदुभयाभाव इति चेत् -- अस्त्वेवम् एतत्कर्म परस्तादपि न नङ्क्ष्यतीत्यत्र न नियामकमस्ति -- इत्येषा दिक्।। -- परप्राप्त्यादिरहितनित्यकैवल्यकल्पना। सूत्रभाष्यश्रुतिस्मृत्याद्य बाधेन न सिध्यति।अतोऽधिकारिभेदेन ह्यवस्थाभेदमाश्रिताः। अन्यामपि गतिं प्राञ्चः प्रतीचीं प्रत्यपादयन्।।तत्रावृत्तिपरप्राप्तिवैरूप्यादेरयोगतः। अस्मदुक्तं श्रुतिस्मृत्योरनपायं रसायनम्।।ननु -- अर्चिरादिगतिमाहेति कथमुच्यतेयत्र काले इति कालविशेषो ह्युपक्रम्यत इत्यत्राहअत्र कालशब्द इति। शारीरके दक्षिणायनादिमृतस्यापि मोक्ष उक्तः अतश्चायनेऽपि हि दक्षिणे [ब्र.सू.4।2।20] इति। अत्र चशुक्लकृष्णे गती ह्येते [8।26] इत्यनन्तरमेवोच्यते अन्यथाअग्निर्ज्योतिः इत्यादिना च विरुध्येतनैते सृती पार्थ जानन् [8।27] इति च मार्गवाचिना शब्देनोपसंह्रियत इति भावः।यत्र काले प्रयाता इति व्यवहितेन सम्बन्धं दर्शयन् योगिनामावृत्तिः कथमिति च शङ्कां परिहरन्यत्र काले इति श्लोकस्य वाक्यार्थमाह -- यस्मिन्निति। अत्र योगिनः ज्ञानिनः पुण्यकर्मसम्बन्धिनश्च।सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ [अष्टा.1।2।64]। यद्वा पुण्यकर्माण इत्यध्याहृतम्। तेऽर्चिषमभिसम्भवन्त्यर्चिषोऽहरह्नआपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद्यान् षडुदङ्ङेति मासांस्तान्मासेभ्यः संवत्सरम् [छां.उ.5।10।12] इत्यादिश्रुत्यनुसारेणोक्तंसंवत्सरादीनां प्रदर्शनमिति। एतद्वैशद्यमर्चिरादिपादे। तत्रैवं सङ्गृहीतं वरदगुरुभिःअर्चिरहस्िसतपक्षानुदगयनाब्दमरुदर्केन्दून्। अपि वैद्युतवरुणेन्द्रप्रजापतीनातिवाहिकानाहुः [त.सा.102] इति।अग्निर्ज्योतिः इति अग्निरूपज्योतिरित्यर्थः। तेन देवयानपथमपर्वस्थार्चिर्विवक्षा। अत एवाग्निज्योतिषोर्भिन्नदेवतात्वं कालाभिमानिदेवतात्वं च वदन्तः प्रत्युक्ताः।